जहां और भी है एलोपैथी के सिवा

By  ,  सखी
Oct 27, 2010
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एलोपैथीअलग-अलग धर्म, जाति, नस्ल, वर्ग के बावजूद मानव-जाति का मकसद एक है- उसकी और उसकी भावी नस्लों की जिंदगी बेहतर हो सके। इसी के लिए तमाम अनुसंधान हो रहे हैं। चिकित्सा क्षेत्र में भी अलग-अलग पद्धतियां हैं। कुछ मुख्यधारा में शामिल हैं तो कुछ वैकल्पिक पद्धतियां कहलाती हैं, लेकिन लक्ष्य सभी का एक है-स्वस्थ तन-मन का निर्माण। एलोपैथी से जहां तुरंत नतीजे मिलने का दावा किया जाता है, वहीं होमियोपैथी के पैरोकार रोग को जड से खत्म  करने की बात करते हैं। आयुर्वेद अनुशासन व सही खानपान को महत्व देता है तो एक्यूप्रेशर-एक्यूपंक्चर जैसी पद्धतियां शारीरिक दर्द को कम करने के लिए प्रयासरत हैं।

 

होमियोपैथी

साइड-इफेक्ट से मुक्ति

 

उपचार में प्रकृति के नियम बहुत काम आते हैं, इन्हीं पर आधारित है होमियोपैथी। गाजियाबाद (उप्र) में आरोग्य ज्योति क्लिनिक के डॉ.राजीव शर्मा कहते हैं, यानी हडबडी, दुख और मसालेदार भोजन ही रोगों का कारण है। आज की जीवनशैली इन तीनों से घिरी है, जिसमें स्वस्थ रह पाना बहुत मुश्किल है। होमियोपैथी लक्षणों पर आधारित पद्धति है। समान रोग में अलग लोगों की दवा अलग हो सकती है। हर पद्धति की तरह इसकी भी सीमाएं हैं। लेकिन इसमें सामान्य लक्षणों के आधार पर दवा दी जाती है। इसमें रोग का स्थायी उपचार संभव है, क्योंकि यह रोग को जड से खत्म करता है।

 

एंटीबायोटिक्स का सही विकल्प

 

इसके कोई साइड-इफेक्ट नहीं हैं। एंटीबायोटिक्स की तरह यह पाचन-क्रिया पर कुप्रभाव नहीं डालती, न इससे किसी तरह की एलर्जी होती है। लंबे समय तक लेने के बावजूद इसके हानिकारकप्रभाव नहीं देखे गए हैं। टॉन्सिल्स, साइनस, यूरिनरी  इन्फेक्शन,  डायरिया, डिसेंट्री, टीबी, ब्रोंकाइटिस, निमोनिया जैसे संक्रमणों में यह कारगर है। इसके अलावा वायरल इन्फेक्शंस जैसे कफ-खांसी, इन्फ्लूएंजा, मीजल्स, चिकनपॉक्स,  जॉन्डिस  में भी यह बहुत प्रभावकारी उपचार है। एलर्जी, एस्थमा, माइग्रेन, एसिडिटी, पेप्टिक  अल्सर जैसी तमाम बीमारियों में भी इसका उपचार कारगर रहा है।

 

भ्रांतियां और सत्य

 

भ्रांति:  होमियोपैथी का असर धीमा होता है।

सच: बुखार,  डायरिया, एलर्जी, एस्थमा, माइग्रेन व अर्थराइटिस जैसे रोगों में यह जल्दी नतीजे देता है। लेकिन इसकी कुछ सीमाएं हैं।

भ्रांति:  गंभीर रोगों में इसकी भूमिका कम है।

सच: गंभीर रोगों जैसे निमोनिया, टॉन्सिल्स,  हेपेटाइटिस  जैसी गंभीर समस्याओं को जड से खत्म  करने में होमियोपैथी कारगर रहा है।

