कैंडिडा डाइट से संबंधित कुछ जरूरी बातों के बारे में जानें

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Jun 27, 2016
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Quick Bites

  • कैंडिडा एल्बीकैंस नामक फंगस की वजह से होती है कई बीमारी।
  • हमारी आंतों मे पाया जाता है कैंडिडा एल्बीकैंस नामक फंगस।
  • कैंडिडा डाइट शरीर के विषाक्त को दूर करने के लिए होती है।
  • कम चीनी, एंटीफंगल आहार और प्रोबायोटिक्स का करते है सेवन।

आजकल के दौर में कई लोग थकान, यीस्ट इंफेक्शन, इर्रिटेबल बोवेल सिंड्रोम, खुजली आदि जैसी समस्यायों से परेशान रहते है। पर आप शायद ते जानते है नहीं कि या सारे लक्षण कई बार एक की समस्या कैंडिडा एल्बीकैंस नामक फंगस की वजह से होता है। कैंडिडा को जल्दी पहचाना नहीं जा पाता है। लेकिन आज हम इसके बारे में आपको इसके बारे में विस्तार से बताते है। कैंडिडा एल्बीकैंस एक तरह का रोगजनक फंगस होता है जो आपके माइक्रोऑर्गज्स्म के संतुलन के बिगड़ने पर बढ़ने लग जाता है। आपके इम्यून सिस्टम औप पाचन क्रिया में गट फ्लोरा एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। लेकिन तनाव और एंटीबायोटिक की दवाओं के बाद खत्म हो जाता है। जब ये संतुलन खत्म हो जाता है, कैंडिडा एल्बीकैंस कॉलोनिज आंतों में अपनी जगह बनाने लगती है। कैंडिडा एल्बीकैंस 79 तरह के बायप्रोडक्ट्स को रिलीज करता है जिसमें यूरिक एसिड और न्यूरोटॉक्सिन नामित एसीटैल्डिहाइड भी शामिल है।  एसीटैल्डिहाइड की वजह से क्रोनिक सिरदर्द और ब्रेन फॉग जैसी समस्या हो सकती है, जिसे इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रीसर्च ऑन कैंसर नें कैंसर का कारण बताया है। यूरिक एसिड की वजह से जोड़ों में दर्द और गठिया का शिकायत हो सकती है। इसके अलावा पाचन की समस्या, यीस्ट इंफेक्शन और मुंह में छाले आदि की शिकायत हो सकती है।

कैंडिडा एल्बीकैंस बढ़ने का कारण

 

  • एंटीबायोटिक्स का ज्यादा सेवन-कैंडिडा के बढ़ने का सबसे बडा कारण एंटीबायोटिक्स माना जाता है। हमारी जान बचाने वाली एंटीबायोटिक्स के गंभीर साइडइफेक्ट्स होते है, जिन्हें नजरदांज नहीं करना चाहिए। इसका सेवन बैक्टीरिया द्वारा किए गए संक्रमण का उपचार करने के लिए किया जाता है। बैक्टीरिया सूक्ष्मजीव होते हैं, जो कई प्रकार के संक्रमणों का कारण बनते हैं। एंटीबायोटिक्स या तो बैक्टीरिया को नष्ट कर देते हैं या इन्हें प्रजनन करने से रोकते हैं। कुछ एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल फंगस और प्रोटोजोआ की रोकथाम के लिए भी किया जाता है, लेकिन इनमें वायरस को नष्ट करने की क्षमता नहीं होती। कई बार इनके ज्यादा सेवन से शरीर के लिए जरूरी बैक्टीया की भी मौत हो जाती है जो कैंडिडा जैसे फंगस को बढ़नें का मौका दे देते है।
  • शक्कर की ज्यादा मात्रा- शक्कर का ज्यादा सेवन जहर के समान होता है। आज के बढ़ते चलन में हमारे सभी आहार में कुछ मात्रा में फूक्र्टोज मौजूद ही रहता है। फिर चाहे वो पास्ता हो या सैलेड ड्रेसिंग। इसका सबसे बड़ा नुकसान प्रतिरक्षा प्रणाली को पहुँचता है। यह आपके शरीर की अंदरुनी शक्ति को कम कर देती है और रक्त में मौजूद सफ़ेद सेल्स को कम करती है।
  • लंबे समय तक तनाव-तनाव आपको शारीरिक और मानसिक दोनो ही तरह से प्रभावित करता है। आप खुद मानते है कि तनाव सभी बड़ी बीमारियों का एक बहुत बड़ा कारण होता है।  तनाव की स्थिति में रक्त में शुगर का स्तर बढ़ने लगता है। तनाव से रक्तचाप और हानिकारक कोलेस्ट्रोल के स्तर में बेहद इजाफा हो जाता है। इन दोनों के चलते व्यक्ति को हार्ट अटैक का खतरा 27 फीसदी तक बढ़ जाता है। साथ ही ये इम्यून सिस्टम को प्रभावित करता है जो कैंडिडा को बढ़ावा देता है।

 

कैसे करें इसका इलाज

 

  • चीनी की मात्रा कम करें -इन फंगस को रोकने के लिए सबसे पहले हमें आपने आहार में से चीनी की मात्रा को कम करना चाहिए। हमारे शरीर के लिए जरूरी कैलोरी में चीनी से मिलने वाली कैलोरी की मात्र 10 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।अधिक चीनी पाचन तंत्र को भी प्रभावित करती है।
  • तनाव कम करें और एंटीफंगल आहार लें -तनाव सभी तरह से शरीर को केवल नुकसान ही पंहुचाता है। ऐसे में आपको तनाव से मुक्ति जरूर लेनी चाहिए। इसके लिए आप व्यायाम, योगा, मेडिटेशन आदि का अभ्यास कर सकते है। इसके अलावा आप अपने खाने में एंटीफँगल आहार शामिल करें। ये आपको स्वस्थ ऱखेंगे।
  • प्रोबायोटिक्स लें -एंटिबायोटिक के इस्तेमाल की वजह से शरीर में ज्यादा खराब बैक्टीरिया घुस जाते हैं तो संतुलन बिगड़ने से पूरा शरीर प्रभावित होता है। जबकि प्रोबायोटिक्स अच्छे सूक्ष्मजीवों को बहाल करने और आंतों के कार्य को सुधारने में मदद करते हैं।बैक्टीरिया के संतुलन से एलर्जी का खतरा भी काफी कम हो जाता है।ये लैक्टोस असहिष्णुता को कम करते हैं और प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं। डेयरी उत्पाद जैसे दही और छाछ प्रोबायोटिक के अच्छे स्त्रोत हैं। साथ ही ये खमीरयुक्त खाद्य पदाथरें में भी मिलते हैं। इडली, डोसा, ढोकला और उत्तपम भी प्रोबायोटिक के अच्छे स्त्रोत हैं।


राइस यूनीवर्सिटी की शोध के अनुसार हमारी आंतो के पास करीब 70 फीसदी कैंडिडा एल्बीकैंस पाये जाते है। जिसमे से ज्यादातर किसी तरह का नुकसान नहीं पंहुचाते है। ये छोटी-छोटी कॉलोनीज में माइक्रोऑर्गज्स्म के निंयत्रण में रहते है। हमारे शरीर के संतुलन के बिगड़ने पर ही ये बढ़ने लगते है।

 

Image Source-Getty

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