जानें क्या है एड्वर्ड सिंड्रोम

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Aug 19, 2016
Comment

Subscribe for daily wellness inspiration

Like onlymyhealth on Facebook!

Quick Bites

  • एड्वर्ड सिंड्रोम आनुवांशिक विकार है।
  • एड्वर्ड सिंड्रोम क्रोमोसोम की गलत संख्या के कारण होता है।
  • एड्वर्ड सिंड्रोम का कोई इलाज नहीं है।
  • एड्वर्ड सिंड्रोम में मरीज असंख्य बीमारियों से त्रस्त होता है।

एड्वर्ड डिसार्डर एक आनुवांशिक विकार है जो कि 18वें क्रोमोसोम की वजह से होता है। एड्वर्ड डिसार्डर का नाम जान एच. एड्वर्ड के नाम पर रखा गया है। जान एच एड्वर्ड वह व्यक्ति हैं जिन्होंने 1960 में सबसे पहले एड्वर्ड सिंड्रोम को वर्णित किया था। सामान्यतः इस बीमारी के मरीज भ्रुण अवस्था में ही मारे जाते हैं। जो शिशु इस बीमारी के साथ जन्म लेते हैं, उन्हें असंख्य समस्या होती है। यही नहीं उनकी जिंदगी बहुत छोटी होती है, वह भी कष्टों भरी। असल में एड्वर्ड सिंड्रोम के तहत मरीज में असंख्य असामान्यताएं होती हैं। उसमें लगभग 130 किस्म के डिफेक्ट होते हैं जिसमें मस्तिष्क, किडनी, हृदय आदि भाग सब शामिल हैं।
एड्वर्ड सिंड्रोम प्रत्येक 5000 लोगों में एक व्यक्ति में जन्म से ही पाया जाता है। शोधों से पता चलता है कि एड्वर्ड सिंड्रोम लड़कों से ज्यादा लड़कियों को प्रभावित करता है। एड्वर्ड सिंड्रोम की 80 फीसदी मरीज महिलाएं हैं। 30 साल की उम्र पार कर चुकी महिलाओं में यह आशंका ज्यादा होती है कि उनके शिशु में यह बीमारी मौजूद हो। यही नहीं 30 साल पार कर चुकी महिलाओं को भी यह बीमारी अपनी जद में ले सकता है।

 

वजह

मानव शरीर में मौजूद सेल्स में क्रोमोसोम के 23 पेयर पाए जाते हैं जो कि उनके अभिभावकों द्वारा उन तक पहुंचता है। मानव रिप्रोडक्टिव सेल में, महिलाओं में ओवम सेल होता है जबकि पुरुषों में स्पर्म सेल होता है। दोनों के पास 23-23 क्रोमोसोम होते हैं। महिलाओं के क्रोमोसोम को XX कहा जाता है जबकि पुरुषों के क्रोमोसोम को XY कहा जाता है। बहरहाल क्रोमोसोम से निकला अतिरिक्त मैटीरियल ही एड्वर्ड सिंड्रोम के लिए जिम्मेदार होता है। वास्तव में जो शिशु एड्वर्ड सिंड्रोम के साथ पैदा होते हैं, उनमें क्रोमोसोम की संख्या बराबर नहीं होती। क्रोमोसोम की उतार चढ़ाव के कारण ही इस तरही की बीमारी शिशुओं में पैदा होती है। अलग अलग संख्या को अलग अलग नाम से जाना जाता है।

 

