हेल्‍दी लाइफस्‍टाइल से दूर होगा बचपन का मोटापा

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Jul 04, 2016
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बचपन का 'मोटापा' एक ऐसी स्थिति है, जिसमें बच्चों का वजन उनकी उम्र और कद की तुलना में काफी ज्यादा बढ़ जाता है। विशेषज्ञ कहते हैं कि मोटापे का बच्चों की सेहत के साथ-साथ उनके मनोविज्ञान पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। भारत में हर साल बच्चों में मोटापे के एक करोड़ मामले सामने आते हैं। हालांकि इस समस्‍या को पूरी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता, लेकिन हेल्‍दी लाइफस्‍टाइल इसे दूर करने में काफी हद तक मदद कर सकती है।  

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बचपन का मोटापा

बचपन का मोटापा, जिसे बच्चों का मोटापा भी कहा जाता है, आमतौर पर खुद ही पहचाना जाता है, क्योंकि इसमें बच्चों का वजन असामान्य रूप से बढ़ता है। इस स्थिति को चिकित्सकीय तौर पर पता लगाने के लिए प्राय: लैब परीक्षण और इमेजिंग की जरूरत होती है।

बचपन का मोटापा आगे बढ़कर डायबिटीज, उच्च रक्तचाप और उच्च कोलेस्ट्रॉल का कारण बन सकता है। 70 प्रतिशत मोटे युवाओं में कार्डियोवेस्कुलर बीमारी का कम से कम एक जोखिमभरा कारक होता है। मोटे बच्चों और किशोरों में हड्डियों और जोड़ों की समस्याओं, स्लीप एप्निया तथा निंदित महसूस करने और आत्म-सम्मान की कमी जैसी मनोवैज्ञानिक समस्याओं का जोखिम ज्यादा होता है।

डब्ल्यूएचओ की चेतावनी

इस साल के आरंभ में, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आयोग ने, बच्चों में मोटापे की बढ़ती स्थिति पर ध्यान आकर्षित करते हुए, कहा कि बच्चों में मोटापा एक 'भयावह दु:स्वप्न' है। बच्चों के मोटापे पर काम कर रहे विश्व स्वास्थ्य संगठन के आयोग ने पांच साल से कम उम्र के 4.1 करोड़ ज्यादा वजन वाले या मोटे बच्चों के होने की पुष्टि की है।

कई बच्चों की परवरिश ऐसे वातावरण में हो रही है, जहां उन्हें वजन बढ़ाने और मोटा होने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। डब्ल्यूएचओ के आयोग के अनुसार, पांच साल से कम उम्र के ऐसे बच्चे जिनका वजन ज्यादा है या जो मोटे हैं, उनकी संख्या 1990 में 3.1 करोड़ थी जो बढ़कर 4.1 करोड़ तक पहुंच चुकी है।

इस आंकड़े का अर्थ है कि वर्ष 1990 में 4.8 प्रतिशत की तुलना में वर्ष 2014 में पांच साल से कम उम्र के 6.1 प्रतिशत बच्चे मोटे या अधिक वजनदार हुए। इसी अवधि में भारत जैसे निम्न मध्य-आय वाले देशों में अधिक वजनदार बच्चों की संख्या बढ़कर दोगुनी हो गई, यानी 70.5 लाख से बढ़कर 1.55 करोड़। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, दुनिया के सभी अधिक वजनदार और मोटे बच्चों में से लगभग 48 प्रतिशत एशिया में रहते हैं, और 25 प्रतिशत अफ्रीका में।

Image Source : Getty

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