कुंभ में नहाइए, सेहत बनाइए

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Jan 18, 2013
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बेतरतीब भीड़, दूसरे दर्जे का खानपान। यानी बीमारी के लिए बिल्‍कुल मुफीद माहौल। लेकिन, बावजूद इसके कुभ में स्‍नान के बाद सेहत पर सकारात्‍मक असर पड़ता है।

kumbh me nahiye sehat banaiyeकुंभ मेला यानी करोड़ों की भीड़। पवित्र नदी में स्‍नान करता आस्‍था का महासमुंद्र। लेकिन, इस आस्‍था के इस सागर की लहरो (श्रद्धालुओं) की सेहत इससे दुरुस्‍त रहती है।कुंभ मेला धरती पर आयोजित सबसे बड़ा धार्मिक कार्यक्रम है। दुनिया भर में इतनी बड़ी संख्‍या में लोग किसी अन्‍य आयोजन के लिए जमा नहीं होते।

एक अनुमान के अनुसार इस साल इलाहाबाद के संगम तट पर 55 दिनों तक चलने वाले इस मेले में करीब 10 करोड़ लोग शामिल होंगे। और गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्‍वती नदी के पावन संगम पर आस्‍था की डुबकी लगाएंगे। लेकिन, क्‍या यह मसला सिर्फ आस्‍था और धर्म से ही जुड़ा हुआ है। एक अध्‍ययन के मुताबिक इसके कई स्‍वास्‍थ्‍य लाभ भी हैं।

कड़कड़ाती ठण्‍ड, बेतरतीब शोर, खाने का खराब स्‍तर और कई बीमारियों के खतरे के बावजूद जो हिन्‍दू श्रद्धालु इस तरह के आयोजनों का हि‍स्‍सा बनते हैं वे मानसिक और शारीरिक स्‍तर पर अधिक सेहतमंद रहते हैं। भारत और ब्रिटेन में हुए एक शोध में यह बात सामने आई है।

'श्रद्धालुओं के अनुभवों को समझना' (Understanding the Pilgrim Experience) नाम से किए गए इस शोध में कहा गया है कि हो सकता है कि इस तरह के मेलों में कुछ लोग बीमार पड़ जाएं और कुछ की तबीयत बिगड़ जाए, लेकिन अधिकतर लोगों के स्‍वास्‍थ्‍य पर मेलों का सकारात्‍मक प्रभाव ही पड़ता है।

कुंभ मेले का आयोजन भारत के चार शहरों (इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्‍जैन और नासिक) में हर 12 वर्ष के उपरांत किया जाता है। प्रशासन को इस दौरान पवित्र जल में डुबकी लगाकर अपने पापों से मुक्ति पाने के लिए देश-विदेश से करीब आठ करोड़ लोगों के पहुंचने की उम्‍मीद है।

भारत में यूं भी हर साल कई विभिन्‍न छोटे बड़े मेलों का भी आयोजन किया जाता है। और यहां बड़ी संख्‍या में लोग जमा होते हैं। फिर चाहे वो नौचंदी का मेला हो, या अजमेर और पुष्‍कर में लगने वाले मेले। या फिर देश के किसी कोने में आयोजित होने वाला कोई अन्‍य मेला। भीड़ मेले की पहली और सबसे जरूरी शै होती है।

ब्रिटेन के चार और भारत के पांच विश्वविद्यालयों के सामाजिक वैज्ञानिकों निष्‍कर्ष निकाला कि साझा काम करने के अनुभव और कड़ी मेहनत में अपने शरीर को कष्‍ट देते हुए काम करना इन मेलों का अहम हिस्‍सा होता है।

इस शोध में कहा गया कि एक कड़े हिन्‍दू श्रद्धालुओं के समूह का हिस्‍सा बनना एक सुखद अनुभ्‍ज्ञव होता है। इस समूह में एक दूसरे से जो समर्थन प्राप्‍त होता है वह हमारे भीतर सामाजिक हिस्‍सा होने की भावना को और मजबूत करता है।


साल 2010 और 2011 में हुए इस शोध में 416 श्रद्धालुओं के साथ 127 उन लोगों को शामिल किया गया था, जो कभी मेले का हिस्‍सा नहीं बने। यह शोध साइंटिफिक जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

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