कैसे होता है सोरायसिस

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Feb 14, 2012
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Quick Bites

  • हमारे शरीर में दिन-प्रतिदिन बदलाव होते रहते हैं जिनमें से अधिकांश का हमें अंदाजा भी नहीं होता
  • सोरायसिस चमड़ी पर होने वाली एक ऐसी बीमारी है जिसमें त्वचा पर एक मोटी परत जम जाती है
  • सोरायसिस रोग के लक्षणों को आराम से पहचाना जा सकता है
  • सोरायसिस होने पर थ्रोट इंफेक्शन से बचें और तनाव रहित रहें

 

सोरायसिस त्वचा की ऊपरी सतह पर होने वाला चर्म रोग है। सोरायसिस एक वंशानुगत बीमारी है लेकिन यह कई अन्य कारणों से भी हो सकता है। आइये जानते हैं कि सोरायसिस क्या है और कैसे होता है।

hannds with psoriasisक्या है सोरायसिस

सोरायसिस चमड़ी पर होने वाली एक ऐसी बीमारी है जिसमें त्वचा पर एक मोटी परत जम जाती है। अलग शब्दों में कहें तो चमड़ी की सतही परत का अधिक बनना ही सोरायसिस है। त्वचा पर सोरायसिस की बीमारी सामान्यतः हमारी त्वचा पर लाल रंग की सतह के रूप में उभरकर आती है और स्केल्प (सिर के बालों के पीछे) हाथ-पांव अथवा हाथ की हथेलियों, पांव के तलवों, कोहनी, घुटनों और पीठ पर अधिक होती है। हालांकि यह रोग केवल 1-2 प्रतिशत लोगों में ही पाया जाता है। यह रोग आनु्‌वंशिक भी हो सकता है। आनु्‌वंशिकता के अलावा इसके होने के लिए पर्यावरण भी एक बड़ा कारण माना जाता है। यह बीमारी कभी भी और किसी को भी हो सकती है। कई बार इलाज के बाद इसे ठीक हुआ समझ कर  लोग निश्चिंत हो जाते हैं, लेकिन यह बीमारी दोबारा हो सकती है। सर्दियों के मौसम में यह बीमारी ज्यादा होती है। सोरायसिस को छालरोग भी कहा जाता है। इसमें त्वचा पर लाल दाग पड़ जाते हैं, कई बार इस रोग से पहले त्वचा पर बहुत अधिक खुजली होने लगती है। सोरायसिस की समस्या बहुत लोगों को होती है। एक आंकडे के मुताबिक दुनियाभर में लगभग 1 फीसदी लोग चर्मरोग या छालरोग से पीडि़त हैं। भारत में भी कुल जनसंख्या में से लगभग 1 फीसदी लोग सोरायसिस से पीडि़त हैं। हालांकि सोरायसिस का उपचार संभव है लेकिन इसके लिए जरूरी है कि इस रोग को बढ़ने से पहले ही उपचार किया जाए। सोरायसिस का घरेलू नुस्खों द्वारा भी उपचार किया जा सकता हैं लेकिन ध्यान रहे यदि इसका ठीक से उपचार नहीं किया जाए तो आपको त्वचा संबंधी और भी कई समस्याएं हो सकती हैं। आइए जानें कैसे होता है सोरायसिस।

सोरायसिस कैसे होता है


हमारे शरीर में दिन-प्रतिदिन बदलाव होते रहते हैं जिनमें से अधिकांश का हमें अंदाजा भी नहीं होता। जैसे हमारे, नाखून, बाल इत्यादि बढ़ते हैं ठीक वैसे ही हमारी त्वचा में भी परिवर्तन होता है। जब हमारे शरीर में पूरी नयी त्वचा बनती है , तो उस दौरान शरीर के एक हिस्से में नई त्वचा 3-4 दिन में ही बदल जाती है। यानी सोरायसिस के दौरान त्वचा इतनी कमजोर और हल्की पड़ जाती है कि यह पूरी बनने से पहले ही खराब हो जाती है। इस कारण सोरायसिस की जगह पर लाल चकते और रक्त की बूंदे दिखाई पड़ने लगती है। हालांकि सोरायसिस कोई छूत की बीमारी नहीं हैं और ये ज्यादातर पौष्टिक आहार ना लेने की वजह से होती है। यदि आपके खानपान में पौष्टिक तत्वों की कमी है और आप घी-तेल भी बिल्कुल ना के बराबर खाते हैं तो आपको यह रोग हो सकता है। सोरायसिस त्वचा पर मॉश्चराइजर ना लगाने, त्वचा को चिकनाहट और पर्याप्त नमी ना मिलने के कारण भी होता है। त्वचा की देखभाल ना करना, बहुत अधिक तेज धूप में बाहर रहना, सुबह की हल्की धूप का सेवन न कर पाना इत्यादि कारणों से सोरायसिस की समस्या होने लगती हैं। सोरायसिस के उपचार के लिए कुछ दवाईयां का सेवन किया जा सकता है लेकिन इससे निजात पाने के लिए आपको त्वचा की सही तरह से देखभाल करना जरूरी है।

सोरायसिस के संकेत


सोरायसिस रोग के लक्षणों को आप आराम से पहचान सकते हैं। जब आपकी त्वचा पर छिल्केदार, लाल-लाल पपडि़या सी जमने लगे तो यही रोग सोरायसिस है। इस रोग की पहचान है कि यह त्वचा के किसी एक हिस्से से शुरू होता है और बाद में बढ़कर फैल जाता है। आमतौर पर यह रोग कोहनी, घुटनों, कमर इत्यादि जगहों पर होता है। साथ ही मौसम के लगातार परिवर्तन से भी सोरायसिस होने लगता हैं और सर्दियों में सोरायसिस की समस्या अधिक बढ़ जाता है। सोरायसिस रोग का उपचार संभव है लेकिन इसको पूरी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता। कई बार इस रोग से पीडि़त रोगी स्वंय ही ठीक हो जाते हैं। सोरायसिस का निदान भी संभव है लेकिन सबसे पहली उसकी पहचान होना और लक्षणों के बारे में जानकारी होना जरूरी है।

 


सोरायसिस होने पर क्या करें

सोरायसिस होने या इसकी आशंका भी होने पर विशेषज्ञ चिकित्सक को दिखाएं और उसके द्वारा बताए अनुसार निर्देशों का पालन करते हुए उपचार कराएं ताकि रोग नियंत्रण में रहे। थ्रोट इंफेक्शन से बचें और तनाव रहित रहें, क्योंकि थ्रोट इंफेक्शन और स्ट्रेस सीधे-सीधे सोरायसिस को प्रभावित कर रोग के लक्षणों में वृद्धि करता है। त्वचा को अधिक खुश्क होने से भी बचाएँ ताकि खुजली उत्पन्न न हो। सोरायसिस के उपचार में बाह्य प्रयोग के लिए एंटिसोरियेटिक क्रीम/ लोशन/ ऑइंटमेंट की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। रोग की तीव्रता न होने पर साधारणतः मॉइस्चराइजिंग क्रीम इत्यादि से ही रोग नियंत्रण में रहता है। लेकिन जब बाहरी उपचार से लाभ न हो तो मुंह से ली जाने वाली एंटीसोरिक और सिमटोमेटिक औषधियों का प्रयोग आवश्यक हो जाता है। आजकल अल्ट्रावायलेट लाइट से उपचार की विधि भी अत्यधिक उपयोगी और लाभदायक हो रही है।

 


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