गर्भावस्था और सेक्स की समस्या

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Jan 01, 2013

garbhavastha aur sex ki samasya

गर्भावस्था और सेक्स की समस्या
  
गर्भावस्था में सेक्स करना ठीक है या नहीं, क्या इससे गर्भस्थ शिशु को कोई हानि हो सकती है या गर्भवती स्त्री को कोई तकलीफ। आदि प्रकार के सवाल स्त्री तथा पुरुषों के मन में उठते रहते हैं। जैसे-जैसे गर्भावस्था बढ़ती जाती है, स्त्री की परेशानी भी बढ़ती जाती है। सेक्स के सामान्य तरीके अपनाना इसलिए कठिन हो जाता है, क्योंकि गर्भवती महिला के उदर पर किसी प्रकार का दबाव उसके तथा भ्रूण दोनों के लिए कष्टदायी तथा नुकसानदेह हो सकता है।

वैसे छठे या सातवें माह तक की गर्भावस्था में सेक्स किया जा सकता है, लेकिन विशेष सावधानी के साथ। इसके लिए डॉक्टर की सलाह पर विशेष प्रकार के आसन अपनाए जा सकते हैं। आसन इस प्रकार होना चाहिए, जिससे स्त्री का पेट न दबे, गर्भ पर दबाव न पड़े तथा पीड़ा का अनुभव न हो। आयुर्वेद के अनुसार इसे इस प्रकार परिभाषित किया गया है कि गर्भ के सातवें मास तक सेक्स किया जा सकता है, लेकिन सावधानीपूर्वक। आयुर्वेद का मानना है कि यदि गर्भ में लड़का है तो स्त्री की संभोग की इच्छा नहीं होगी या कम होगी। साथ ही यदि गर्भ में लड़की है तो स्त्री को संभोग की इच्छा बनी रहेगी।

कुछ महिलाएँ इस काल में सेक्स का आनंद नहीं उठा पातीं। कभी-कभी वे इतनी थकान महसूस करती हैं कि उनके भीतर एक आनंदपूर्ण संभोग का मजा उठाने की ऊर्जा और उत्साह नहीं रहता। कई बार रक्त स्राव या योनि में पीड़ा होने के कारण भी वे सेक्स से मना करती हैं। डॉक्टर भी ऐसी स्थिति में पति-पत्नी को सावधानी बरतने की सलाह देते हैं।

पहली बार गर्भवती हुई कई महिलाएँ शुरू के सप्ताहों में सेक्स में जरा भी रुचि नहीं लेती हैं। वहीं दो-तीन माह बीतने पर वे ही महिलाएँ गर्भावस्था में भी सेक्स का भरपूर आनंद उठाती हैं, उनकी प्रतिदिन सेक्स करने की इच्छा होती है।

अध्ययनों से यह पता चला है कि पहली बार गर्भवती हुई महिला की गर्भावस्था के शुरू के सप्ताहों में सेक्स में कम रुचि होती है, जबकि दूसरी या इससे अधिक बार गर्भवती होने वाली महिलाएँ अपनी यौन भावना में कोई विशेष अंतर नहीं पाती हैं।

अध्ययनों से यह भी तथ्य सामने आया है कि कुछ महिलाएँ मानती हैं कि मतली, वमन तथा अवसाद का समय बीत जाने पर उन्हें सेक्स में पहले की तुलना में अधिक आनंद प्राप्त होता है।

पुरुषों को अपनी गर्भवती पत्नियों के समीप रहकर उनमें बराबर रुचि लेते रहना चाहिए। अधिकांश पुरुष शुरू में बहुत ध्यान रखते हैं, लेकिन बाद में सेक्स से वंचित रहने के कारण उनकी रुचि अपनी पत्नी में कम हो जाती है।

कई लोग अपनी पत्नी की ओर से प्यार और ध्यान की कमी महसूस करते हैं और इस कारण उपेक्षा करते हैं, उन्हें सिर्फ आने वाले बच्चे के प्रति मोह रहता है, पत्नी के प्रति कम हो जाता है। वे यह सोचकर तथा कह कर अपने फर्ज की इतिश्री कर लेते हैं कि गर्भवती को तो गर्भावस्था की परेशानियों को सहन करना ही पड़ता है।

गर्भावस्था में पति-पत्नी संभोग के लिए ऐसे आसन अपना सकते हैं, जो सुविधापूर्ण और आरामदेह हों, बशर्तें डॉक्टर ने किसी आसन विशेष के लिए पूरी मनाही न की हो। पूर्व गर्भपात, गर्भावस्था की स्थिति अथवा विशिष्ट स्त्रियोचित समस्या को दृष्टिगत रखते हुए डॉक्टर संभोग से दूर रहने की सलाह भी दे सकता है।
 

