उन दिनों में भी रह सकती हैं फ्रेश

By  ,  सखी
Feb 01, 2011
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periodsटीना आज स्कूल नहीं गई। जबकि उसका मंथली टेस्ट था। शाम को उसकी सहेलियों के फोन आने शुरू हो गये। टीना आज किसी से बात भी नहीं करना चाह रही थी। दर्द के कारण वह पूरे दिन लेटी रही। आखिर शाम को जब उसकी सहेली सुजाता आई तो उसे पता चला कि टीना को पीरियड्स शुरू हो गए हैं। टीना ने संकोच के कारण अपनी मां को भी नहीं बताया है। सुजाता ने उसे बताया कि पहले वह भी ऐसा करती थी लेकिन जब से उसने डॉक्टर की सलाह ली है तब से अब वह उन दिनों में परेशान नहीं रहती। उसने टीना को समझाया कि हलका-फुलका दर्द तो सभी को रहता है लेकिन उस दौरान आलसी बनकर पूरे दिन इस तरह लेटे नहीं रहना चाहिए बल्कि खूब काम करना चाहिए ताकि रक्त प्रवाह अच्छी तरह हो सके।    

 

हर लड़की के जीवन में यह दिन आता है और शुरू-शुरू में वह ऐसा ही करती है। किशोरावस्था आते-आते ऐसा होना स्वाभाविक है, इसमें चिंता या शर्म महसूस करने वाली कोई बात नहीं है। ज्यादातर लड़कियों को 10-13 साल के बीच पीरियड्स शुरू होते हैं। इसका कोई सही या गलत समय नहीं होता। जब शरीर तैयार होता है तो ये शुरू हो जाते हैं।

 

अमूमन लड़कियों को माह में एक बार पीरियड्स होते हैं। दो पीरियड्स के बीच औसतन समय 25-32 दिन होता है लेकिन कुछ लड़कियों में ये कम या कुछ में अधिक भी हो सकता है। पीरियड्स सामान्यतया तीन-पांच दिन के होते हैं। दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल की स्त्री रोग विशेषज्ञा डॉक्टर मधु राय के अनुसार, अगर आप गर्भधारण नहीं करतीं तो ये चक्र लगातार मेनोपॉज तक हर महीने चलता रहेगा। लेकिन अगर अचानक इसके चक्र में अनियमितता आए तो जांच जरूर करवानी चाहिए।  

 

मानसिक रूप से तैयार रहें 

 

पीरियड्स के दौरान हरेक स्त्री के मूड में बदलाव आता है। कभी मूड अच्छा रहता है तो कभी खराब हो जाता है। इस दौरान जी मिचलाना, आलस आना, भूख कम लगना, चिड़चिड़ापन होना स्वाभाविक होता है। स्कूल जाने वाली लड़कियों में खास तौर से ऐसा होता है। ऐसे में मां को उन्हें मानसिक रूप से तैयार करना जरूरी होता है। उन्हें अपनी किशोरी बेटी को समझाना चाहिए ये स्त्री के शरीर की सामान्य प्रक्रिया है।

 

पीरियड्स से पहले के लक्षण 

 

प्री मेंस्ट्रुएल सिंड्रोम या पीएमएस ऐसे लक्षण हैं जो पीरियड्स शुरू होने से एक से दस दिन पहले आपको महसूस होने लगते हैं। ये लक्षण शारीरिक या मनोवैज्ञानिक हो सकते हैं। इस दौरान पेट में मरोड़, ऐंठन और दर्द, स्तनों में भारीपन, स्तनों में सुई जैसी चुभन, सिरदर्द आम लक्षण हैं। लेकिन ये सभी लक्षण अलग-अलग शरीर के हिसाब से अलग-अलग होते हैं।

 

कुछ भ्रांतियां 

 

पीरियड्स को लेकर अभी भी कुछ स्ति्रयां यह मानती हैं कि इस दौरान कोई काम नहीं करना चाहिए। आराम करने से किसी प्रकार का दर्द नहीं होता है, लेकिन ये भ्रांतियां हैं। आराम करने से दर्द दूर नहीं होता बल्कि उन दिनों में और भी ज्यादा सक्रिय रहने से किसी भी प्रकार की समस्या नहीं होती। आपको भले ही यकीन न हो लेकिन इस समय व्यायाम बहुत जरूरी होता है। व्यायाम रक्त और ऑक्सीजन के प्रवाह को सुचारु कर पेट में दर्द और ऐंठन को दूर करे में सहायक होता है। उन दिनों में एक्सरसाइज कर सकती हैं, टेनिस या फुटबाल भी खेल सकती हैं। अक्सर लड़कियां दर्द के कारण कॉलेज जाने से भी कतराती हैं लेकिन ऐसा नहीं करना चाहिए। अगर दर्द बहुत ज्यादा हो तो स्त्री रोग विशेषज्ञा की सलाह पर पेन किलर लें और आम दिनों की तरह अपनी दिनचर्या नियमित रखें।

 

जरूरी है डॉक्टर की सलाह 

 

हरेक लड़की को उन दिनों में पेट के निचले हिस्से में दर्द और ऐंठन नहीं होती, लेकिन ज्यादातर लड़कियों को कुछ न कुछ असुविधा जरूर होती है। असहनीय दर्द की शिकायत बहुत सी किशोरियां और युवतियां करती हैं। यह समस्या कुछ हद तक प्रथम गर्भावस्था के बाद खत्म हो जाती है। अगर आपकी यह समस्या बनी रहती है तो उसके लिए अलग-अलग दवाइयां भी हैं लेकिन कोई भी दवा लेने से पहले स्त्री रोग विशेषज्ञा की सलाह जरूर लें। कुछ स्त्रियों को अनियमित पीरियड्स की शिकायत होती है, तो कुछ उस दौरान अत्यधिक रक्त बहाव से परेशान होती हैं। ऐसी समस्या को नजरअंदाज न करके डॉक्टर की सलाह से जरूरी जांच जरूर कराएं।

 

सफाई का भी रखें ध्यान 

 

पीरियड्स के दौरान सफाई का ध्यान रखना बहुत जरूरी है वरना त्वचा पर रैशेज या त्‍वचाइन्फेक्शन होने की संभावना होती है। यहां तक कि उन दिनों में रोज नहाना भी जरूरी होता है। अगर आपको सैनिटरी नैपकिन से किसी प्रकार की परेशानी होती है जैसे- रैशेज या त्वचा में जलन तो उसकी कंपनी बदलकर जरूर देखें। अपने अंडरगार्मेट को अच्छी तरह धोएं। नैपकिन भी जरूरत के मुताबिक बदलती रहें।

 

कुछ जांच भी कराएं 

 

अगर रुटीन साइकिल बदलती है तो दो माह तक निरीक्षण करके जरूरी जांच कराएं। मसलन अगर पीरियड्स के बीच का अंतराल 28-35 दिनों का हो जाए या उसके पैटर्न में कोई बदलाव आता है तो डिटेल चेकअप जरूर कराएं। यह जांच हैं- पेल्विक अल्ट्रासाउंड, थॉयरायड टेस्ट(टी3,टी4, टीएसएच टेस्ट)।

 

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