सड़क किनारे घर से ऑटिज्‍म का खतरा

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Nov 28, 2012
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sadak ke kinare ghar se autism ka khatra

किसी की चाहत होती है कि उसका घर सड़क किनारे हो ताक‍ि वहां तक आसानी से पहुंचा जा सके। लेकिन, व्‍यस्‍त सड़कों के करीब घर होने का खामियाजा भी भुगतना पड़ता है। दिन-रात के शोर शराबे के साथ ही प्रदूषण की समस्‍या भी होती है। लेकिन, इसके साथ ही ऐसी सड़कों के करीब रहने का एक और खामियाजा भी होता है। एक नए अध्‍ययन में यह बात सामने आई है कि ऐसी जगह पर रहने वाले बच्‍चों में ऑटिज्‍म का खतरा दोगुना तक बढ़ जाता है। शोधकर्ताओं ने बताया कि भीड़-भाड़ वाली सड़कों पर कई गाड़ियां आती-जाती हैं। गर्भवती महिलाएं इनसे निकलने वाले धुएं के संपर्क में आती हैं जो गर्भ में पल रहे शिशु के मस्‍तिष्‍क पर काफी बुरा असर डालता है। इसके चलते उनके पैदाइश के पहले वर्ष के दौरान ऑटिज्‍म होने की आशंका बढ़ जाती है।

शोधकर्ताओं ने बताया कि भारी-भरकम ट्रैफिक के आसपास रहने वाले बच्‍चों को ऑटिज्‍म होने का खतरा दोगुना ज्‍यादा होता है बजाए उनके जिनके घर शांत इलाकों में हैं।

 

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कैलिफोर्निया के वैज्ञानिकों ने इसके लिए ऑटिज्म के शिकार 279 बच्चों और 245 स्वस्थ बच्चों की उम्र और उनके पारिवारिक परिवेश की तुलना कर अध्ययन किया। यातायात प्रदूषण वाले क्षेत्र के घरों में रहने वाले बच्चों में ऑटिज्म होने की आशंका तीन गुना अधिक हो जाती है।

मालूम हो कि 100 में से एक बच्‍चा जन्‍म के शुरुआती वर्ष में ऑटिज्‍म की चपेट में आता है। लेकिन इस बीमारी के लक्षण दूसरे वर्ष में नजर आने शुरू होते हैं। इस बीमारी से ग्रसित बच्‍चे दूसरों के साथ आसानी से संवाद नहीं कर पाते। ब्रिटेन में करीब छह लाख च्‍चे और व्‍यस्‍क इस बीमारी की गिरफ्त में हैं।

 

वैज्ञानिक यातायात प्रदूषण और ऑटिज्म के बीच संबंधों की संभावना की तलाश कर रहे हैं। उनका कहना है कि वे इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

 

 शोधकर्ताओं अपने इस काम को बेहद महत्त्‍वपूर्ण मान रहे हैं। उनका कहना है कि यह बात तो हम लंबे वक्‍त से जानते थे कि वायु प्रदूषण हमारे फेफड़ों और विशेष कर बच्चों के लिए खतरनाक है। अब हम वायु प्रदूषण के दिमाग पर असर को लेकर अध्ययन कर रहे हैं।
    
हालांकि ब्रिटिश विशेषज्ञ इस निष्कर्ष को लेकर सावधानी बरत रहे थे, उनका कहना है कि वे यह साबित नहीं कर सकते कि वायु प्रदूषण के कारण ऑटिज्म होता है। ये निष्कर्ष आर्काईव्स ऑफ जेनरल साइकाइट्री नाम की पत्रिका में प्रकाशित हुआ था।

 

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