स्वस्थ रहने के लिये हंसना सीखें

By  ,  सखी
Feb 20, 2013
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swasth rehne ke liye hasna seekhe

आपको याद है कि आखिरी बार आप कब खिलखिलाकर हंसे थे? यदि नहीं, फिर भी अब हंस कर देखिये, मन का बोझ कितना हलका हो जाता है। हंसी मज़ाक ना सिर्फ समय बिताने का अच्‍छा साधन है बल्कि हंसी के स्‍वास्‍थ्‍य लाभ भी हैं। आज हंसी को भी एक प्रकार की चिकित्‍सा और व्‍यायाम के रूप में माना जा रहा है। काम के बीच में थोड़ा बहुत हंस लेने से आप दिन भर के तनाव से मुक्‍त हो जाते हैं ।

 

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गंभीरता न ओढ़ें 

 

कभी सोचा है कि बच्चे इतने अच्छे क्यों लगते हैं? क्योंकि वे दिन में कम से कम 400 बार हंसते हैं और एक वयस्क मुश्किल से14-15 बार। यही कारण है कि इंसान जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है उसमें रूखापन बढ़ता जाता है। आज के दौर में बहुत कम लोग ऐसे हैं जो बढ़ती उम्र के साथ अपनी हंसी कायम रख पाते हैं। कुछ लोग अपने जीवन साथी को दोष देते हैं तो कुछ काम के बोझ को और कुछ जीवन की कठिनाइयों को और गंभीरता की चादर ओढ़ लेते हैं। लेकिन ऐसा करने से होता क्या है? क्या गंभीर और चुपचाप रहने से समस्याएं सुलझ जाती हैं? सच तो यह है कि गंभीरता की चादर ओढ़ने से आपकी समस्या हल हो जाएगी, ऐसा सोचना बिलकुल गलत है। इसलिए मुगालते में न रहें। इंसान का जीवन वैसे ही गंभीर है। हंसना छोड़ देने या चुपचाप बने रहने से समस्या और भी गंभीर हो सकती है। 

 

 

हंसना व्यायाम है 

 

आज की भागदौड़ वाली जिंदगी में जब इंसान वैसे ही कई तरह के तनाव में जी रहा है, हंसी एक दवा के समान है। कहते हैं इंसान को होने वाली बीमारियों में से कई एक कहीं न कहीं तनाव से जुड़ी होती हैं। यह एक ऐसा व्यायाम है जो आपको न केवल तनावमुक्त रखता है बल्कि कई प्रकार की समस्याओं से निबटने में सहायक साबित होता है। जब हम हंसते हैं तो हृदय, गला, फेफड़ा व श्वास नली के लिए यह संपूर्ण व्यायाम है। यह इंसान की रचनात्मक क्षमता को भी बढ़ाता है, उसकी मानसिक, शारीरिक व भावनात्मक परेशानियों को दूर भगाता है। हंसी मनुष्य के काम करने की क्षमता को भी बढ़ाती है। असल में हंसी ऐसी चीज है जिसमें बहकर हम सारा दुख, सारी कठिनाईयां भूल जाते हैं। कई बार जब भविष्य अंधकारमय नजर आता है तो हंसी ही हौसला बनाए रखती है और आगे का रास्ता बताती है। अत: इसका दामन न छोड़ें।  

 

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अवधारणा नई नहीं  

 

मानव स्वास्थ्य पर हंसी के प्रभाव का ज्ञान काफी पुराना है। तेरहवीं शताब्दी के कई शल्य चिकित्सक अपने मरीज का ध्यान दर्द से हटाने के लिए उनके साथ हंसी-मजाक किया करते थे। कहते हैं प्राचीन यूनान के चिकित्सक अपने मरीजों को हास्य प्रधान नाटक देखने भेजा करते थे। भारत में भी लोग इससे अनजान नहीं थे। हमारे राजा-महाराजाओं के दरबार में विदूषकों की उपस्थिति का कारण ही यही था कि वे अपने हंसी-मजाक से पूरे दरबार का मनोरंजन करें और राजा समेत सभी महत्वपूर्ण मंत्रियों, सेनापतियों व सभासदों की दैनिक कामकाज के तनाव से निबटने में मदद करें। राजा भोज के दरबारी तेनालीराम तथा अकबर के परम मित्र व सेनापति महेश दास, जिसे दुनिया बीरबल के नाम से जानती है, के हास्य-विनोद आज भी उतने ही मजे से सुने जाते हैं। फिल्मी कलाकारों में चार्ली चैपलिन को लोग शायद ही भूल पाएंगे।

