चेतना का मस्तिष्क से लेना देना है या नहीं

By  ,  दैनिक जागरण
Jul 12, 2010

(यह दैनिक जागरण की एक्सक्लूसिव खबर है, इसके साथ इस्तेमाल के लिए दिमाग की एक थ्रीडी फोटो भेजी जा रही है। इस पठनीय खबर को पहले पेज पर बाटम ले सकते हैं)

नया खुलासा

-अमेरिकी डाक्टर ने चेतन व अवचेतन के परीक्षण का दावा किया
-हृदयाघात के दौरान दिमागी रूप से मृत मरीजों पर शोध
-मरीजों ने सामान्य होने पर अनुभूति का किया खुलासा
-खुद को सुरंग के मुहाने पर पाया जहां रोशनी फूट रही थी
 
शिकागो, एजेंसियां :
विज्ञान ने चाहे जितनी तरक्की कर ली हो, लेकिन कुछ क्षेत्र आज भी ऐसे हैं जो वैज्ञानिकों के लिए पहेली से कम नहीं हैं। इनमें एक है आदमी का दिमाग और उसकी चेतना। चेतना क्या है? शायद, हमारे जीवित रहने और आसपास के वातावरण व घटनाओं को महसूस कर सकने की क्षमता। लेकिन इतना कहने भर से विज्ञान का काम नहीं चलता। उसे हर चीज को प्रयोगों व उदाहरणों की कसौटी पर परखना होता है। बहरहाल, कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि चेतना मानव मस्तिष्क के किन्हीं अनजान हिस्सों में उठने वाली विद्युतीय तरंग या फिर कोई रासायनिक प्रक्रिया हो सकती है। कुछ के मुताबिक यह दिमाग की सूक्ष्म और अज्ञात प्रक्रिया भर है। कुछ वैज्ञानिक तो स्थूल परिभाषाओं से परे हटकर आत्मा तक भी चले जाते हैं। पर इन सबसे अलग, एक डाक्टर ने लंबे शोध के बाद चेतना को समझने का दावा किया है।

 

न्यूयार्क के विल कार्नेल मेडिकल सेंटर के डाक्टर सैम पार्निया ने बताया कि उन्होंने चेतन और अवचेतन का परीक्षण कर लिया है। पार्निया ने कई वर्ष तक दिल के कुछ ऐसे मरीजों पर शोध किया जो मेडिकल साइंस के हिसाब से मृत घोषित किए जा चुके थे। इनके दिमाग की हलचल खामोश हो चुकी थी। ये मरीज हृदयाघात के दौरान कुछ अनोखी मानसिक या आध्यात्मिक अनुभूतियां महसूस करने का दावा करते थे। हृदयाघात ऐसी अवस्था होती है जिसमें मरीज की चेतना गुम हो जाती है और उसकी सांस व नब्ज थमने लगती है। इस अवस्था से बाहर आने पर इन मरीजों ने बताया कि वे जैसे किसी लंबी सुरंग के मुहाने पर खड़े थे जहां रोशनी फूट रही थी। पार्निया और उनके सहयोगियों ने ऐसे मरीजों का कई सालों तकनिरीक्षण किया और उनके अनुभव पूछे। उनकी टीम ने हृदयाघात की अवस्था के दौरान मरीजों को कुछ विशिष्ट आवाजें सुनाई। होश में आने पर इनसे आवाज के बारे में पूछा गया। डाक्टर पार्निया कहते हैं, अगर इन्हें आवाज का अनुभव हुआ है तो फिर तय है कि दिमाग के सुप्त रहने पर भी इंसान बाहरी चीजों का अनुभव करता है। यदि नहीं तो फिर चेतना का मस्तिष्क से कुछ लेना-देना नहीं। यानी दिमाग का ऐसा हिस्सा जहां हमारी कोई पहुंच नहीं है। पार्निया ने अपना अनुभव 23 अप्रैल को रिसर्च जरनल 'मेडिकल हाइपोथिसिस' में लिखा।

 

अगर यह शोध सही है तो इस विषय पर वास्तव में एक आकर्षक और मौलिक दृष्टि प्रदान करता है। कैनबरा विश्वविद्यालय के सेंटर फार कांशसनेस के डायरेक्टर और फिलासफर डेविड चामर्स कहते हैं। अगर शोध में किए गए दावे सही है तो फिर वैज्ञानिकों के सामने चुनौती होगी इसकी व्याख्या करने और साबित करने की। उन्होंने बताया कि शोध इस बात की कोई व्याख्या नहीं करता कि मस्तिष्क और चेतना अलग-अलग चीजें हैं या फिर एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। मान लो, यदि मरीजों के दावे सिद्ध भी कर लिए जाएं तो भी हृदयाघात की अवस्था में दिमाग की गतिविधियों को ठीक-ठीक मापना नामुमकिन होगा, जैसा कि पार्निया ने किया है। दिमाग की हलचल की माप इलेक्ट्रोइंसेफालोग्राम द्वारा लिए गए। इस तकनीक में मस्तिष्क के याददाश्त वाले हिस्से में बेहद संवेदनशील इलेक्ट्रोड फिट कर दिए जाते हैं। पार्निया के सामने एक बड़ी चुनौती मरीजों द्वारा शरीर से बाहर महसूस होने वाले अनुभवों (आउट आफ बाडी एक्सपीरियंस) के परीक्षण की भी है। जैसा कि कुछ मरीजों ने बताया कि उन्हें कभी-कभी लगता है जैसे वे खुद अपने शरीर से बाहर आ गए हैं और कहीं दूर से खुद को देख रहे हैं। हालांकि पार्निया यह बता पाने में असमर्थ हैं कि मरीज क्या सचमुच अपने शरीर से बाहर जाकर कुछ महसूस करता है। लंदन यूनिवर्सिटी के हेनरिक एहर्सन की माने तो 'आउट आफ बाडी एक्सपीरियंस' कोई वास्तविकता नहीं है। दरअसल ऐसा मानसिक अवसाद या कुंठा के चलते होता है।

 

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