भ्रांति: यह बच्चों के लिए ज्यादा प्रभावकारी है।

सच: यह सभी के लिए सुरक्षित है, क्योंकि नियमित सेवन के बावजूद इसके साइड-इफेक्ट नहीं हैं। बच्चों की व्यवहार संबंधी परेशानियों के अलावा यह फोबिया, भय, नाखून  कुतरने, बिस्तर गीला करने, अंगूठा चूसने जैसी मनोवैज्ञानिक समस्याओं में भी कारगर है।

भ्रांति: इसमें परहेज बहुत होते हैं।

सच: यह सही है कि इसमें परहेज बताए जाते हैं, लेकिन वे बीमारी से ही जुडे हैं। यदि किसी दवा में प्याज मिलाया गया है तो प्याज खाने से दवा का प्रभाव कम हो जाएगा।

पेशाब में जलन है तो मिर्च खाने से समस्या बढेगी। इसलिए इसमें सामान्य परहेज ही बताए जाते हैं।

 

आयुर्वेद

 

प्राकृतिक नियमों से उपचार

आयुर्वेद जीवन का विज्ञान है। इसका मकसद मनुष्य का शारीरिक, मानसिक, सामाजिक व आध्यात्मिक कल्याण करना है। अथर्व-वेद में इसका उल्लेख मिलता है। मूलचंद आयुर्वेद अस्पताल,  मूलचंद मेडिसिटी, नई दिल्ली के कंसल्टेंट डॉ. एस.वी. त्रिपाठी कहते हैं, आयुर्वेद को सृष्टि के पांच महा-तत्वों पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश व वायु के अनुसार बांटा गया है। इन्हें पंच-महाभूत कहा जाता है। ये ब्रह्मांड को संचालित करते हैं। आयुर्वेद में वात, कफव पित्त को संतुलित करने की बात की जाती है। यदि ये संतुलित हैं तो व्यक्ति स्वस्थ रहता है और इनमें असंतुलन से बीमारियां पैदा होती हैं।

आयुर्वेद हजारों  वर्र्षो  पुरानी चिकित्सा पद्धति है। इसे पूर्ण विज्ञान माना गया है। यह बीमारी को उसके मूल में जाकर पकडता है और तब उपचार करता है। प्रकृति के अनुरूप चिकित्सा की जाती है इसमें।

हर उम्र की समस्याओं व व्याधियों के लिए आयुर्वेद में उपचार संभव है। स्त्रियों में माहवारी शुरू होने, गर्भावस्था, स्त्री रोगों और बाद में मेनोपॉज  सिंड्रोम जैसी तमाम समस्याओं  में आयुर्वेद कारगर है। बढती उम्र में ऑस्टियो-अर्थराइटिस, भूलने की आदतों में भी आयुर्वेद काम करता है। आयुर्वेद का मूल लक्ष्य है, प्रकृति के नियमों के अनुसार चलना। ब्रह्मा मुहूर्त में उठना, सही समय पर सोना, सात्विक खानपान व विचार, सक्रिय जीवनशैली स्वस्थ रहने के लिए जरूरी  है। मन-विचार-आत्मा की शुद्धि सेहतमंद जिंदगी के लिए अनिवार्य है। आयुर्वेद में योग, ध्यान व मसाज  को भी महत्व दिया गया है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेदिक उपाय आयुर्वेद में अच्छे स्वास्थ्य के लिए जीवनशैली को सुधारने पर बल दिया गया है। इसके अनुसार सेहतमंद  जिंदगी  के चंद उपाय इस तरह हैं-