गर्भावस्था में सेक्स करना ठीक है या नहीं, क्या इससे गर्भस्थ शिशु को कोई हानि हो सकती है या गर्भवती स्त्री को कोई तकलीफ। आदि प्रकार के सवाल स्त्री तथा पुरुषों के मन में उठते रहते हैं। जैसे-जैसे गर्भावस्था बढ़ती जाती है, स्त्री की परेशानी भी बढ़ती जाती है। सेक्स के सामान्य तरीके अपनाना इसलिए कठिन हो जाता है, क्योंकि गर्भवती महिला के उदर पर किसी प्रकार का दबाव उसके तथा भ्रूण दोनों के लिए कष्टदायी तथा नुकसानदेह हो सकता है।

वैसे छठे या सातवें माह तक की गर्भावस्था में सेक्स किया जा सकता है, लेकिन विशेष सावधानी के साथ। इसके लिए डॉक्टर की सलाह पर विशेष प्रकार के आसन अपनाए जा सकते हैं। आसन इस प्रकार होना चाहिए, जिससे स्त्री का पेट न दबे, गर्भ पर दबाव न पड़े तथा पीड़ा का अनुभव न हो।

आयुर्वेद के अनुसार इसे इस प्रकार परिभाषित किया गया है कि गर्भ के सातवें मास तक सेक्स किया जा सकता है, लेकिन सावधानीपूर्वक। आयुर्वेद का मानना है कि यदि गर्भ में लड़का है तो स्त्री की संभोग की इच्छा नहीं होगी या कम होगी। साथ ही यदि गर्भ में लड़की है तो स्त्री को संभोग की इच्छा बनी रहेगी।

कुछ महिलाएँ इस काल में सेक्स का आनंद नहीं उठा पातीं। कभी-कभी वे इतनी थकान महसूस करती हैं कि उनके भीतर एक आनंदपूर्ण संभोग का मजा उठाने की ऊर्जा और उत्साह नहीं रहता। कई बार रक्त स्राव या योनि में पीड़ा होने के कारण भी वे सेक्स से मना करती हैं। डॉक्टर भी ऐसी स्थिति में पति-पत्नी को सावधानी बरतने की सलाह देते हैं।

पहली बार गर्भवती हुई कई महिलाएँ शुरू के सप्ताहों में सेक्स में जरा भी रुचि नहीं लेती हैं। वहीं दो-तीन माह बीतने पर वे ही महिलाएँ गर्भावस्था में भी सेक्स का भरपूर आनंद उठाती हैं, उनकी प्रतिदिन सेक्स करने की इच्छा होती है।

अध्ययनों से यह पता चला है कि पहली बार गर्भवती हुई महिला की गर्भावस्था के शुरू के सप्ताहों में सेक्स में कम रुचि होती है, जबकि दूसरी या इससे अधिक बार गर्भवती होने वाली महिलाएँ अपनी यौन भावना में कोई विशेष अंतर नहीं पाती हैं।

अध्ययनों से यह भी तथ्य सामने आया है कि कुछ महिलाएँ मानती हैं कि मतली, वमन तथा अवसाद का समय बीत जाने पर उन्हें सेक्स में पहले की तुलना में अधिक आनंद प्राप्त होता है।

पुरुषों को अपनी गर्भवती पत्नियों के समीप रहकर उनमें बराबर रुचि लेते रहना चाहिए। अधिकांश पुरुष शुरू में बहुत ध्यान रखते हैं, लेकिन बाद में सेक्स से वंचित रहने के कारण उनकी रुचि अपनी पत्नी में कम हो जाती है।

कई लोग अपनी पत्नी की ओर से प्यार और ध्यान की कमी महसूस करते हैं और इस कारण उपेक्षा करते हैं, उन्हें सिर्फ आने वाले बच्चे के प्रति मोह रहता है, पत्नी के प्रति कम हो जाता है। वे यह सोचकर तथा कह कर अपने फर्ज की इतिश्री कर लेते हैं कि गर्भवती को तो गर्भावस्था की परेशानियों को सहन करना ही पड़ता है।

गर्भावस्था में पति-पत्नी संभोग के लिए ऐसे आसन अपना सकते हैं, जो सुविधापूर्ण और आरामदेह हों, बशर्तें डॉक्टर ने किसी आसन विशेष के लिए पूरी मनाही न की हो। पूर्व गर्भपात, गर्भावस्था की स्थिति अथवा विशिष्ट स्त्रियोचित समस्या को दृष्टिगत रखते हुए डॉक्टर संभोग से दूर रहने की सलाह भी दे सकता है।

वैसे निर्णय आप दोनों ही लें कि आपके लिए क्या ठीक है और आप कब तक अपने ऊपर संयम रख सकते हैं। गर्भावस्था में सेक्स न करना ज्यादा अच्छा रहेगा, इस पीरियड में स्त्री को जितना आराम दिया जाए व सेक्स से दूरी बनाकर रखी जाए, उतना ही अच्छा है। एक बार अपने चिकित्सक से सलाह अवश्य लें।


