मां और बच्‍चे के स्‍वास्‍थ्‍य पर असर डालती है किशोर गर्भावस्‍था

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Oct 21, 2013
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Quick Bites

  • कम उम्र में जन्‍म देने वाली मां के बच्‍चे के विकास पर पड़ता है प्रभाव।
  • किशोर गर्भावस्‍था में युवती को हो सकती है प्री टर्म लेबर पेन की समस्‍या।
  • 19 साल या इससे कम उम्र में मां बनने से शरीर में कजोरी आती है।
  • किशोर गर्भावस्‍था में पैदा हुए बच्‍चे का वजन सामान्‍य से कम हो सकता है।

कम उम्र में मां बनना किशोरी के साथ ही शिशु के लिए भी गलत होता है। किशोरी 19 साल की उम्र में शारीरिक और मानसिक तौर पर मां बनने के लिए तैयार नहीं होतीं।

effect of teenage pregnancy

किशोर गर्भावस्‍था के कारण युवतियों के स्वास्थ्य पर तो नकारात्मक असर पड़ता ही है, साथ ही उनकी पढ़ाई और सामाजिक जीवन भी प्रभावित होता है। हर बच्चे पर उसके माता-पिता के विकास का असर होता है। यदि मां-बाप ही मानसिक और शारीरिक रुप से परिपक्व नहीं होंगे तो इसका सीधा असर बच्‍चे की परवरिश पर पड़ेगा। अपरिपक्वता के कारण वे बच्चे की जरूरतों के प्रति सजग नहीं हो पाते।


किशोर गर्भावस्था भविष्य पर भी असर डालती है। यह समय लड़कियों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होता, इस उम्र में एक मां की भूमिका के लिए तैयार नहीं होती। व्‍यावहारिक रुप से परिपक्व होने के बाद महिलाओं के लिए शिशु के जन्‍म के बाद होने वाले तनाव को संभाल पाना आसान होता है। लेकिन, कम उम्र में मां बनने वाली किशोरियां अक्सर तनाव में रहती हैं और बच्चे की देखभाल प्रभावित होती है। इस लेख के जरिए हम बात करते हैं किशोर गर्भावस्‍था के अन्‍य कुछ प्रभावों के बारे में।

 

बच्चे की स्वास्थ्य समस्याएं

कम उम्र में मां बनने पर समय से पहले शिशु के जन्म का खतरा बना रहता है। इसके अलावा कम वजन व अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी हो सकती हैं। किशोर गर्भावस्था के कारण बच्चे का विकास भी ठीक से नहीं हो पाता क्योंकि उन्हें जरूरी पोषक तत्व नहीं मिलते। नवजात मृत्यु दर बढ़ने का एक कारण किशोर गर्भावस्था भी है।

 

प्रीटर्म लेबर पेन

किशोर गर्भवती को एक आम गर्भवती महिला की अपेक्षा कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। किशोर गर्भावस्था में कई बार प्री टर्म लेबर पेन भी हो जाता है। इसके अलावा एनीमिया और हाई ब्लड प्रेशर की समस्‍या होने की आशंका भी बनी रहती है।

 

मां के स्वास्थ्य पर असर

किशोर गर्भावस्था के दौरान लड़कियों के शरीर में कई बदलाव होते हैं, जिसकी वजह से उन्हें चक्कर, बेहोशी की समस्या हो सकती है। किशोरियों के लिए उनकी नियमित दिनचर्या काफी मुश्किल भरी हो जाती है। खाने में पोषक तत्वों की कमी होने से वे कमजोरी महसूस करती हैं और कई प्रकार की बीमारियों का शिकार हो जाती हैं।

 

बच्चे पर ध्यान न दे पाना

किशोर मां शिशु की देखभाल ठीक से नहीं कर पाती हैं। कई बार यह भी देखा गया है कि वे भावनात्मक तौर पर बच्चे से मजबूती से नहीं जुड़ पातीं। किशोर मां को शिशु की जरूरतों के बारे में भी सही से पता नहीं लग पाता जैसे बच्‍चे को कब भूख लगी है या अन्य जरूरतों के बारे में।

 

कम वजन का बच्‍चा

जन्‍म के समय बच्‍चे का वजन 2,500 ग्राम यानी ढाई किलो से कम है तो उसे कम वजन का शिशु माना जाता है। कम वजन वाले बच्‍चों के जन्‍म की संभावना सामान्‍य माताओं की तुलना में उन माताओं में ज्‍यादा होती है जिनकी उम्र 20 वर्ष से कम होती है।

किशोर गर्भावस्‍था नवजात शिशुओं और महिलाओं की मृत्‍यु दर बढ़ने का एक बड़ा कारण है। किशोर गर्भावस्‍था में कमी लाने के लिए हमें जागरूक समाज बनाना होगा और यौन शिक्षा की जानकारी देनी होगी।

 

 

 

 

 

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