  • दिन भर हर आधे घंटे में गर्म पानी पीना वात और कफदोषों को दूर करने और पाचन-शक्ति को दुरुस्त करने में सहायक है। इसका अधिक प्रभाव देखने के लिए उबले हुए पानी में लहसुन की एक-दो फांक भी उबाल सकते हैं।
  • व्यायाम जरूरी  है, लेकिन इसकी सीमा भी जानें। थकान होने पर एक्सरसाइज  न करें। प्रतिदिन 45  मिनट का व्यायाम स्वस्थ रहने केलिए पर्याप्त है। यह अगर सुबह किया जाए तो ज्यादा  फायदेमंद है। स्वस्थ जीवन के लिए योग भी जरूरी  है।
  • सुबह स्नान से पूर्व पूरे शरीर में तेल की मसाज  बहुत लाभ पहुंचाती है। यह मालिश सिर से शुरू होकर कंधे, हाथ, पीठ और पैरों तक लगभग 15  मिनट तक करनी चाहिए।
  • अच्छी नींद बहुत जरूरी  है। आयुर्वेद में रात 10  बजे से पहले सोने पर बल दिया जाता है। रात में गुनगुने पानी से स्नान करना, संगीत सुनना, हलका भोजन और अरोमा ऑयल का प्रयोग लाभदायक होता है।
  • आयुर्वेद में अनुशासित जीवनशैली और स्वस्थ खानपान को विशेष महत्व दिया गया है। खाना कम और सही समय पर 4-6  घंटे के अंतराल पर खाएं। खाते समय टीवी, किताबों से दूर रहें। जमीन पर बैठकर भोजन करना पाचन-क्रिया के लिए अच्छा रहता है। रात में दाल, मांसाहारी भोजन, दही और चीज  से बचें। सुबह का नाश्ता और शाम का भोजन बहुत भारी न हो। आयुर्वेद में दोपहर के भोजन को पूर्ण भोजन माना गया है। भोजन के बाद 5-10  मिनट शांति से बैठें। भोजन में मसालों के प्रयोग के अलावा छहों स्वाद (नमकीन, मीठा, कडवा, तीखा, कसैला, खट्टा) होने जरूरी हैं। मुख्य भोजन के साथ पानी, लस्सी, छांछ या जूस लिया जा सकता है, दूध नहीं। दूध अलग से या नाश्ते के साथ लें। भोजन ताजा  व अच्छी तरह पका हो।
  • आयुर्वेद घी और दही से बनी लस्सी को महत्व देता है। घी वात और पित्त दोनों के लिए लाभदायक है।
  • पंचकर्म आयुर्वेद का हिस्सा है। मौसम बदलने, विशेषकर वसंत में यह अनिवार्य है। शरीर, मन और आत्मा को पूरी तरह शुद्ध करना इसका उद्देश्य होता है। दस दिन तक हलके भोजन और गर्म पानी के सेवन से पाचन-क्षमता बढती है और शरीर निरोग होता है।

 

एक्यूप्रेशर

 

दर्द, तनाव और दबाव से राहत

वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों में एक्यूप्रेशर व एक्यूपंक्चर लोकप्रिय पद्धति है।  एक्यूप्रेशर बहुत पुरानी पद्धति है, जिसमें शरीर के कुछ खास  पॉइंट्स पर उंगलियों के दबाव से ब्लड सर्कुलेशन ठीक करने की कोशिश की जाती है। माना जाता है कि ज्यादातर  प्रेशर पॉइंट्स  कलाई व उंगलियों के पोर में होते हैं। सही दबाव से ब्लड सर्कुलेशन  बढता है और यह पूरे तंत्रिका-तंत्र को दबाव-मुक्त करते हैं, लेकिन पॉइंट्स  की पहचान सही प्रेक्टिशनर  को ही होती है। एक्यूपंक्चर में सुइयों का प्रयोग किया जाता है। इनके कोई साइड-इफेक्ट नहीं हैं।

दिल्ली स्थित गंगा राम हॉस्पिटल  के सीनियर कंसल्टेंट  (पेन मैनेजमेंट) डॉ. प्रदीप जैन बताते हैं, सिरदर्द, गर्दन के दर्द, साइनस,  पीठ-कमर दर्द, अर्थराइटिस,  मांसपेशियों के खिंचाव या दर्द, तनाव-दबाव, आईस्ट्रेन, सर्दी-जुकाम में यह बहुत कारगर है। चीन में इसका बहुत प्रचलन है। हालांकि यह हानिकारक नहीं है, फिर भी बच्चों के लिए अभी इसका प्रयोग नहीं किया गया है, लेकिन अब कई स्थानों पर स्त्रियों में लेबर पेन होने पर एक्यूपंक्चर का प्रयोग किया जाने लगा है।

 

 

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