  पहली बार मां बनना एक स्त्री को सम्पूर्ण नारी होने का अहसास दिलाता है। यह सिर्फ स्त्री को मां ही नहीं बल्कि उसके पति को पिता बनने का अहसास दिलाता है।
           शादी होने के बाद जब परिवार में कुछ दिनों के बाद नन्हे-मुन्हे मेहमान के आगमन की तैयारी होती है तो उस समय परिवार के हर सदस्य के चेहरे पर एक अलग ही प्रकार की खुशी नजर आती है। सबसे ज्यादा तो उस स्त्री को खुशी होती है जो काफी समय बाद मां बनती है जो सास-ससुर व पड़ोसियों के ताने सुन-सुनकर हताश हो जाती थी।
           ज्यादातर स्त्री-पुरुष अपनी पहली सन्तान के प्रति ज्यादा से ज्यादा खुशी प्रकट करते है। उन दिनों दोनों ही सेक्स की तरफ से ध्यान हटा लेते हैं लेकिन यह ज्यादा दिनों के लिए नहीं हो पाता। कुछ पुरुषों के लिए तो ज्यादा दिनों तक संभोग किए बिने रहना असंभव होता है। वे लोग अपनी पत्नियों को किसी तरह समझा-बुझाकर संभोग के लिए तैयार कर लेते हैं। संभोग करने से पहले पुरुष मन में यह बात सोचता है कि वह संभोग करते समय लिंग को पूरी तरह प्रवेश नहीं करेगा और जल्द ही अलग हो जाएगा। संभोग के दौरान कुछ समय तक तो ध्यान रहता है लेकिन थोड़ी देर बाद ही पुरुष अपने आप से नियंत्रण खो देता है और संभोग में इस तरह खो जाता है जैसे पहले संभोग करने के दौरान हुआ करता था। ऐसे में पुरुष अपने शरीर का सारा बोझ स्त्री के शरीर पर डाल देता है और तेजी से घर्षण कर गलत तरीके के आसनों का प्रयोग करता है। ऐसी तेजी को देखते हुए स्त्री अक्सर पुरुष को रोकती है किन्तु पुरुष कुछ नहीं सुनता।
           हो सकता है दूसरे दिन स्त्री को अपने कपड़े पर रक्त के धब्बे दिखाई दें जिन्हें देख कर उसका घबरा जाना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति को नदरअंदाज नहीं करना चाहिए और बिना समय गवाएं तुरन्त महिला चिकित्सक(Gynecologist) से जाकर चेकअप करवाएं। ऐसे में चिकित्सक यही सवाल करता है कि क्या आपने रात को सम्बन्ध बनाये थे ? महिला को चाहिए कि बिना कुछ छुपाए सब कुछ बता दे। ताकि चिकित्सक सही प्रकार उपचार कर सकें। कभी-कभी ऐसी भी स्थिति बन जाती है जिसमें गर्भपात करवाना पड़ जाता है।
           ऐसी स्थिति सिर्फ स्त्री के ही लिए नहीं बल्कि उसके पूरे परिवार के लिए दुख का कारण बनता है।
           प्रसव होने तक स्त्री को 9 महीने तक बच्चे को अपने गर्भ में पालना होता है। ऐसे में शारीरिक संबंधों के समय थोड़ी भी असावधानी होने मात्र से समस्या उत्पन्न हो सकती है। यह स्थिति ‘एबार्शन’ करवाने तक की हो सकती है। ऐसा नहीं है कि एक बार एबार्शन होने के बाद स्त्री दोबारा मां नहीं बन पायेगी लेकिन पहली सन्तान के प्रति सभी को काफी लगाव होता है। गर्भ ठहरने के साथ ही स्त्री-पुरुष बच्चे के सपने देखने लग जाते हैं। कुछ स्त्रियॉ तभी से बच्चों के पहनने वाले छोटे-छोटे कपड़े बनाने लगती हैं। आने वाले बच्चों को सर्दी से बचाने के लिए स्वेटर बुनने लगती हैं। वे पूरी तरह से मानसिक रूप से अपने होने वाले बच्चे के साथ जुड़ जाती हैं। ऐसे में यदि किसी दुर्घटना अथवा स्वयं की लापरवाही अथवा शारीरिक सम्बन्धों के समय अधिक ‘जोश’ दिखाने से जब गर्भपात की स्थिति बन जाती है, गर्भपात हो जाता है तो यह स्त्री के लिए बड़ा जबरदस्त सदमा साबित होता है और कई स्त्रियां इस सदमे से लम्बे समय तक उबर नहीं पाती हैं।
