थाइराइड जांच के तरीके

थाइराइड एक साइलेंट किलर है जो शरीर को धीरे-धीरे समाप्त करता है। इसलिए थाइराइड का पता चलने पर तुरंत जांच कराकर थाइराइड का उपचार करें। 

Atul Modi
Written by: Atul ModiPublished at: Feb 13, 2013
थाइराइड जांच के तरीके

भागदौड़ भरी जिंदगी में हम आए दिन सिर दर्द, बदन दर्द और बुखार जैसी समस्याओं से घिरे रहते हैं। कई बार इनसे जल्दी छुटकारा पाने के लिए हम पेनकिलर का सहारा लेते हैं। ऐसा करना हमारे शरीर के लिए काफी नुकसानदायक साबित हो सकता है। अगर ये समस्याएं लंबे समय से आपको परेशान कर रही हैं तो ऐसे में डॉक्टर से सलाह लेना बहुत जरूरी है। क्योंकि कई बार ऐसी समस्याएं थाइरॉइड का लक्षण भी हो सकती हैं। 

ऐसे में यह जरूरी है कि इस लंबे समय तक इस तरह की समस्या होने पर अपने डॉक्टर से परामर्श लें। जिससे समय रहते थाइरॉइड की जांच कराई जा सके। साथ ही थायराइड का पता चलने पर समय रहते इसका आसानी से उपचार किया जा सके। 

thyroid

थाइरॉइड हमारे शरीर के लिए काफी नुकसानदायक साबित हो सकता है। वर्तमान समय में यह बहुत ही आम समस्या बन गई है। यह देश की कुल जनसंख्या के एक प्रतिशत लोगों में पाई जाती है। थाइरॉइड एक साइलेंट किलर है यह आपके शरीर को धीरे-धीरे खोखला कर देता है। ऐसे में यह जरूरी है कि थाइरॉइड के लक्षण दिखाई देने पर इसकी तुरंत जांच करा लें और इसके उपचार में किसी भी लापरवाही न बरतें। इसके उपचार में देरी आपके लिए बड़ी समस्या बन सकती है।

थायराइड के लक्षण महसूस होने पर आप थाइरॉइड के फंक्शन की जांच (Thyroid Function Tests-TFTs) टेस्ट करवा सकते हैं। थाइरॉइड टेस्ट करने का यह टेस्ट काफी सामान्य है। शरीर में बुखार और थकान होने जैसी सामान्य समस्याओं में भी यह टेस्ट करवाने की सलाह दी जाती है। लेकिन थाइरॉइड की जांच कराने से पहले अपने डॉक्टर से परामर्श लेना बहुत जरूरी होता है। किसी अच्छे डॉक्टर सलाह लेने के बाद ही प्रयोगशाला में यह जांच करवानी चाहिए।

थाइरॉइड जांच के तरीके  

फिजियोलॉजी

थाइरॉइड ग्रंथि से हाइपोथैलमस, पिट्यूटरी ग्रंथियां और थाइरॉइड सभी मिलकर थाइरॉक्सिन (Thyroxine-T4) और ट्राइआयोडोथाइरोनाइन (Triiiodothyronine-T3) के निर्माण में सहयोग करते हैं। थाइरॉइड को उकसाने वाले हार्मोन थाइरॉइड से टी-3 और टी-4 को छोडते हैं। थाइरॉक्सिन या टी-4 थाइरॉइड से निकलने वाला मुख्य हार्मोन है। फिजियोलॉजी के जरिए इन हार्मोन की जांच लैब में की जाती है जिससे थाइरॉइड का पता लगता है। इसलिए थाइरॉइड की समस्या होने पर रोगी को फिजियोलॉजी करवाना चाहिए।

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स्क्रीनिंग

थाइरॉइड की समस्या होने पर स्क्रीनिंग जांच भी करवा सकते हैं। हालांकि स्क्रीनिंग के जरिए थाइरॉइड से ग्रस्त मरीज की पूरी तरह से पॉजिटिव जांच कर पाना संभव नहीं होती है लेकिन स्क्रीनिंग जांच कई मामलों में थाइरॉइड के मरीजों के लिए काफी फायदेमंद होती है। थाइरॉइड के जन्मजात मरीज और शिशुओं की स्क्रीनिंग जांच से थाइरॉइड का पता लग जाता है। मधुमेह रोगियों (टाइप-1 और टाइप-2) में स्क्रीनिंग से थाइरॉइड की जांच संभव है। टाइप-1 मधुमेह से पीडित महिला और बच्चा होने के तीन महीने बाद महिला की थाइरॉइड की जांच करने  के लिए की जा सकती है।

थायराइड फंक्शन टेस्ट (टीएफटी) 

मरीज को हाइपोथाइरॉइड है या हाइपरथाइरॉइड इसका पता लगाना बहुत ही जरूरी होता है। इससे मरीज का इलाज बेहतर तरीके से करने में मदद मिलती है। मरीज का थाइरॉइड सुनिश्चित करने के लिए मरीज का थाइरॉइड फंक्शन टेस्ट (TFTs) किया जाता है। इसके लिए थाइरॉइड को उकसाने वाले हार्मोन (Thyroid Stimulating Hormone-TSH) की जांच की जाती है। 80-90 प्रतिशत मरीजों में टीएसएच सीरम ज्यादा घातक होता है। 

हाइपोथाइरॉइडिज्म से ग्रस्त मरीज में टीएसएच का स्तर बढता है और हाइपरथाइरॉइडिज्म के मरीज में टीएसएच का स्तर घटता है। टीएफटी जांच से टीएसएच सीरम की संवेदनशीलता का पता चलता है, जिससे थाइरॉइड के मरीज का इलाज समय से पहले किया जा सकता है।

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निगरानी करके

मरीज की निगरानी करना भी थाइरॉइड का पता लगाने में काफी फायदेमंद हो सकता है। थाइरॉइड के मरीज के व्यवहार को देखकर कुछ हद तक थाइरॉइड की जांच की जा सकती है। इसी तरह प्रसव के बाद महिला के स्‍वास्थ्य को देखकर काफी हद तक थाइरॉइड का पता लगाया जा सकता है। टाइप-1 मधुमेह से ग्रसित लोगों के दैनिक क्रियाकलापों को देखकर, गर्दन को हिलाने में या इधर-उधर देखने में दिक्कत होने पर, कई दिनों सामान्य स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍या फीवर या सर्दी-जुकाम आदि होने पर इसकी जांच की जा सकती है।

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