गर्भावस्‍था में रेस्‍टलेस लेग सिंड्रोम में पैरों को हिलाने में होती है परेशानी

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Jun 23, 2013
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Quick Bites

  • रेस्‍टलेस लेग सिंड्रोम होने पर पैरों में झुनझुनी महसूस होती है। 
  • एक जगह देर तक बैठने या आराम के दौरान होती है यह समस्‍या।
  • रेस्‍टलेस लेग सिंड्रोम में पैरों को हिलाने-डुलाने में दिक्‍कत होती है।
  • इस समस्‍या में एनीमिया की करायें जांच, व्‍यायाम भी है जरूरी।

गर्भावस्‍था में रेस्‍टलेस लेग सिंड्रोम की समस्‍या होती है। इसके कारण सबसे ज्‍यादा दिक्‍कत रात को सोने के दौरान आती है। रेस्‍टलेस लेग सिंड्रोम में पैरों में झुनझुनी और किसी जीव के रेंगने जैसा एहसास होता है। एक जगह बैठे हुए या फिर आराम करने के दौरान यह समस्‍या हो सकती है। रेस्‍टलेस लेग सिंड्रोम में पैरों को हिलाने-डुलाने में दिक्‍कत होती है।

रेस्‍टलेग दर्द से पीडि़त महिलागर्भावस्‍था के दौरान रेस्‍टलेस लेग सिंड्रोम होने के बाद यह आसानी से ठीक नही होता है। इसके लक्षण गर्भावस्‍था के 7वें या 8वें सप्‍ताह से दिखने लगते हैं। लेकिन डिलीवरी होने के कुछ महीने बाद यह ठीक हो जाता है। आइए हम आपको प्रेग्‍नेंसी में होने वाले रेस्‍टलेस लेग सिंड्रोम की जानकारी देते हैं।

 

क्‍यों होता है रेस्‍टलेस लेग सिंड्रोम

हालांकि अभी इस बीमारी के कारणों का पता नही चल पाया है, लेकिन विशेषज्ञ गर्भावस्‍था के दौरान रेस्‍टलेस लेग सिंड्रोम की समस्‍या को वातावरण और खान-पान की अनियमितता से जोड़ते हैं। गर्भावस्‍था के दौरान यदि उचित तरीके से खान-पान पर विशेष ध्‍यान नही दिया गया तो यह समस्‍या हो सकती है। खाने में आयरन की मात्रा कम हो तो यह समस्‍या होती है।

 

कैसे पता करें 

गर्भावस्‍था के दौरान कई प्रकार की समस्‍यायें होती हैं। मॉर्निंग सिकनेस, बैक पेन, जोड़ों में दर्द गर्भावस्‍था की जटिलतायें हैं। इस दोरान यदि पैरों में दर्द या झुनझुनी होती है तो महिलायें उसे सामान्‍य समस्‍या समझकर टाल देती हैं। लेकिन रेस्‍टलेस लेग सिंड्रोम सामान्‍य समस्‍या से अलग होता है। इसमें पैरों में झुनझुनाहट होती है। पैर असहज हो जाते हैं, ऐसा लगता है पैरों पर कुछ चल रहा है। रेस्‍टलेस लेग सिंड्रोम में सबसे ज्‍यादा दिक्‍कत रात को सोने में होती है। इसमे सोने के दौरान बहुत तेज दर्द और ऐंठन होता है, जिसके कारण महिला को अच्‍छी नींद नही आ पाती।

एक बार रेस्‍टलेस ले‍ग सिंड्रोम होने के बाद प्रसव के कुछ दिनों तक यह समस्‍या बनी रहती है। यदि किसी महिला को गर्भावस्‍था से पहले यह समस्‍या हुई है तो गर्भावस्‍था के दौरान उसकी स्थिति और भी खराब हो सकती है। रेस्‍टलेस लेग सिंड्रोम के कारण गर्भवती महिला को बेचैनी और तनाव हो जाता है। इस बीमारी में भरपूर आराम न मिलने के कारण इसका असर बच्‍चे पर भी पड़ता है।

 

रेस्‍टलेस लेग सिंड्रोम होने पर क्‍या करें

  • रेस्‍टलेस लेग सिंड्रोम से बचने के लिए जरूरी है खान-पान पर विशेष ध्‍यान दिया जाए। इसके लिए आप अपने पास फूड की पत्रिका रख सकती हैं।
  • इस फूड पत्रिका के अनुसार ही अपने आहार चुनिए। कुछ भी खाने बचें।
  • ऐसे आहार जरूर खाइए जिनमें आयरन की भरपूर मात्रा हो, आयरन की कमी से यह बीमारी होती है।
  • डाइट चार्ट का पालन जरूर कीजिए, खाना नियम से और समय पर ही खाइए।
  • खाने में अनियमितता बरतने से स्थिति खराब हो सकती है।
  • एनीमिया की जांच कराइए, यदि जांच में एनीमिया निकले तो चिकित्‍सक से सलाह लेकर उसका इलाज कीजिए।
  • नियमित रूप से योगा और व्‍यायाम अपनी दिनचर्या में शामिल कीजिए, इससे रेस्‍टलेस लेग सिंड्रोम में आराम मिलेगा।



इसके अलावा यदि आपकी समस्‍या बढ़ती है तो अपने चिकित्‍सक से संपर्क कर इसका इलाज कीजिए।

 

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