           हमारे समाज में विवाह का अर्थ केवल यौन सुख का भोग मात्र नहीं है क्योंकि विवाह के होते ही उसके साथ यौन सुख तो अपने आप जुड़ जाता है। विवाह के पश्चात पति-पत्नी पर दो प्रकार की विशेष जिम्मेदारियां आती हैं। एक, मिल जुलकर परिवार चलाना, पारिवारिक व्यवस्था को बनाना तथा दो, सन्तानोत्पत्ति द्वारा वंश वृद्धि में अपना योगदान देना। जो पति-पत्नी इन दोनों जिम्मेदारियों को पूरा नहीं करते हैं, उनका जीवन पूर्ण नहीं माना जा सकता। इसलिये सन्तान को जन्म देना, उनका पालन-पोषण करना महत्वपूर्ण एवं अत्यावश्यक जिम्मेदारी मानी जाती है। इसलिए विवाह के बाद जब गर्भ की स्थिति बन जाती है तो पति-पत्नी दोनों को ही अत्यन्त संयम और सूझ-बूझ से काम लेना चाहिए। इस समय जरा सी असावधानी गर्भ में पल रहे शिशु को तो हानि पहुंचाती ही है, साथ में कई बार स्त्री का जीवन भी खतरे में पड़ जाता है।
           ऐसे पुरुषों की भी कमी नहीं है जो अपने ऊपर संयम रख ही नहीं पाते हैं। सेक्स के प्रति उनका जितना आकर्षण होता है, आने वाली सन्तान के प्रति उतना उत्साह नहीं होता है। ऐसे स्त्री-पुरुष गर्भावस्था में भी अपने पर संयम नहीं रख पाते और शारीरिक सम्बन्धों में संलग्न बने रहना चाहते हैं। वे इस बात को नहीं समझ पाते कि इस समय किया गया सम्भोग कितना नुकसान देने वाला हो सकता है।
गर्भावस्था में सेक्स
           चिकित्सा विज्ञानियों का मानना है कि वैसे तो गर्भ की पूरी अवस्था में शारीरिक संबंधों से दूर रहना चाहिए, प्रसव के पश्चात भी लगभग छः सप्ताह तक संबंध नहीं बनाने चाहिए। इस प्रकार लगभग साढ़े दस माह की अवधि बनती है। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या इतनी अवधि तक व्यक्ति सेक्स से दूर रह सकता है? जो व्यक्ति केवल सिद्धांत बनाने का काम करते हैं, वे बेहिचक कह सकते हैं कि इस अवधि में सेक्स नहीं करना चाहिए। इसके बावजूद अधिकांश व्यक्ति इस बात को स्वीकार नहीं कर पाते हैं। इसके पीछे भी पुख्ता तर्क, कारण और स्थितियां हैं, उनकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती है।
           आजकल 21 से लेकर 25 साल की आयु तक व्यक्ति का विवाह हो जाता है। इसी अनुपात में उसकी पत्नी की आयु भी 18 से लेकर 23 के बीच ही होती है। पति एवं पत्नी को काम भावनायें इस समय प्रचण्ड वेग पर होती हैं। इस समय एक से अधिक बार भी शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाते हैं, तब भी इन्हें गलत नहीं माना जाता है। विशेष रूप से पति इन सम्बन्धों का अधिकाधिक आनन्द प्राप्त करना चाहता है। उसके दिल में काफी समय से स्त्री के प्रति आकर्षण का भाव उमड़ता रहा होता है। विवाह होने से पहले अनेक प्रकार की कल्पनायें जन्म लेती रहती हैं। विवाह के बाद उन समस्त कल्पनाओं को साकार करने का समय आता है। पति के समाने पत्नी के होने का अर्थ सेक्स सम्बन्धों द्वारा अधिक से अधिक आनन्द प्राप्त करना प्रमुख आकर्षण होता है। अधिकांश स्त्रियां 3-4 माह की अवधि में गर्भवती हो जाती हैं। ऐसे में परिवार वाले भी उम्मीद करते हैं कि विवाह के साल भर के भीतर घर में बच्चा आ जाना चाहिए। पत्नी के गर्भधारण करते ही पति की समस्त सेक्स गतिविधियों पर प्रतिबंध लग जाता है। उसके लिए यह स्थिति वास्तव में अत्यन्त कष्टपूर्ण होती है।
            ऐसा देखने में आता है कि स्त्री के गर्भधारण करते ही वह तो आने वाले शिशु के प्रति कोमल भावनाओं से ओत-प्रोत होने लगती है, लेकिन पति के दिल में इस प्रकार की भावनाओं का कुछ अभाव रहता है। मानसिक रूप से वह चाहता है कि अभी उनके बीच बच्चे का आना उचित नहीं है। यह एक प्रमुख कारण है कि पत्नी द्वारा गर्भवती होने के बाद भी पत्नी के शरीर के प्रति उसके आकर्षण में किसी प्रकार की कमी नहीं आती है। आज से पहले जब संयुक्त परिवार की व्यवस्था थी तब स्त्री के गर्भधारण के पश्चात उसे पति से लगभग अलग ही कर दिया जाता था। ऐसी भी स्थितियां बन जाती थी, जहां पत्नी को रात में भी घर की अन्य महिलायें अपने पास ही सुलाती थी। तब गर्भ सम्बन्धी समस्यायें कम देखने में आती थी। आज स्थितियां वैसी नहीं हैं। अधिकांश घर ऐसे मिलेंगे जहां पति पत्नी ही रहते