555 दिन बिना दिल के जिंदा रहा ये इंसान और खेलता रहा बास्केटबॉल

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Jun 16, 2016
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Quick Bites

  • लार्किन 555 दिन बिना दिल के जिंदा रहा।
  • अब तक ये कृत्रिम दिल के सहारे जी रहा था।
  • लार्किन के छोटे भाई को भी थी ये बीमारी।
  • इन दोनों भाईयों को वंशानुगत कार्डियोमायोपैथी है।

कोई आपसे कहे कि ये इंसान बिना दिल का है तो आपका रिएक्शन कैसा होगा? जरूर चौंक जाएंगे। और ये चौंकने की बात भी है क्योंकि ये अविश्वसनीय है। लेकिन इस असंभव को संभव कर दिखाया है अमेरिका के 25 साल के स्टेन लार्किन ने।
स्टेन लार्किन ना केवल बिना दिल के 555 दिन जिएं बल्कि नियमित रुप से बास्केट बॉल भी खेलते रहे। जबकि दिल में थोड़ी सी भी समस्या होने से इंसान के लिए चलना-फिरना मुश्किल हो जाता है। वहीं लार्किन ने इसे केवल कहने की बात बनाकर बास्केट बॉल खेलना जारी रखा। लार्किन ने यह संभव किया आर्टिफिशियल हार्ट बैकपैक द्वारा।


555 दिन जिंदा रह कर 25 साल के लार्किन ने न केवल डॉक्टर्स को चौंका दिया बल्कि शारीरिक संरचना को भी चुनौती दे डाली। दरअसल मामला ये है कि  स्टान लार्किन का दिल खराब हो गया था और उसको केवल हार्ट ट्रांसप्लांट के जरिए ही बचाया जा सकता था। लेकिन लार्किन को कोई हार्ट डोनर नहीं मिल रहा था। ऐसे में चिकित्सकों ने  उसके शरीर में एक ‘कृत्रिम दिल’ लगाया जिसका बैकपैक 555 दिनों का था। फिर जब डोनर मिला तो चिकित्सकों ने लार्किन का हार्ट ट्रांसप्लांट किया। लेकिन सारे चिकित्सक तब हैरान रह गए जब पता चला कि लार्किन मशीन के दिल के बावजूद इस पूरे समय तक फ़ुटबाल भी खेलता रहा।

 

दोनों भाईयों को है बीमारी

दिल की समस्या लार्किन और उनके भाई डोमिनिक, दोनों को है। दोनों का दिल बचपन से ही सामान्य नहीं था। इन्हें कार्डियोमायोपैथी नाम की बीमारी थी जिसमें अचानक कभी भी हार्ट फेल हो जाने का खतरा होता है। इन्हें ये बीमारी वंशानुगत थी। ऐसे में चिकित्सकों ने इन दोनों भाईयों को डोनर ना मिलने की वजह से 13.5 पाउंड के वजन का एक बैकपैक यानी कृतिम दिल लगाया जो सीधे उनके कार्डियोवेसकुलर सिस्टम से जुड़ा था। इस यंत्र का इस्तेमाल जब किया जाता है जब हार्ट फेल हो जाता है।


मिशिगन यूनिवर्सिटी में फ्रांकेल कार्डियोवस्कुलर सेंटर के ट्रांसप्लांट सर्जन जोनाथन हाफ्ट का कहना है कि पहले दोनों ही भाईयों की हालत बेहद गंभीर थी और उन्हें गहन चिकित्सा केंद्र में रखा गया था। दोनों को दिल की आवश्यकता थी लेकिन कहीं से भी अरेंज नहीं हो सका। इसके बाद वहां के डॉक्टरों की टीम ने आधुनिक तकनीक से उनके दिलों से अलग एक डिवाइस तैयार करने में कामयाबी हासिल की। स्टान के छोटे भाई को डोनर 2015 में ही मिल गया हालांकि स्टान को 2016 में जाकर डोनर मिला। अब दोनों भाई बिल्कुल सामान्य हैं और अपनी जिंदगी बिता रहे हैं।

 

क्या है कार्डियोमायोपैथी?

  • कार्डियोमायोपैथी दिल की मांसपेशियों से जुड़ी एक बीमारी है, जिसमें हृदय के आकार में असामान्य वृद्धि होती है।
  • इस वृद्धि में  मांसपेशियों की दीवारों में मोटाई या बड़े पैमाने पर बढ़ना शामिल है। जिससे इन मोटी मांसपेसियों को सिकुड़ने में कठिनाईयां होती हैं।
  • इससे दिल के सिकुड़ने और पंप करने की क्षमता समाप्त हो जाती है।
  • जिससे इससे हृदय का कभी भी बंद होने का खतरा होता है।

 

कार्डियोमायोपैथी तीन तरह के होते हैं -

  • हायपरट्रोफिक कार्डियोमायोपैथी (एचसीएम)
  • डायलेटेड कार्डियोमायोपैथी (डीसीएम)
  • एर्रिथमोजेनिक राइट वेट्रिकुलर कार्डियोमायोपैथी (एआरवीसी)
  • इसके अलावा एक टाकोत्सुबु कार्डियोमायोपैथी होता है जो बहुत अधिक तनाव लेने के कारण होता है।


नोट- टाकोत्सुबु कार्डियोमायोपैथी वंशानुगत नहीं है जबकि अन्य तीन तरह के कार्डियोमायोपैथी वंशानुगत भी होते हैं। 

 

इसके लक्षण -

कार्डियोमायोपैथी के शुरुआती समय में इसके कोई लक्षण या संकेत देखने को नहीं मिलते। लेकिन जैसे-जैसे बीमारी बढ़ते जाती है वैसे-वैसे इसके संकेत और लक्षण दिखने शुरू हो जाते हैं। इसके लक्षणों में शामिल है-
थोड़ा सा चिलने-फिरने या बिना व्यायाम के भी सांस लेने में तकलीफ होना।

  • हमेशा सीने में दर्द होना। कई बार दर्द के कारण बेहोशी भी आ जाती है।
  • पैर और एड़ियों में सूजन आना।
  • लेटने के दौरान बलगम आना।
  • थकावट होना।
  • दिल की धड़कनों में अचानक तेजी आना या कमी आना।

 

कब चिकित्सक के पास जाएं

अगर इन लक्षणों में से कोई भी लक्षण आप एक से अधिक बार खुद में या दूसरो में देखते हैं तो डॉक्टर के पास जाने की जरूरत है। कई बार ये वंशानुगत होता है जिससे चिकित्सक पूरे परिवार का चेकअप कराने की सलाह देते हैं।

 

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