मच्‍छरों को लगेगा मलेरिया का टीका

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
May 14, 2013
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machharo ko lagega malaria ka tiika

मलेरिया एक वाहक-जनित संक्रामक रोग है जो प्रोटोज़ोआ परजीवी द्वारा फैलता है। इसे एक बेहद खतरनाक बीमारी माना जाता है। अब ऐसी उम्मीद की जा रही है कि मच्छरों को मलेरिया प्रतिरोधी बनाकर इनसानों में इसके फैलने को कम किया जा सकता है।

 

वैज्ञानिक एक ऐसा जीवाणु खोजने में कामयाब हो गए हैं, जो मच्छरों को संक्रमित कर उन्हें मलेरिया के परजीवी के प्रति प्रतिरोधी बना सकता है।

 

साइंस जर्नल में छपे एक शोध में बताया गया है कि इस नए जीवाणु से संक्रमित मच्छरों में मलेरिया के परजीवी को जिंदा रहने के लिए संघर्ष करना पड़ा।

 

मलेरिया दुनिया में फैली सबसे बड़ी बीमारियों में से एक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के अनुसार 2.2 अरब लोग हर साल इसके शिकार होते हैं जिनमें से साढ़े छह लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है।

 

अमेरिका के मिशीगन विश्वविद्यालय में हुए शोध में वॉलबशिया बैक्टीरियम पर शोध किया गया, जो सामान्यतः कीटों को संक्रमित करता है। यह सिर्फ़ मादा के ज़रिए नई नस्ल तक जाता है।

 

कई कीटों में तो यह जीवाणु कीटों को मादा की संख्या बढ़ाने के लिए तैयार कर लेता है। मलेरिया के वाहक एनाफिलीज मच्छर प्राकृतिक रूप से वॉलबशिया से संक्रमित नहीं होते। लेकिन प्रयोगशाला में किए गए शोध से पता चला कि अस्थाई रूप से संक्रमित किए जाने पर इन कीटों में मलेरिया के परजीवी के प्रति प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो गई।

 

वैज्ञानिकों के समक्ष चुनौती इस अस्थाई संक्रमण के अगली नस्ल तक भेजने की थी। शोधकर्ताओं ने वॉलबशिया की एक ऐसी नस्ल ढूंढी जो एक जाति के कीटों, एनोफ़िलिस स्टेफ़ेन्सी, में पूरे अध्ययन के दौरान बनी रही। यह अध्ययन 34 नस्लों तक चला था।

 

मलेरिया के परजीवी के लिए इन मच्छरों में रहना मुश्किल हो गया। इन संक्रमित मच्छरों में वह गैर-संक्रमित मच्छरों की तुलना में चार गुना कम पाए गए।

 

ऑस्ट्रेलिया में हुए एक अध्ययन में पता चला कि वॉलबशिया की एक अन्य नस्ल मच्छरों द्वारा डेंगू फैलने से बचा सकती है। यह शोध ज़्यादा विस्तृत है और जंगलों में इसके लंबे परीक्षण भी किए जा चुके हैं।

 

अमेरिका के एलर्जी और संक्रामक रोग राष्ट्रीय संस्थान के निदेशक डॉ एंथनी फॉसी कहते हैं कि यह अध्ययन इस विचार की पुष्टि करता है कि मलेरिया के लिए भी यही काम किया जा सकता है।

 

उनके अनुसार, "अगर आप इसे मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में जीवित रहने और फैलने दें तो यह मलेरिया की रोकथान में महत्वपूर्ण असर डाल सकता है।"

 

शोधकर्ताओं की टीम में से एक डॉ ज़ियोंग ज़ी ने बीबीसी को बताया, "हमने सिर्फ़ एक नस्ल पर काम किया है। अगर हम एनाफ़िलीज़ गैम्बिया पर काम करते हैं तो हमें यही तकनीक फिर अपनानी होगी।"

 

वह कहते हैं कि अगर अभी इस्तेमाल करना है तो 'वॉलबशिया अभी उपलब्ध उपायों का पूरक हो सकता है', जिसमें मच्छरदानियां और दवाइयां शामिल हैं।

 



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