हैं। साथ में यदि अन्य सदस्य भी हों, तब भी परिवार खास नहीं होता और न पति-पत्नी पर किसी प्रकार की पाबंदियां लग पाती हैं। वर्तमान में व्यक्ति का सेक्स के प्रति जिस प्रकार से आकर्षण बढ़ा है, उसे देखते हुए किसी भी व्यक्ति के लिए ऐसा सम्भव दिखाई नहीं देता कि वह लगभग साढ़े दस माह तक सेक्स से दूर रह पायेगा। विद्वान चिकित्सक भी इस बात को मानने लगे हैं कि गर्भ की पूरी अवधि तथा गर्भ के बाद छः हफ्ते की अवधि तक किसी को ऐसी सलाह देना कि सेक्स मत करो, व्यवहारिक नहीं लगता है। इसलिए ऐसा रास्ता निकालना होगा कि पत्नी को किसी समस्या का सामना भी न करना पड़े और पति की इच्छापूर्ति का रास्ता निकल आये।
पतियों के लिए चेतावनी
           गर्भावस्था में सेक्स किस प्रकार किया जा सकता है फिर भी समस्त पतियों को यह चेतावनी देना आवश्यक है कि गर्भावस्था में सेक्स के समय अपनी भावनाओं के ज्वार पर विशेष रूप से नियंत्रण रखना आवश्यक है। पति की एक छोटी सी गलती अथवा अत्यधिक उत्तेजना के कारण न केवल पत्नी को गर्भपात का सामना करना पड़ सकता है, बल्कि कई अवसरों पर उसकी जान भी जा सकती है। पति को गर्भ की स्थिति में पत्नी के शरीर के आकर्षण के साथ-साथ आने वाले शिशु के साथ भी अपने आपको मानसिक रूप से जोड़ने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में जितना महत्व उपवास का माना जाता है उतना ही महत्व गर्भावस्था में सेक्स के समय अपनी भावनओं पर नियंत्रण रखने का भी है। उपवास में व्यक्ति पूरी तरह से आहार का त्याग करता है, अल्पाहार करता है, एक समय खाता है या फिर पानी पर ही रहता है। ऐसी ही स्थिति व्यक्ति को सेक्स में अपनानी होगी। सेक्स के साथ-साथ ऐसे समय अपने को मानसिक एवं भावनात्मक रूप से पत्नी के साथ जोड़ने का प्रयास करें। निश्चित रूप से पत्नी के दिल में आपके प्रति प्यार की गहराई में वृद्धि होगी।
गर्भावस्था में सेक्स के उपाय
           पत्नी के गर्भावती होने का पता चलते ही प्रथम दो माह तक सम्बन्धों का त्याग करने का प्रयास करें। अन्तिम एक माह में भी सेक्स से दूर रहने का प्रयास करें। प्रसव के पश्चात् लगभग चार सप्ताह तो वैसे ही निकल जाते हैं। इसमें अधिकांश व्यक्ति सेक्स के प्रति इच्छुक भी नहीं रहता है। यहां पर कुछ उपाय बताये जा रहे हैं जिन्हें सभी पति विचार करके अपनाने का प्रयास करंगे-
1. गर्भ की स्थिति के प्रथम तथा अन्तिम सप्ताह में योनि प्रवेश से बचने का प्रयास श्रेयस्कर है। ऐसे में अपनी उत्तेजनाओं पर नियंत्रण रखें। सप्ताह रखें। सप्ताह में 2-3 बार शारीरिक छेड़छाड़ द्वारा आनन्द प्राप्त किया जा सकता है। ऐसे समय पत्नी अपनी हथेलियों द्वारा स्खलन में मदद कर सकती है। अनेक स्थितियों में व्यक्ति को इसमें शारीरिक सम्बन्धों जितना आनन्द प्राप्त हो जाता है। यहां इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि पत्नी पर दबाव नहीं डालें। अनेक यौन रोग विशेषज्ञ इस अवस्था में मुखमैथुन को बुरा नहीं मानते हैं। इसमें पुरुष को आनन्द प्राप्त होता है, वहां तक तो ठीक है किन्तु आमतौर पर स्त्रियां अपनी इच्छा से तैयार नहीं होती हैं। पति की इच्छा रखने, उसकी नाराजगी से बचने के लिए वे मन मारकर तैयार हो सकती हैं। समस्त पुरुषों को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि गर्भ के समय पत्नी के साथ ऐसा कोई व्यवहार नहीं करें जिससे उसके मन-मस्तिष्क पर विपरीत प्रभाव पड़ें।
2. लिंग प्रवेश पूरी तरह न करके सिर्फ आधा प्रवेश करें। कोहनियों को नीचे टिकायें और बहुत धीरे-धीरे घर्षण करें। शिश्न मुण्ड सबसे ज्यादा संवेदनशील होता है। स्खलन में लिंग मुण्ड की संवेदनशीलता प्रमुख भूमिका निभाती है। इसलिए केवल शिश्न मुण्ड ही प्रवेश करके धीरे-धीरे घर्षण किये जायें तो भी व्यक्ति पूर्ण आनन्द प्राप्त कर सकता है। ध्यान रहे कि लिंग का पूरा प्रवेश नहीं होना चाहिए और न घर्षणों में तीव्रता होनी चाहिए। अपने शरीर का भार कोहनियों पर रखें। स्त्री शरीर पर बोझ नहीं पड़ना चाहिए।