 

बीसवीं सदी के आरंभ में हंसी के प्रभाव को लेकर कुछ अध्ययन जरूर हुए लेकिन इस पर उतना शोध नहीं हुआ है जितना होना चाहिए था। हमें यह पता है कि यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जो मनुष्य में जन्मजात होता है लेकिन हम यह नहीं जानते कि आखिर वह क्या चीज है जो हमें हंसने के लिए बाध्य कर देती है। कमोबेश हम सब एक ही तरह से हंसते हैं लेकिन सबकी आवाज अलग-अलग होती है। कोई जोर से हंसता है तो कोई हलके से। कोई यह नहीं बता सकता कि वह किस चीज पर हंस पड़ेगा और कितनी देर तक हंसेगा। उसकी तीव्रता क्या होगी? कई बार हंसी रोके नहीं रुकती। इस पर हमारा जोर नहीं चलता। इसमें जबरदस्त आकर्षण होता है। यदि दो व्यक्ति हंस रहे हैं तो आप भी हंस पड़ेंगे, भले ही आप उनके हंसने के कारण से अंजान हों। सब कुछ पहेली की तरह है। विभिन्न डॉक्टर व योग विशेषज्ञ अपने-अपने ढंग से इसके कारण व प्रभाव का उल्लेख करते हैं लेकिन वैज्ञानिक पद्धति से अध्ययन बाकी है।  

 

प्रामाणिक अनुभव 

 

आधुनिक काल में डॉ. कजिन्स के व्यक्तिगत अनुभव को सबसे प्रामाणिक माना जाता है जिन्होंने अपनी पुस्तक 'एनाटॉमी ऑफ इलनेस' में अपने ऊपर हंसी के प्रभाव का उल्लेख किया है। डॉ. कजिन्स को 1964 में एक गंभीर रोग लग गया जिसमें उनका बदन ऐंठता था और वे दर्द से कराहते रहते थे। उनका चलना-फिरना तो दूर मुंह खोलना भी मुश्किल था। उनका इलाज करने वाले डॉक्टरों के अनुसार उनके बचने की संभावना बहुत कम थी लेकिन डॉ. कजिन्स जीना चाहते थे। दवाओं से फायदा न होते देखकर उन्होंने प्राकृतिक तरीकों को आजमाने की सोची। उन्हें विश्वास था कि यदि वह अपने में सकारात्मक भावना उभारने में कामयाब रहे तो उनकी बीमारी ठीक हो सकती है। वह अस्पताल के नजदीक ही एक होटल में आ गए और यह प्रयोग शुरू किया। उन्होंने इसके लिए फिल्म व किताबों का सहारा लिया। नियमित रूप से ऐसा करने के बाद उन्होंने महसूस किया कि दस मिनट की खुली हंसी के बाद वे कम से कम दो घंटे की गहरी नींद सो सकते थे। धीरे-धीरे वे स्वस्थ होने लगे और अगले 26 वर्षो तक लोगों को हंसी के चिकित्सीय प्रभाव के बारे में बताते रहे। यह एक उदाहरण बन गया। आज दुनिया भर में ढेर सारे लाफिंग क्लब हैं। कनाडा का टोरंटो शहर तो इसके लिए मशहूर है। भारत में भी ढेर सारे लाफिंग क्लब हैं। खबर है कि ओसाका, जापान का एक बैंक अपने कर्मचारियों को बाकायदा हंसने को प्रोत्साहित करता है।   

 

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सेहत के लिए अच्छा है हंसना 

 

हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक सबूत नहीं है लेकिन आज अधिकतर विशेषज्ञ यह मानते हैं कि हंसी का हमारे स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यह हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूती प्रदान करता है। दरअसल हमारी भावनाएं व मन:स्थिति सीधे तौर पर प्रतिरक्षा तंत्र को प्रभावित करती हैं। यदि इंसान खुश व तनावमुक्त है तो जाहिर तौर पर उसका प्रतिरक्षा तंत्र अच्छी हालत में रहेगा। हंसते समय रक्त संचार तेज हो जाता है और संचरण तंत्र बेहतर ढंग से काम करने लगता है। इससे कई हार्मोन व पाचक एंजाइम का स्त्राव होता है जिससे हंसी दर्द, हृदय रोग व रक्तचाप संबंधी कई गंभीर बीमारियों से निबटने में भी सहायक साबित होता है। मानसिक तनाव व अवसाद में तो यह और भी प्रभावी है। एक अध्ययन में पाया गया कि हंसी से मस्तिष्क में एक विशेष प्रकार का न्यूरोट्रांसमीटर उत्पन्न होता है। यह प्रकृतिक दर्द निवारक है जो इंसान में दर्द सहने की क्षमता बढ़ा देता है। यह खून में कार्टिसोल की मात्रा बढ़ने नहीं देता और हमारे बौद्धिक स्तर को बढ़ाकर सूचना ग्रहण करने की क्षमता में वृद्धि करता है।

 

कुछ लोग अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर इसे कब्ज व कमर दर्द के इलाज में भी कारगर मानते हैं। बहुत सारे विशेषज्ञों का मानना है कि हंसी बच्चों के साथ बेहतर तालमेल बनाए रखने में भी मदद करती है। इसके जरिए बच्चे अपने-आप को माता-पिता के करीब पाते हैं। आमतौर पर लोग विपरीत परिस्थितियों में हंसना भूल जाते हैं जबकि उन्हें और हंसना चाहिए। यह हमारे मानसिक, आध्यात्मिक व शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। हंसी इंसान की जिंदगी को कितना आसान बना देती है इसका सजीव चित्रण हृषिकेश मुखर्जी की फिल्म 'आनंद' में देखा जा सकता है जिसमें कैंसर से जूझता पात्र (राजेश खन्ना) हंसी के सहारे अंतिम घड़ी का इंतजार कर रहा होता है और अंतत: हंसते हुए ही दम तोड़ देता है।  

 

खुलकर हंसें 

 

हंसी मजाक नहीं है। दिल व आत्मा के लिए अमृत के समान है। यह मन का मैल धोता है यानी यह आत्म-ग्लानि, क्रोध, ईष्र्या व अहं की भावना को दूर करता है। इनके बदले यह मनुष्य को उदार बनाता है और बेहतर समझ पैदा करता है। हंसने के बाद मन में स्वस्थ व सकारात्मक भावनाएं आती हैं। यह आत्मविश्वास बढ़ाता है व नेतृत्व क्षमता का विकास करता है और व्यक्तित्व को आकर्षक बनाता है। यह उतना ही प्राकृतिक है जितना कि मनुष्य का अन्य व्यवहार। इसलिए इसे उतनी ही गंभीरता से लें जितनी गंभीरता से अपने जीवन को लेते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि हंसने में पैसा नहीं लगता और न ही इसका दुष्प्रभाव पड़ता है। यह मानव को ईश्वर का अनमोल उपहार है जो बिल्कुल मुफ्त व हानिरहित है। यह किसी स्कूल में सीखने की जरूरत नहीं है। हंसी आपके भीतर है। यह अंदर की बात है। झांक कर तो देखें।

 

छाया: सखी

 

 

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टिप्पणियाँ
  • ashok18 Sep 2012

    bahuth acha bat hi hasna

  • monu09 Jun 2012

    laughing is a good habit.I feel when am laugh then my imp ration is good for other

  • b.l.sharma10 Jul 2011

    very nice article.congratulations.

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