दिमागी ताकत बढ़ाने वाली दवाएं क्यों नहीं

By  ,  दैनिक जागरण
Jul 12, 2010

-हाल के दिनों में तेजी से बढ़ी है इनकी खपत

शिकागो, रायटर : कुछ साल पहले तक मस्तिष्क की क्षमता बढ़ाने वाली दवाओं के प्रति स्वस्थ लोगों का रवैया सकारात्मक नहीं होता था। हाल में हुए एक अध्ययन में दावा किया गया है कि इन दवाओं के प्रति लोगों के रुझान में बदलाव आया है। पढ़ाई लिखाई और काम के दौरान बेहतर प्रदर्शन के लिए लोग तेजी से इन दवाओं की तरफ उन्मुख हो रहे हैं।

 

अब ज्यादातर लोगों का मानना है कि यदि इन दवाओं का साइड इफेक्ट नहीं होता और काम करने की क्षमता पर सकारात्मक असर पड़ता है तो इन्हें लेने में कोई बुराई नहीं है। हालांकि नेशनल इंस्टीट्यूट आफ ड्रग एब्यूज की निदेशक डा. नोरा वोल्को के मुताबिक अमेरिका में उत्तेजित करने वाली दवाओं का व्यापक रूप से दुरुपयोग हो रहा है। हाल ही में हुए एक सर्वे के मुताबिक नोवार्टिस की रिटेलिन या मिथाइलफेनिएडेट व सेफ्लान का प्रोविजल या मोडाफिनाइल का इस्तेमाल छात्र, प्रोफेसर और अन्य लोग प्रतिस्पद्र्धा के इस युग में खुद को बेहतर साबित करने के  लिए कर रहे हैं। जाहिर है कि वे आगे बढ़ने की दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहते। अमेरिका के नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड की वार्षिक रिपोर्ट भी बताती है कि1995 से 2006 के बीच उत्तेजक दवाओं के उत्पादन और आपूर्ति में 300 फीसदी की दर से वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि यह जानना बेहद जरूरी है कि स्वस्थ लोगों पर इन दवाओं का दीर्घकालिक प्रभाव कैसा पड़ रहा है? डाक्टर नोरा रविवार को 'नेचर' पत्रिका में छपी उस रिपोर्ट पर चिंता जता रही थीं जिसमें स्वस्थ लोगों द्वारा दिमाग की क्षमता बढ़ाने वाली दवाओं के लेने का समर्थन किया गया है। वहीं कैलिफोर्निया स्थित स्टेनफोर्ड ला स्कूल के हेनरी ग्रीली, ब्रिटेन स्थित कैंब्रिज विश्वविद्यालय के मानसिक रोग चिकित्सा विज्ञान के प्रोफेसर बारबारा साहकियान और अन्य लोगों का कहना है कि हमें बुद्धि बढ़ाने वाली नई दवाओं का स्वागत करना चाहिए।

 

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