तंदुरुस्ती का नया फंडा बना आशावाद

By  ,  दैनिक जागरण
Jul 27, 2010

आशावादकर ली गई है मस्तिष्क के उस हिस्से की खोज, जहां से निकलती है आशा की किरण। अब अवसाद (डिप्रेशन) के तंत्र को समझने और ठीक करने में भी मिल सकेगी मदद क्‍योंकि आशावादी बनने में मदद करने वाले मस्तिष्क के हिस्सों की शिनाख्त की वैज्ञानिकों ने ।

 

न्यूयार्क, प्रेट्र/भाषा : आशा की एक किरण जीवन में क्रांति ला सकती है। अब हम इस क्रांति से बहुत दूर नहीं हैं। वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क के उस हिस्से की शिनाख्त कर ली है जहां से निकली आशा की ज्योति हमारी  जिंदगी को रोशन करती है। विज्ञान पत्रिका नेचर में शुक्रवार को  प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया है कि कुछ लोगों में आशावादी होने का रुझान होता है। वे आम लोगों के मुकाबले ज्यादा साल तक जीते और ज्यादा तंदरुस्त होते हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि आशावाद को जन्म देने वाले मस्तिष्क के इन इलाकों की शिनाख्त से इस रुझान को समझने में मदद मिलेगी। अवसाद (डिप्रेशन) का रिश्ता निराशावाद से है। यह मस्तिष्क के उसी संजाल को प्रभावित करता है। लिहाजा इस खोज से अवसाद के तंत्र को समझने और उन्हें ठीक करने में भी सहायता मिल सकती है।रिपोर्ट में बताया गया है कि न्यूयार्क यूनिवर्सिटी की एलिजाबेथ फेल्प्स और उनके सहयोगी अचानक ही आशावाद  से रुबरु हो गए। वह उस समय यह जानने की कोशिश कर रहे थे कि क्या होता है जब लोग अतीत और भविष्य  की भावुक घटनाओं की कल्पना करते हैं।

 

एलिजाबेथ और उनके सहयोगियों ने अध्ययन में हिस्सा लेने वाले स्वयंसेवकों को कोई इनाम जीतने या किसी रुमानी रिश्ते के टूटने जैसी घटनाओं के बारे में कल्पना करने के लिए कहा। उन्होंने उसी समय फंक्शनल मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (एफएमआरआई) का उपयोग कर उनके दिमागों की स्कैनिंग की। लेकिन अपने इस प्रयोग के दौरान अध्ययनकर्ताओं को एक समस्या पेश आ गई। स्वयंसेवक उन्हें पेश आ रही खराब चीजों की कल्पना ठीक से नहीं कर पा रहे थे। वे बाल कटाने जैसे अपेक्षाकृत निरपेक्ष घटनाओं को सकारात्मक चीजों के रूप में ले लेते थे। फेल्प्स ने इस संबंध में अपने अनुभव का जिक्र करते हुए कहा कि  भविष्य की नकारात्मक घटनाओं की लोगों से कल्पना कराना बहुत मुश्किल है। वह कहती हैं कि इसीलिए उनके दल ने केंद्रीकरण का अपना बिंदु ही बदल दिया। उन्होंने इसकी जगह आशावाद पूर्वाग्रह से जुड़े मस्तिष्क के हिस्सों को देखने का फैसला किया। नए प्रयोगों के तहत फेल्प्स और उनके सहयोगियों ने अध्ययन में हिस्सा ले रहे स्वयंसेवकों से ऐसी सकारात्मक और नकारात्मक घटनाओं की कल्पना करने के लिए कहा जो या तो अतीत में हुई थीं या भविष्य में होने वाली हैं।

 

नेचर की रिपोर्ट में बताया गया है कि इस तरह की कल्पना के बाद स्वयंसेवक एक मानक मनोवैज्ञानिक परीक्षा का उपयोग कर (व्यक्तित्व की एक सामान्य विशेषता के रूप में) आशावाद के अपने स्तर की गणना करते। अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि भविष्य में आशावादी घटनाओं की कल्पना करने से उसके साथ ही मस्तिष्क में दो हिस्सों में गतिविधि होती। मस्तिष्क के ये हिस्से आम तौर पर यह नियमित करते हैं कि कैसे भावनाएं, हमारी याददाश्त और फैसलों को प्रभावित करती हैं।

 

अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि मस्तिष्क के इन दो हिस्सों में से एक एमिगडाला है जो मस्तिष्क की गहराई में स्थित है। दूसरा एंटिरियर सिंगुलेट कार्टेक्स (एसीसी) है जो आंख के ठीक पीछे स्थित होता है। जब स्वंयसेवक भावी नकारात्मक घटनाओं के बारे में सोचते तो दो हिस्सों में सक्रियता औसत से नीचे चली जाती। नेचर ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि लोग खुद को जितना ज्यादा आशावादी मानते हैं एसीसी में उतनी ही ज्यादा गतिविधि होती है।

 

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