3. गर्भावस्था के अन्तिम तीन महीनों मे स्थिति को थोड़ा बदलें। अभी भी लिंग का प्रवेश पूरा नहीं करना है। केवल शिश्न मुण्ड ही प्रवेश करायें। हथेलियों को नीचे टिकायें और हाथ एकदम सीधे रखें। ऐसा करने से आपका शरीर स्त्री शरीर से काफी ऊंचा रहेगा। इस अवस्था में गर्भ अपने समय की पूर्णता को प्राप्त कर रहा होता है। पेट का उभार काफी बढ़ जाता है, ऐसे में अपने शरीर जितना सम्भव हो, उतना दूर रखने का ही प्रयास करें। हथेलियां नीचे टिकाकर हाथों को एकदम सीधा करने से पुरुष का शरीर पर्याप्त रूप से ऊंचा उठा रहेगा। इस स्थिति में भूलकर भी लिंग को पूरी तरह से प्रविष्ठ नहीं करना है।
4. गर्भावस्था में करवट बदल कर भी सम्बन्ध बनाए जा सकते है। ऐसे में कुछ व्यक्तियों के साथ समस्या हो सकती है, लिंग प्रवेश में कठिनाई हो सकती है, फिर भी आधा अथवा केवल शिश्न मुण्ड का प्रवेश किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में पुरुष शरीर का भार स्त्री पर नहीं पड़ता है।
5. कुछ विद्वानों का मानना है कि लिंग प्रवेश से बचने के लिए उत्तेजित लिंग को योनि पर रगड़ने मात्र से भी स्खलन किया जा सकता है। स्त्री की भगनासा को हाथों द्वारा सहलाकर उसे भी आनन्दित किया जा सकता है। विद्वानों का ऐसा भी मानना है कि गर्भावस्था में सम्बन्ध बनाने का मुख्य उद्देश्य मात्र स्खलन होता है। यह स्खलन योनि पर रगड़कर किया जा सकता है। बहुत से व्यक्ति ऐसे समय को हस्तमैथुन को भी सहीं मानते हैं किन्तु विवाह के बाद हस्तमैथुन के लिए व्यक्ति तुरन्त तैयार नहीं हो पाता। खासकर उस समय तो बिल्कुल नहीं जब पत्नी उपस्थित हो।
6. इसके अलावा व्यक्ति यदि उचित समझे तो अपने चिकित्सक से राय ले सकता है। सम्भव है कि वह कुछ अन्य सही आसनों के बारे में राय दे सके अथवा व्यक्ति स्वयं अपनी सूझ-बूझ एवं विचार कर रास्ता निकाल सकता है।
विशेष- अधिकांश अवसरों पर दोनों को यही सलाह दी जाती है कि गर्भावस्था में सेक्स नहीं करना चाहिए। चिकित्सक भी अक्सर इसी प्रकार का व्यवहार करते हैं। वे पति-पत्नी को इस बारे में सही प्रकार से कुछ समझ पाने में विफल रहते हैं, अतः इस पर कुछ कहने से बचने के लिए यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि पूरी गर्भावस्था के समय दोनों को सेक्स से दूर रहना चाहिए।
           वर्तमान समय में यह उचित एवं न्याय संगत नहीं लगता कि लगभग 9-10 महीने तक पति सेक्स न करे, यह सम्भव नहीं है। इसलिए कुछ सावधानियां रखते हुए सम्बन्ध बनाये जाते हैं तो इसे गलत नहीं माना जा सकता है। गर्भावस्था में सेक्स करते समय किसी प्रकार की विषम स्थिति उत्पन्न न हो, किसी प्रकार का खतरा न हो, गर्भपात की स्थिति नहीं बने, इन सबके बारे में पति को ही विचार करना होता है। पति यदि जबर्दस्ती करता है, नाराजगी दिखाता है तो पत्नी के लिए सेक्स के लिए स्वयं को प्रस्तुत करने के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं बचता है।
           समर्पण के बाद पति कैसे करता है, कितनी देर करता है, इस पर भी उसका कोई नियंत्रण नहीं रह जाता है। इसलिए यदि गर्भपात की स्थिति का कारण सेक्स सम्बन्ध बनते हैं तो निश्चित रूप से इसके लिए पति को ही जिम्मेदार माना जाएगा। इसलिए पति बेशक सम्बन्ध बनाये किन्तु उस समय सम्बन्ध स्थापित करने के बाद ऐसा व्यवहार भी नहीं करना चाहिए कि मानो पहली बार कर रहे हों।
