अगर नहीं लें पा रहे हैं निर्णय तो हो सकता है डेलिरियम

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Aug 29, 2016
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Quick Bites

  • डेलिरियम दिमागी कंफ्यूशन है।
  • डेलिरियम मस्तिष्क और शरीर दोनों को प्रभावित करता है।
  • डेलिरियम के मरजी अपना ख्याल नहीं रख पाते।
  • डेलिरियम के मरीज झट से तनाव में आ जाते हैं।

डेलिरियम वास्तव में एक किस्म का दिमागी कंफ्ूयशन है। यह मस्तिष्क में निरंतर और झट से हो रहे बदलाव के कारण होता है। इससे न सिर्फ मस्तिष्क प्रभावित होता है वरन शरीर भी इससे अछूता नहीं रह पाता। डेलिरियम को शारीरिक और मानसिक रोग भी कहा जाता सकता है जो कि स्थायी-अस्थयी, उलट-पलट जैसे बदलाव के कारण होता है। असल में इस बीमारी के तहत मस्तिष्क तक पर्याप्त आक्सीजन और आवश्यक तत्व नहीं पहुंच पाता। डेलिरियम के कारण मस्तिष्क में हानिकारक रसायन भी पैदा हो सकते हैं।

  • जो लोग अत्यधिक मात्रा में शराब का सेवन करते हैं उन्हें डेलिरियम का खतरा बना रहता है। यही नहीं ड्रग का ओवरडोस भी इसकी एक वजह है। इसके अलावा शरीर में रसायन सम्बंधी उतार चढ़ाव, संक्रमण जैसे यूरिनेरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन, निमोनिया आदि या फिर जो लोग कम सोते हैं और जहर का कभी सेवन किया हो तो उन्हें भी डेलिरियम हो सकता है।उदाहरण के तौर आप दीपक को ही लें। दीपक में एक क्षण आलस भरा रहता है तो दूसरे ही क्षण वह आंदोलनकारी बन जाता है यानी अत्यधिक फुर्ति उसमें भर जाती है। लेकिन झट से फिर वह वापिस आलस की स्थिति में पहुंच जाता है। इससे दीपक खुद नहीं समझ पाता कि उसे हो क्या रहा है और वह परेशान हो उठता है। इस बीमारी को ही डेलिरियम कहा जाता है।
    बहरहाल डेलिरियम की कई वजहें हैं मसलन
  • सजगता में बदलाव। इस स्थिति में सामान्यतः मरीज दिन में बेहद सक्रिय होता है और रात को बिल्कुल निष्क्रिय हो जाता है।
  •  भावनाओं में बदलाव।
  •  जानकारियों में बदलाव।
  •  सक्रियता में बदलाव।
  •  सोने की प्रवृत्ति में बदलाव।
  • जगह और स्थान को लेकर कंफ्यूशन।
  •  याद्दाश्त का प्रभावित होना। बार बार पुरानी चीजों को याद करने की कोशिश करना।
  •  सोच में बदलाव। ऐसी बातें करना जिनका कोई मतलब नहीं होता।
  •  एकाग्र क्षमता का प्रभावित होना।

 

  • डेलिरियम होने की स्थिति में कई किस्म के टेस्ट यानी परीक्षण किये जाते हैं। इन्हें हम घर में बैठकर नहीं कर सकते। असल में डेलिरियम एक घातक बीमारी है जिनका टेस्ट विशेषज्ञों द्वारा ही किया जा सकता है। इनमें ब्लड, यूरिन टेस्ट, एक्स-रे, सेरिब्रोस्पाइनल फ्लूइड एनालिसिस, ईईजी, सीटी स्कैन, एमआरआई आदि शामिल हैं।
  • चूंकि डेलिरियम एक मानसिक बीमारी है तो इसका उपचार भी कोई एक स्थायी नहीं हो सकता। इसका उपचार प्रत्येक मरीज पर अलग अलग होता है। कई दफा मरीज को अस्पताल में रहते हुए अपना इलाज कराना होता है। लेकिन मरीज को यह जहन में रखना होता है कि इसकी दवा का नियमित और सही ढंग से सेवन किया जाए। दरअसल इसके दवाई के खिलवाड़ करने का मतलब अपने आपसे खेलने जैसा है। इससे मानसिक बीमारी बढ़ सकती है, कंफ्यूशन बढ़ सकता है। इसके अलावा और भी कई समस्याएं जद में ले सकती है। मसलन अनीमिया, हाइपोक्सिया, हृदय सम्बंधी बीमारी, कार्बन डाइआक्साइड का स्तर बढ़ना, संक्रमण, किडनी का फेल होना, लिवर का फेल होना, तनाव होना, अवसाद होना, थायराइड होना आदि।
  • जटिलताएं  डेलिरियम के कारण कई अन्य समस्याएं भी जन्म ले सकती हैं। इसके तहत मरीज अपना ख्याल नहीं रख पाता। वह दूसरों से ठीक से बातचीत नहीं कर पाता। दूसरों से बात करते हुए संकोच महसूस करता है। कई बार मरीज कोमा में भी चला जाता है। यही नहीं दवा के भी नकारात्मक प्रभाव सामने आ सकते हैं। इससे अन्य किस्म की बीमारियां भी सामने आ सकती हैं।


डेलिरियम का एक ही उपचार है कि डाक्टर से सीधे संपर्क करें। यदि इसका इलाज घर पर हो रहा है तो मरीज की देखभाल अच्छे से करें। उसे मरीज होने का एहसास न होने दें। किसी भी तरह का उस पर दबाव न डालें। यदि मरीज अस्पताल में भर्ती है तो फिर उसे पूरी तरह डाक्टर के संपर्क में रहने दें। उसे वही खाने को दें जो डाक्टरों ने कहा। सही समय पर दवा देने की कोशिश करें। दवा देने से डेलिरियम के रिस्क में कमी आती है। दवा की कमी मरीज की स्थिति को गंभीर बना सकत है।


Image SOurce-Getty

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