निराशावादी जीते हैं लंबा जीवन

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Mar 01, 2013
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निराशावादी होने को अच्‍छा नहीं माना जाता। लेकिन एक नए अध्‍ययन के नतीजे इसके सकारात्‍मक पहलु की ओर ध्‍यान आकृष्‍ट करते हैं। इस अध्‍ययन में कहा गया है कि इससे इनसान की जिंदगी में इजाफा हो सकता है।

nirashavadi jeete hain lamba jeewanब्रिटेन में कराए गए एक अध्‍ययन में यह बात सामने आई है। इस अध्‍ययन में कहा गया है कि जो लोग भविष्‍य को लेकर डर और चिंता के साए में रहते हैं, उनके जीने की संभावना आशावादी लोगों के मुकाबले अधिक होती है।

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अमेरिकन साइकोलॉजिस्‍ट एसोसिएशन द्वारा प्रकाशित इस अध्‍ययन का निष्‍कर्ष 40 हजार लोगों के स्‍वास्‍थ्‍य पर उनकी सोच का असर आंकने के बाद निकाला गया। जबकि इस शोध को जर्मनी स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ आर्लंग न्‍यूरमबर्ग के शोधकर्ताओं ने अंजाम दिया। शोधकर्ताओं ने पाया कि भविष्‍य के प्रति आशावादी रवैया रखने वालों में निशक्‍कता या असामयिक मौत की आशंका बढ़ जाती है।

प्रमुख शोधकर्ता फ्रिडर आर लांग ने कहा हमने अपने शोध में पाया कि निराशावादी सोच रखने वाले अधिक सावधानी से अपना जीवनयापन करते हैं। वे अपने स्‍वास्‍थ्‍य और सुरक्षा पर अधिक ध्‍यान देते हैं। इससे उनकी उम्र बढ़ जाती है। उन्‍होंने बताया कि इस अध्‍ययन के लिए आंकड़ों को वर्ष 1993 से 2003 के बीच इकट्ठा किया गया। इस शोध में शामिल सभी आयु वर्ग के लोगों से शोध्‍ ाकर्ताओं ने पूछा कि वे अपने जीवन के प्रति कितने संतुष्‍ट हैं और आने वाले पांच सालों के बारे में क्‍या समझते हैं। निष्‍कर्षों को सटीक बनाने के लिए लोगों को तीन आयु वर्गों में बांटा गया। पहला, 18 से 39 वर्ष, दूसरा 40 से 64 वर्ष और तीसरे समूह में 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को रखा गया। इन लोगों को संतुष्टि के स्‍तर पर जांचने के बाद पांच साल बाद दोबारा संपर्क किया गया।

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शोधकर्ताओं ने बताया कि 65 वर्ष आयुवर्ग के 43 फीसदी लोग भविष्‍य की जिंदगी के प्रति निराशावादी रुख रखते थे। 25 फीसदी खुशियों के साथ जिंदगी बिताने के प्रति संतुष्‍ट थे। जबकि 32 फीसदी को पूरा भरोसा था कि उनकी जिंदगी मजे से गुजरेगी। आश्‍चर्यजनक रूप से इसी समूह में सबसे अधिक 9.5 फीसदी अपंगता होने की शिकायत मिली।

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