           ऐसे अनेक व्यक्तियों से हमने जानकारी ली है जिन्होंने गर्भावस्था के समय सम्बन्ध तो बनाये किन्तु पत्नी के लिए किसी प्रकार की समस्या खड़ी नहीं की। उनमें से अधिकांश का मानना है कि केवल मात्र शिश्न मुण्ड प्रवेश करके भी धीरे-धीरे सेक्स का आनन्द लिया जा सकता है। उन्होंने इस बात का भी पूरा ध्यान रखा कि उनके शरीर का बोझ पत्नी के पेट पर न पड़ने पाये। इन सम्बन्धों के समय पत्नी भी मन से सेक्स का आनन्द लेती है। जब किसी प्रकार के खतरे की चिन्ता नहीं रहती तो आनन्द आना स्वाभाविक ही है। मां बनना यदि पत्नी का सपना होता है तो पिता बनने का सपना हर व्यक्ति का भी होता है। पति-पत्नी मिल कर यदि इस सपने को साकार करने का प्रयत्न करते हैं तो इससे अच्छी और क्या बात हो सकती है।
गर्भावस्था में सावधानियां-
           शारीरिक स्वास्थ्य व सौन्दर्य का स्त्री की मानसिक स्थिति से सीधा संबंध है। अतः गर्भावस्था के दौरान स्त्री को मानसिक रूप से हमेशा प्रसन्न रहने का प्रयास रखना चाहिए। इसी प्रसन्नता व सुखद आशा के सहारे गर्भधारण के नौ महीने एक नन्हे मेहमान की प्रतीक्षा में पलक झपकते ही कब बीत गये, पता ही नहीं चलता। इस दौरान नियमित दिनचर्या, पर्याप्त विश्राम, संतुलित भोजन एवं सुखद नींद गर्भिणी के सौन्दर्य के लिए एवं शिशु के स्वास्थ्य के लिए अति आवश्यक हैं।
           गर्भावस्था के दौरान सौन्दर्य बनाये रखने के लिए स्त्री का पूर्ण स्वस्थ रहना आवश्यक है, इसके लिए डॉक्टर के निर्देशन अनुसार नियमित जांच करवाते रहें तथा उसके निर्देशों का पूर्ण पालन करें।
           यह एक मिथ्या भ्रम है कि गर्भावस्था के दौरान स्त्री को आवश्यकता से अधिक कैलोरी का भोजन लेना चाहिए क्योंकि स्त्री शरीर में एक छोटे बच्चे का पालन हो रहा है इसके लिए आवश्यकता से अधिक भोजन करने का प्रयास करती हैं। इससे शरीर बेडौल हो जाता है व प्रसव के पहले एवं बाद में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ध्यान रखें चिकित्सक की सलाह अनुसार ही निश्चित कैलोरी का संतुलित भोजन करें। प्रसव के दौरान दूध-दही व हरी सब्जियां तथा फलों का अपने भोजन में समावेश करें। चाय, कॉफी, मिर्च-मसाले, नमक आदि का सेवन कम करें। नियमित रूप से आठ से दस गिलास पानी अवश्य पीयें। मादक पदर्थों का सेवन कदापि न करें। हो सके तो एक पूर्ण डाइट चार्ट बनवा लें व उसका सख्ती से पालन करें। इससे आपके शरीर में पोषक तत्वों की कमी भी नहीं होगी। गर्भस्थ शिशु का अच्छा विकास होगा व आपका शरीर भी बेडौल नहीं होगा।
           गर्भावस्था के दौरान उचित व्यायाम भी करना चाहिए। इस प्रकार का हल्का व्यायाम सिर्फ डॉक्टर की सलाह से ही करें। सुबह सैर पर जाए। उस समय की शुद्ध ऑक्सीजन से रक्त संचार में वृद्धि होती है व सौन्दर्य में निखार आता है तथा प्रसव के दौरान आसानी भी रहती है।
           गर्भावस्था के दौरान शारीरिक स्वस्थता का पूरा प्यार रखना चाहिए। शीत ऋतु में दो बार सामान्य पानी से स्नान अवश्य करें। स्नान से पहले जैतून, नारियल अथवा तिल के तैल से हल्की-हल्की मालिश भी करवा सकती हैं। सप्ताह में एक बार रीठा, आंवला व शिकाकाई के मिश्रण से बालों में शैम्पू करें। बालों में बादाम के तेल की अथवा नारियल के तेल की मालिश करें।
           गर्भावस्था के दौरान उचित मात्रा में कैल्शियम व आयरन लेना चाहिए जिससे सौन्दर्य बना रहे। यदि आपके शरीर में कैल्शियम व आयरन की कमी है तो डॉक्टर की सलाह से पूर्ति के लिए चिकित्सीय निर्देशों का पालन करें।
