जानिए क्या होता है मम्पस

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Aug 23, 2016
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Quick Bites

  • मम्पस को गलसुआ व कंडमाला रोग भी भी कहा जाता है।
  • पेरोटिड ग्रंथियों में में संक्रमण के फैलने से होता है ये रोग।
  • बच्चों से लेकर बड़ों में तक में भी देखे जाते है इसके लक्षण।
  • इससे बचने के लिए एमएमआर नामक टीका होता है प्रभावी।

मम्पस को गलसुआ व कंडमाला रोग भी भी कहा जाता है। कंडमाला व गलसुआ के नाम से ही पता चलता है यह गले में होने वाला रोग है। यह एक संक्रमित रोग होता है। जो पेरोटिड ग्रंथियों में में संक्रमण के फैलने से सूज जाती है।दोनों तरफ कान के नीचे व जबड़े की हड्डी के नीचे स्थित होती हैं। यह ग्रंथियां लार बनाने का काम करती है। इस संक्रमण के लक्षण सामने आने में समय लगता है। यूं तो यह रोग 5 वर्ष से 15 वर्ष तक की उम्र के बच्चों में देखने को मिलता है लेकिन इसके लक्षण किसी भी उम्र के व्यक्ति को प्रभावित कर सकते हैं। यह बहुत गंभीर बीमारी नहीं है लेकिन कई बार समस्या बढ़ भी जाती है।

क्या होते है लक्षण

इसके लक्षणों की शुरूआत वायरस के संपर्क में आने के तकरीबन 14-18 दिनों में होती है। बुखार, सिरदर्द, भूख न लगना, कमज़ोरी, चबाने और निगलने में दर्द होना और गालों में सूजन आदि जैसे लक्षण गलसुआ व टॉंसिल में अक्सर भ्रम की स्थिति पैदा कर देते है। कई बार सिर्फ एक तरह की ही ग्रंथि में सूजन आती है। इसके रोगियों को पेट में तेज दर्द और उल्टी की समस्या हो जाती है। गलसुआ के कारण पुरूषों के अंडकोष में दर्द व प्रजनन क्षमता पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। कभी-कभी स्तन में सूजन, दिमाग की झिल्ली व दिमाग में सूजन आदि भी देखने को मिलती है। हांलाकि इसकी संभावना काफी कम होती है। इसके 10 में से एक मरीज को मेंनिंजाइटिस या एन्सिफलाइटिस के लक्षण भी उभर सकते है और अस्थाई रूप से बहरेपन की समस्या भी हो सकती है।

कैसे फैलता है गलसुआ

मम्पस के वायरस से संक्रमित रोगी, पेरोटिड ग्रंथि में सूजन शुरू होने के 7 दिन पहले और 7 दिन बाद तक संक्रमण फैला सकता है।यह संक्रमण संक्रमित लार, छींकने या खांसने तथा संक्रमित व्यक्ति के साथ बर्तन साझा करने के माध्यम से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में आसानी से फैलता है। गलसुआ व टॉंसिल को लेकर होने वाली भ्रम की स्थिति को दूर करने के लिए डाक्टर्स साधारण से रक्त परीक्षण पुष्टि कर देते है। क्योंकि इस रोग में कानों के एकदम सामने जबड़े में सूजन दिखाई देती है। रक्त में एंटीबॉडी की उपस्थिति आसानी से वायरल संक्रमण की पुष्टि करेगा।

गलसुआ के उपचार

मम्पस के लक्षण दिखाई देने पर चिकित्सक के पास निदान और उपचार के लिए जाना ज़रुरी है। गलसुआ एक तरह का वायरल संक्रमण होता है, ऐसे में इसके लिए एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन नहीं किया जाता है। मांसपेशियों का दर्द और पेरोटिड ग्रंथि में सूजन की वजह से मरीज़ को बहुत दर्द होता है जिसे कम करने के लिए दर्द निवारक दवाएं दी जाती हैं। इसके लिए इबूप्रोफेन या पेरासिटामॉल पेनकिलर का खाना ज्यादा प्रभावी होता है। होमियोपैथी की ‘पल्सेटिला’30 या ‘पैरोटेडिनम’ 30 की एक खुराक भी दें सकते है। मम्पस आमतौर पर 10-12 दिनों में ठीक हो जाते हैं। प्रत्येक पैरोटिड ग्रंथि की सूजन उतरने में एक सप्ताह लगता है, लेकिन दोनों ग्रंथियों में एक समान समय पर सूजन नहीं होती।

गलसुआ के घरेलू उपाय

भी कारगर होते है जैसे सूजे हुए भाग पर ठंडा पैक से सेंकनें से आराम मिलता है। ढ़ेर सारा पानी पीने की सलाह दी जाती है।मेथी के पाउडर में जौ का आटा मिलाकर प्रभावित स्थान पर लेप करने से आराम मिलता है।काली मिर्च का लेप प्रभावित स्थान पर लगाने से आराम मिलता है।एलोवेरा को छीलकर उस पर हल्दी डालकर प्रभावित स्थान पर लगा सकते हैं। गर्म पानी का गरारा करने से भी दर्द में आराम मिलता है। इसमें रोगी को अम्लीय पदार्थों व फलो के रस का सेवन करने से बचना चाहिए। बरगद व पीपल के पत्ते को सेक कर उस पर घी या तेल लगाकर, प्रभावित स्थान पर बांधें।

गलसुआ का टीकाकरण

गलसुआ से बचने के लिए टीककारण एक प्रभावी तरीका माना जाता है। एमएमआर नामक इस टीके से ना केवल मम्पस बल्कि मीज़ल्स और रुबैला (जर्मन मीज़ल्स) से भी बचाव होता है। इस टीके का पहला डोज  12 से 15 महीने की उम्र में और दूसरा बूस्टर डोज़ तीन से पाँच वर्ष की उम्र में दिया जाता है। यदि सभी लोग मम्पस के खिलाफ टीका लगवा लें तो यह टीका जीवनभर प्रभावी रहता है।

रोगी के उपयोग किये गए कपड़े, रूमाल, तौलिया, खाने-पीने के बर्तन, चम्मच इत्यादि अच्छी तरह साफ रखें, मरीज को पूरा आराम करने दें, मरीज को च्युंगम चबाने के लिए दें।


Image Source-Getty

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