जीरो कैलोरी मिठास का कड़वा सच

By  ,  दैनिक जागरण
Nov 23, 2011

zero calorie meethas ka karwa sach

सिरदर्द, अनिद्रा, अवसाद, पेट दर्द, मिर्गी, स्मृति क्षरण और अस्थमा की सौगात देते हैं मीठे रसायन ।

 

डा. सीमा जावेद, लखनऊ : शक्कर के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल होने वाले रसायन आपके मुंह में मिठास भले ही घोलते हों पर यह शरीर पर दुष्प्रभाव भी डालते हैं। इनसे सिरदर्द, अनिद्रा, अवसाद, पेट दर्द आदि होते हैं। भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान के इन्वायरमेंटल न्यूज एंड इन्फार्मेशन सेंटर की प्रभारी डा. फरहत निगार जाफरी के मुताबिक शक्कर के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले सुक्रोलोज, एस्पार्टेम, सैकरीन, मेथनाल, साइक्लेमेट और ऐलीटेम जैसे रसायनों का प्रयोग खानपान में तेजी से बढ़ रहा है। रसायनों के विषाक्त प्रभावों को सूचीबद्ध करने में लगी डा.जाफरी कहती हैं कि ये रसायन चीनी से कई सौ गुना अमिगधिक मीठे होने के साथ-साथ 'जीरो कैलोरी' होते हैं। इसकी वजह से मधुमेह रोगी जहां मिठास के स्वाद की तृप्ति के लिए इनका इस्तेमाल करते हैं, वहीं वजन को नियंत्रित करने में जुटे मोटापे के शिकार लोग भी इनका भरपूर उपयोग करते हैं। विडंबना तो यह है कि ऐसे कई रसायन मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई) के डा. सुभाष चन्द्र के अनुसार इन रसायनों का सेवन करने वाले लोगों को शायद ही पता हो कि इनमें मिठास के साथ कड़वा सच भी घुला है।


चीनी से 500 गुना अधिक मीठे सुक्रोज का प्रयोग अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियां शीतल पेय बनाने में कर रही हैं। इसके विषविज्ञान परीक्षणों के अनुसार यह 1,6 डाई क्लोरो फ्रक्टोज में विघटित होता है जो अत्यंत विषैला है। इससे सिरदर्द, अनिद्रा, अवसाद होते हैं।

 

एस्पार्टेम पर अमेरिका के मीसीसिपी चिकित्सा विश्वविद्यालय के डा. रसैल एल ब्लेकलोक,  एमोरी चिकित्सा विश्‍वविद्यालय के डा लुईस जे इलास, कैलीफोर्निया विश्‍वविद्यालय के विलियम एम पैटरिज द्वारा किए गए विस्तृत शोध के अनुसार यह मानव मस्तिष्क की न्यूरल कोशिकाओं को नष्ट करती है। इसके नियमित सेवन से गर्भस्थ शिशु मानसिक विकलांग हो सकता है। इससे मिर्गी, स्मृति क्षरण, अस्थमा आदि होते हैं। सस्ता होने के कारण पान मसालों, कैंडी, टाफी में मिठास के लिए बहुतायत से इस्तेमाल की जाने वाली सैकरीन का इस्तेमाल होता है। आईआईटीआर के फूड टाक्सीकोलाजी विभाग के वैज्ञानिकों के अनुसार साठ के दशक में सैकरीन पर किए गए विस्तृत शोध में इसे स्वास्थ्य के लिए घातक पाया गया। अधिक मात्रा में इसके सेवन से मूत्राशय का कैंसर होता है।

 

Loading...
Is it Helpful Article?YES9 Votes 13417 Views 1 Comment
संबंधित जानकारी
  • सभी
  • लेख
  • स्लाइडशो
  • वीडियो
  • प्रश्नोत्तर
This website uses cookie or similar technologies, to enhance your browsing experience and provide personalised recommendations. By continuing to use our website, you agree to our Privacy Policy and Cookie Policy. OK