           गर्भावस्था के दौरान हार्मोन्स के स्तर में काफी परिवर्तन होते हैं। इससे कुछ महिलाओं के चेहरे पर छाया, झांइयां व चकत्ते उभर आते हैं जो प्रसव के पश्चात अधिकांश स्त्रियों में अपने आप ठीक हो जाते हैं। फिर भी चेहरे के सौन्दर्य के लिए घरेलू उपकरणों को इस्तेमाल किया जा सकता है। चने का बेसन, हल्दी व सरसों के तैल से तैयार उबटन करने से त्वचा में निखार आ जाता है या दो बादाम दूध में भिगो दें व सुबह पीस लें। उनमें लौंग या जैतून का तैल मिलाकर चेहरे पर लगाएं। त्वचा खिल उठेगी। मक्खन में थोड़ी सी असली केसर मिलाकर उबटन करने से भी रूप सौन्दर्य का अलग निखार आ जाता है। गर्भावस्था के दौरान विटामिन की अतिरिक्त आवश्यकता होती है। अतः हरी पत्तेदार सब्जियां व ताजे फलों का खूब सेवन करें अथवा डॉक्टर की सलाह से आयरन व विटामिन्स के कैप्सूल नियमित रूप से लें क्योंकि विटामिन की कमी से आंखों की चमक कम हो जाती है। बाल झड़ने लगते हैं। आंखों के नीचे काले धब्बे हो जाते हैं। संतुलित व पोषक तत्वों से युक्त भोजन व नियमित विटामिन लेने से ये समस्याए नहीं आती हैं।
           गर्भावस्था के दौरान कैल्शियम की कमी से नाखून टूटने की शिकायत भी आती है। साथ ही दांतों की चमक भी कम हो जाती है। इसके लिए दूध, दही, पनीर का भोजन में नियमित सेवन करें। डॉक्टर की सलाह अनुसार कैल्शियम की गोलियां अवश्य खायें। कई बार कुछ स्त्रियों के मसूढ़ों में खून आना व दर्द होने की शिकायत आने लगती है। इस समस्या से बचने के लिए नियमित ताजे-खट्टे फलों का सेवन करें जिनमें नींबू, नारंगी व आंवला प्रमुख हैं।
           पैरों में या चेहरे पर सूजन आने की अवस्था में या उच्च रक्तचाप होने पर नमक का सेवन कम कर दें या बंद कर दें। पैरों में सूजन आने पर पैरों को ऊंचा करके लेटें। लम्बे समय तक खड़े होकर काम न करें। बीच-बीच में आराम लेती रहें। गर्भावस्था के दौरान अपनी चाल-ढाल पर पूरा ध्यान रखें। कमर बिलकुल सीधा रखकर चलें, झुककर न चलें अन्यथा रीढ़ की हड्डी पर अनावश्यक तनाव में पीठ में दर्द हो सकता है। बैठते हुए और सोते हुए भी अनावश्यक झुकाव न डालें।
           गर्भावस्था के दौरान ढीले वस्त्र पहनें। हल्के रंग की साड़ी पहने अथवा गाउन पहनना भी सुविधाजनक रहता है। गर्भावस्था में स्तनों का आकार बढ़ता जाता है, अतः उसी के अनुसार ब्रा का साइज बदलती रहें। ध्यान रहे कि वक्ष पर अनावश्यक दबाव न पड़े। प्रसवोपरान्त शिशु को दुग्धपान में कोई दिक्कत न आये, इसके लिए गर्भावस्था के दौरान स्तनों की उचित देखभाल करें। बहुत सी स्त्रियों में उचित देखभाल के अभाव में निप्पल अन्दर दब जाती है जिससे दुग्धपान कराने में परेशानी आती है। अतः गर्भावस्था के छठे महीने से प्रसव होने तक प्रातःकाल के समय व रात्रि को सोते समय दोनों निप्पलों को बाहर की तरफ हल्के हाथ से मालिश करती रहें। निप्पल व एरीओला (स्तन मडल) में कई बार दरारें पड़ जाती हैं जहां पर बाद में खुजली हो जाती है। अतः डॉक्टर की सलाह से मॉस (Masse) क्रीम लगायें।
           अंत में सौन्दर्य के प्रति जागरुक महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण सूचना, जैसे-जैसे गर्भस्थ शिशु का आकार बढ़ता है, वैसै-वैसे पेट की त्वचा में खिचांव आता है जिससे स्ट्रेच मर्क्स (Stretch Marks) बन जाते हैं, जो कि नितम्बों व स्तनों पर भी हो जाते हैं। गर्भावस्था के दौरान बेबी ऑयल की मालिश से इन निशानों को कुछ कम किया जा सकता है। कुछ स्त्रियों में पेट पर खुजली चलती है, वहां पर खुजलाने से स्थायी रूप से नाखूनों के निशान पड़ सकते हैं। अतः नाखूनों से खुजलाया नहीं करें और रात में नाखूनों से खुजली से बचाव के लिए सूती कपड़े व दस्ताने पहनकर सोयें।
           गर्भावस्था के दौरान पैरों में फ्लैट चप्पल ही पहने। ऊंची ऐड़ी की चप्पल या सैंडिल से सन्तुलन बिगड़ता है व गिरने से दुर्घटना का भय बना रहता है।
गर्भावस्था के दौरान उपरोक्त निर्देशों का पालन करें, तो उनके रूप सौन्दर्य में वृद्धि ही होगी व किसी भी तरह की कोई स्वास्थ्य एवं सौन्दर्य समस्या भी पैदा नहीं होगी।

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