लक्षण

एड्वर्ड सिंड्रोम के साथ पैदा हुए शिशु न सिर्फ कमजोर होते हैं बल्कि मानसिक और शारीरिक रूप से दुर्बल भी होते हैं। ज्यादातर मरीजों का वजन कम होता है। उन्हें अंडर वेट कहा जाता है। एड्वर्ड सिंड्रोम के ज्यादातर मरीजों का सिर छोटा होता है और पीठ उठी हुई होती है। यही नहीं ऐसे मरीजों के कान छोटे होते हैं और टेढ़े भी होते हैं। इनके मुंह और जबड़े भी छोटे होते हैं। ऐसी स्थिति को ‘माइक्रोग्नैथिया’ कहा जाता है। जो शिशु एड्वर्ड सिंड्रोम  के शिकार होते हैं, उनके होंठों और तालु में छिद्र होता है या फिर उन्हें होंठ और तालु से जुड़ी कोई न कोई समस्या अवश्य होती है।  इनके हाथ भिंचे हुए होते हैं और अंगुलिया जैसे एक के ऊपर एक चढ़ी हुई होती हैं। इनके पैर की अवस्था भी कोई अच्छी नहीं होती। पैर बिल्कुल बेजान होते हैं।
जो शिशु एड्वर्ड सिंड्रोम के साथ पैदा होते हैं, उनके फेफड़े कमजोर होते हैं। ब्लड वेसल भी कोई खास अवस्था में नहीं होता। इनको कई किस्म की हृदय सम्बंधी बीमारियां होती हैं। लब्बोलुआब यह है कि एड्वर्ड सिंड्रोम के साथ पैदा हुए शिशु में असंख्य बीमारियां होती हैं। वे न तो मानसिक रूप से विकसित होते हैं और न ही शारीरिक रूप से। उन्हें असंख्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

 

रोग निदान

यूं तो एड्वर्ड सिंड्रोम के साथ पैदा हुए शिशुओं को अलग अलग डाक्टरों के पसा ले जाना पड़ता है। क्योंकि प्रत्येक बीमारी प्रत्येक विशेषज्ञों द्वारा ही ठीक की जा सकती है। इसके अलावा जिन महिलाओं के शिशु या भ्रुण को एड्वर्ड सिंड्रोम होता है, उनका गर्भाशय असामान्य रूप से बड़ा होता है। ऐसा अतिरिक्त एम्नियोटिक फ्लूड के कारण होता है। ऐसे शिशु के जन्म के दौरान उनके प्लेसेंटा असामान्य रूप से छोटा होता है। कहने का मतलब यह है कि एड्वर्ड सिंड्रोम के निदान के लिए काफी एहतियात बरतनी पड़ती है। जरूरत पड़ने पर एक्सरे किया जाता है, फिंगर प्रिंट पैटर्न लिये जाते हैं। यही नहीं कैरयोटाइपिंग की भी मदद ली जाती है। इसके तहत शिशु के क्रोमोसोम की जांच करने हेतु उनका रक्त सैम्पल लिया जाता है।

 

ट्रीटमेंट

विज्ञान अब तक इस बीमारी के ट्रीटमेंट को खोजने में असमर्थ है। असल में यह बीमारी इतनी घातक है कि इसमें मरीज की जान जाना निश्चित होता है। इसके अलावा शिशु जो इस बीमारी के साथ पैदा होते हैं, वे असंख्य समस्याओं से जूझ रहे होते हैं। मरीजों में शारीरिक बीमारियां, मानसिक बीमारियां, चेहरा भी इस बीमारी से अछूता नहीं रहता। हर छोटी छोटी चीज इस बीमारी से प्रभावित होती है। ऐसे में यह विज्ञान के लिए एक बड़ी चुनौती है कि इसके निदान की खोज की जाए। संभवतः सही इलाज के बाद ऐसे शिशुओं जीवन कुछ महीनों से बढ़कर साल भर हो जाता है। हालांकि ऐसे मरीजों की संख्य बहुत कम है।

 

Read more articles on Other disease in Hindi.

Write Comment Read ReviewDisclaimer Feedback
Is it Helpful Article?YES1 Vote 1141 Views 0 Comment
संबंधित जानकारी
  • सभी
  • लेख
  • स्लाइडशो
  • वीडियो
  • प्रश्नोत्तर