कहीं आप तो नहीं नोमोफोबिया के शिकार

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Feb 26, 2013
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women use phone

 

 

मोबाइल फोन ने एक ओर जहां इंसानी जिंदगी को आसान बनाया है, वहीं एक नया डर भी पैदा किया है।

 

इस नए डर का नाम है नोमोफोबिया। यानी नो मोबाइल फोबिया। मोबाइल खोने या न होने का डर। एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक यह सबसे सामान्‍य फोबिया है। कहीं आप तो इस नई बीमारी के शिकार नहीं। 

 

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आप कहीं जा रहे होते हैं और आप अचानक अपनी जेब को टटोकर मोबाइल फोन को ढूंढते हैं। आपके शरीर में हल्की सी चुनचुनाहट फोन के वाइब्रेट होने या बजने का संकेत देती है। जब कि ऐसा होता नहीं है। हर दिन आप किसी न किसी नयी बीमारी के बारे में सुनते हैं, लेकिन कुछ बीमारियां ऐसी हैं जिनके आप शिकार होते हैं और आपको कानों-कान कोई खबर भी नहीं होती। नोमोफोबिया भी एक ऐसी ही बीमारी है। इस बीमारी के लक्षण बहुत ही आम हैं। 

 

नोमोफोबिया है क्या – 

नोमोफोबिया को रिंग एंजाइटी भी कहते हैं। इसमें आपको बार-बार यह महसूस होता है कि कहीं आपका फोन बज तो नहीं रहा। कहीं आपके किसी ने कोई मैसेज तो नहीं किया है। आपको अक्सर यह अंदेशा लगा रहता है कि आपका फोन बज रहा है आप उसकी रिंग को सुन नहीं पा रहे हैं। कहीं किसी ने कोई मिस कॉल तो नही किया, इन सब बातों का डर आपको हमेशा सताता रहता है। नोमोफोबिया की बीमारी के दौरान आपको बार-बार यही महसूस होता रहता है कि आपका मोबाइल कहीं खो न जाए। आप अनायास ही बार-बार अपना मोबाइल फोन चेक करते रहते हैं। 

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क्या कहती है रिसर्च – 

लंदन में हुई रिसर्च में यह पाया गया कि 77 प्रतिशत लोगों को मोबाइल के बिना कुछ पल बिताना मुश्किल होता है। इस अध्ययन में 25-34 आयु वर्ग के 68 प्रतिशत लोग थे जो मोबाइल के बिना रह नहीं सकते हैं। 75 प्रतिशत से ज्यादा लोग बाथरूम तक में अपना मोबाइल फोन लेकर जाते हैं। 46 प्रतिशत लोग अपने फोन में पासवर्ड इसलिए लगाते हैं जिससे कि उनका मोबाइल कोई छेड़े नहीं। लगभग 50 फीसदी लोग ऐसे भी हैं जिनका एसएमस या एमएमएस कोई पढ़ लेता है तो वह निराश या तनाव में आ जाते हैं। ऐसे लोग एक दिन में कम से कम 35-40 बार अपना मोबाइल फोन चेक करते हैं। 

 

क्यों होता है नोमोफोबिया – 

मोबाइल फोन के बढते प्रयोग के कारण इस बीमारी के होने का खतरा बढ गया है। लोगों का मोबाइल फोन के प्रति बढ रही उपयोगिता इस बीमारी का प्रमुख कारण है। आज लगभग सभी के पास मोबाइल होता है। मोबाइल ने कंप्यूटर और लैपटाप के प्रयोग को कम कर दिया है। सारे काम मोबाइल फोन से हो जाते हैं। ऐसे में लोगों को यह आशंका बनी रहती है कि मोबाइल फोन के बिना उनकी जिंदगी अधूरी है और इसके बिना वह रह नहीं पायेंगे। 

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नोमोफोबिया का शिकार होने से बचें – 

नोमोफोबिया का शिकार होने से बचने की कोशिश कीजिए। अगर मोबाइल का प्रयोग न हो तो उसे अपने पास मत रखिए। ज्यादा लंबे समय तक फोन पर बात करने से बचिए। मोबाइल फोन को पैंट या शर्ट की जेब में रखने की बजाय अपने हाथ में ही रखिए। बिना वजह की चैटिंग या एसएमएस करने से बचें। बार-बार अगर मोबाइल पर नजर जा रही है तो कुछ देर तक के लिए स्विच ऑफ कर दीजिए। वाइब्रेट मोड की बजाय रिंगर टोन का वाल्यूम तेज करके रखिए। एसएमएस एलर्ट की टोन लगाकर रखिए। 

 

नोमोफोबिया पुरूषों के मुकाबले महिलाओं और युवाओं में ज्यादा देखने को मिल रहा है। यदि आपको भी अपने फोन को लेकर कोई भय या डर है तो इसको अपने दिमाग से निकाल दीजिए नहीं तो आपको भी यह बीमारी हो सकती है। और फिर भी अगर कोई राह न सूझ रही तो किसी मनोचिकित्‍स से सलाह लेनें में देर न करें। 

 

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