दांतों की क्षति का पता लगाने की नयी तकनीक

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Jan 01, 2013

कई लोगों में दन्त क्षय का पता चल जाता है। लेकिन कई बार आपके दांतों में दर्द तो होता है, लेकिन कैविटी का पता नहीं चलता या फिर आप अपने दांतों के ऊपर कला धब्बा हीं देख पाते हैं ऐसी स्थिति में आपका डेंटिस्‍ट कैविटी की पहचान करके उसका उचित ईलाज करके उसे और बढ़ने से रोक सकता है।

 

डेंटिस्‍ट दांतों के शुरूआती लक्षणों को देखकर हीं कैसे बता सकता है कि भविष्य में कैविटी बनेगी या नहीं? यह निम्न प्रकार से जाना जा सकता है:

  • आपके दांतों एवं जबड़ों का एक्‍स-रे करके या
  • एक्‍सप्‍लोरर से आपके दांतों की जाँच करके (एक्‍सप्‍लोरर धातु का एक यन्त्र / औजार होता है जिसका अंतिम छोर  नुकीला होता है; इसका इस्तेमाल डेंटिस्‍ट करते हैं)

कुछ डेंटिस्‍ट नई तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। क्या ये उपकरण, एक्‍सप्‍लोरर या एक्‍स-रे जैसे उपकरणों से बेहतर हैं, जिनका इस्तेमाल अनुभवी डेंटिस्‍ट करते आये हैं?

 

दन्त क्षय के निदान के लिए कुछ नई तकनीकें:


  • डिजिटल ईमेज फाइबर  ऑप्टिक ट्रांस ईलुमिनेसं )(डी आई एफ ओ टी आई) : इस तकनीक में कंप्यूटर के जरिए सफ़ेद प्रकाश डालते हुए दांतों की छवि बनती जाती है और रोग की पहचान की जाती है। दांतों का वह भाग जहाँ के खनिज घिस चुके होते हैं (कै‍रीज़ का प्रारंभिक चरण ), दांतों के स्वस्थ भाग की अपेक्षा काले दिखते हैं। इससे डेंटिस्‍ट को दांतों का रोग पता करने में आसानी होती है। इस प्रक्रिया में विकिरण का प्रयोग नहीं होता यानि रेडीयेशन से होने वाले खतरे से भी आप बचे रहते हैं। छवि देखने के बाद, रोग के बारे में, अलग-अलग डेंटिस्‍ट की अलग-अलग राय हो सकती है।

 

  • डिजिटल ईमेजिंज (ढायग्‍नोडेंट): रोग का पता लगाने के लिए इस तकनीक में लेज़र का ईस्तेमाल किया जाता है। इस प्रक्रिया में हाथ से लेज़र यन्त्र पकड़कर हरेक दांत पर उसकी किरणें डाली जाती हैं। स्वस्थ दांत थोड़े कम फ्लोरेसेंट रोशनी फेकतें हैं, जबकि दांत का वह भाग जो ख़राब रहता है या जहाँ बैक्‍टीरिया होते हैं वे ज्यादा प्रकाश फेकते हैं। इस उपकरण का परिणाम 10% सटीक रहता है। इससे पहले कि प्रारंभिक चरण के कैरीज़ दांतों के  बाहरी सतह के ईनेमल  में कैविटी का रूप धारण करें, इस यन्त्र से उसकी पहचान की जा सकती है। अगर किसी दांत में ऐसा रोग पनपने का खतरा लग रहा हो तो इस यन्त्र के जरिए उसपर नजर रखी जा सकती है।

 

  • क्‍वांटिटेटिव लाईट-इन्‍ड्यूजड फलारिसेंस (क्‍यू एल एफ) : क्‍यू एल एफ सबसे आधुनिक तकनीक है। इसमें प्रकाश का कोई स्रोत, एक कैमरा, फ्लारिसेंट डाई और कंप्‍यूटर साफ्टवेयर का उपयोग किया जाता है। कैमरे से दांतों की छवि का पता चलता है और कंप्‍यूटर का साफ्टवेयर यह बताता है कि दांतों को किस हद तक नुकसान पहुंचा है।

 

बहुत ज्यादा ड्रिलिंग की जरूरत है क्या? नहीं! दन्त क्षय के प्रारंभिक चरण में हर किसी को फिलिंग की जरूरत नहीं पड़ती।
डेंटिस्‍ट अक्सर नई तकनीक के उपयोग से दांतों के प्रारंभिक चरण के दन्त क्षय का पता लगा लेते हैं। ऐसा माना जाता है कि नई तकनीक से दांतों का रोग प्रारंभिक चरण में हीं पकड़ में आ जाता है जिसे कैविटी में तब्दील होने से रोका जा सकता है (जब दांत अपने बहुमूल्य खनिज खोना शुरू करते हैं, तभी से)। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या आपको तत्काल फिलिंग करवाने की जरूरत है?

 

इसके जवाब में कहा जा सकता है-नहीं! कोई जरूरी नहीं है! कई मामलों में प्रारंभिक चरण के दन्त क्षय को कैविटी  में तब्दील होने में (दांत का गूदा भी चपेट में आ जाता है) वर्षों लग जातें हैं.. अमूमन 5 वर्ष। इस चरण में दांत की तंत्रिकाएं (नर्वस) एवं रक्त वाहिकाएं भी रोग कि चपेट में आ जाती हैं}.

 

चूँकि इस प्रक्रिया में काफी समय लग जाता है, इसलिए दन्त क्षय के प्रारंभिक चरण के हर मामले में हीं फिलिंग की आवश्यकता नहीं रहती। जरूरत से ज्यादा ईलाज करने से भी जटिलताएं पैदा हो सकतीं हैं।

 

कुछ मामलों में, यदि यह रोग प्रारंभिक चरण में पकड़ा जाता है, तो उसे पूरी तरह ठीक भी किया जा सकता है। इसलिए अगर आपके दांतों में दन्त क्षय प्रारंभिक चरणों में हीं पकड़ा जाता हो तो फिलिंग करवाने के पहले आप कुछ ऐसे उपायों का उपयोग करें जिनसे दन्त क्षय पूरी तरह ठीक हो सके।

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