एक ऐसा इंजेक्शन, जो पुरुषों को रोकेगा पिता बनने से!

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Nov 21, 2016
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Quick Bites

  • अमेरिकी वैज्ञानिकों ने गर्भनिरोधक इंजेक्‍शन खोज निकाला है।
  • इंजेक्‍शन पुरूषों के शुक्राणुओ की संख्‍या को घटा देता है।
  • इंजेक्‍शन करीब 96 फीसदी तक कारगर पाया गया है।
  • आने वाले समय में ऐसे इंजेक्‍शन मार्केट में आ सकते हैं।

गर्भ न ठहरे इसके लिए कंडोम, गर्भनिरोधक गोलियां और नसबंदी जैसे तरह के उपाए लोगों के पास मौजूद है। लेकिन इन सब के बीच अमेरिका के वैज्ञानिकों ने पुरुषों के लिए एक ऐसा इंजेक्शन तैयार करने का दावा किया है, जो पुरुषों को पिता बनने से रोकेगा। यह इंजेक्शन शुक्राणुओं को निष्क्रिय कर देता है। अमेरिकी वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस इंजेक्शन को 250 से अधिक पुरुषों पर प्रयोग किया गया, जिसमें इंजेक्शन को 96 फीसदी तक सफलता मिली जबकि गर्भ ठहरने के चार मामले सामने आए।

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sperm in hindi
Image Source : Getty

हालांकि इंजेक्शन के इस्तेमाल के बाद ज्यादातर लोगों में साइड इफेक्ट भी दिखाई दिया। इंजेक्शन लगाने के बाद पुरुषों के चेहरे पर मुहासे निकल आए साथ उनका दिमाग थोड़ा अपसेट होने की स्थिति जैसे हानिकारक प्रभाव दिखई दिए।  

आपको बता दें कि, ये वैज्ञानिक करीब 20 साल से पुरुषों के लिए एक कारगर हार्मोन गर्भनिरोधक तैयार करने के लिए शोध में जुटे थे। शोध के दौरान ऐसे प्रभावी तरीके की तलाश की जा रही थी जो शुक्राणुओं के बनने पर रोक लगाए। इसके साथ-साथ यह भी देखा जा रहा था कि इस इंजेक्शन का कोई दुष्परिणाम न हो।

दरअसल, पुरुषों में शुक्राणु लगातार बनते रहते हैं। आमतौर पर शुक्राणु बनने की गति 1.5 करोड़ प्रति मिलीलीटर होती है. यदि इस गति को 10 लाख प्रति मिलीलीटर से कम लाना हो तो उच्च स्तर के हार्मोन की जरूरत होती है।

 

6 माह तक वैज्ञानिकों ने किया शोध 

ये अध्ययन 18 से 45 साल के ऐसे लोगों पर किया गया जिनका कम से कम एक साल तक एक ही साथी के साथ संबंध रहा। अध्ययन के लिए उनके पार्टनर की भी सहमति ली गई। अध्ययन की शुरुआत में पुरुषों के शुक्राणुओं की संख्या जांची गई ताकि ये तय किया जा सके कि वो सामान्य हैं। फिर उन्हें आठ हफ्ते के अंतराल पर हार्मोन के दो इंजेक्शन दिए गए।

फिर उन पर अगले छह महीने तक नजर रखी गई जब तक कि शुक्राणुओं की संख्या 10 लाख से नीचे नहीं आ गई। ये अध्ययन क्लिनिकल एंडोक्रिनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म नाम की पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इसे एनडॉक्राइन सोसायटी ने छापा है।

 

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