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जानें क्‍यों युवाओं में बढ़ रहा है तनाव

By:Meera Roy, Onlymyhealth Editorial Team,Date:Jun 24, 2015
तनाव सभी को हो रहा है, लेकिन युवाओं में इसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती है, फिर भी कुछ कारण ऐसे हैं जिनके कारण युवा आसानी से तनाव की चपेट में आ रहे हैं, इन कारणों के बारे में विस्‍तार से जानिये।
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    युवाओं में तनाव

    मौजूदा दौर में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो तनाव से न घिरा हो। लेकिन युवाओं की बात करें तो सबसे ज्यादा तनाव इन्हीं में नजर आता है। इसके असंख्य उदाहरण आए दिन हमारे इर्द-गिर्द दिख जाते हैं। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि तलाक की संख्या में दिनों दिन हो रहे इजाफे का मुख्य कारण भी तनाव ही है। बहरहाल सवाल यह उठता है कि आखिर युवा पीढ़ी इस कदर तनाव से भरी क्यों है? इसके पीछे एक बड़ी वजह हमारी बदली जीवनशैली है। आइये इन पर ज़रा गौर फरमाते हैं।

    युवाओं में तनाव
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    टेक्नोलाजी

    यूं तो तकनीक ने जिंदगी को हमारी अंगुलियों में लाकर समेट दिया है। जी, हां! जहां एक ओर तकनीक के जरिये हमारी जिंदगी सरल व सहज हुई है, वहीं दूसरी ओर इसने हमें हमारे अपनों से दूर कर दिया है। हम दोस्तों से वक्त निकालकर मिलने नहीं जाते, अपने दिल की बात किसी से साझा नहीं करते। परिणामस्वरूप घर या दफ्तर की तमाम समस्याएं दिल में बोझ की तरह लिये बैठे रहते हैं। निश्चित रूप से जीवनशैली का यह बड़ा बदलाव हमारे इर्द-गिर्द तनाव का जाल बिछा देता है।

    टेक्नोलाजी
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    काम का बोझ

    जैसे जैसे हमारी क्रेय-विक्रेय क्षमता बढ़ रही है, वैसे वैसे हम पर काम का दबाव भी बढ़ रहा है। असल में कहने की बात यह है हमारी वित्तीय स्थिति तो दिनों दिन बेहतरी की ओर जा रही है लेकिन हमारी मानसिक स्थिति बदतर हो रही है। काम का अतिरिक्त बोझ हमेशा हमें तनाव के कटघरे में लाकर खड़ा कर देता है। ...और हकीकत यह है कि युवा अकसर काम के बोझ से लदे रहते हैं।

    काम का बोझ
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    नाइट लाइफ

    आजकल युवाओं में एक नया चलन देखने को मिल रहा है। यह है, नाइट लाइफ। युवाओं में रात को जगने की, काम करने की यहां तक अपने शौक पूरा करने के लिए भी रात में जगने की चाह बढ़ती जा रही है। शायद आप यह नहीं जानते कि नाइट लाइफ हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। यही कारण है कि रातभर की थकान सुबह तनाव में परिवर्तित हो जाती है।

    नाइट लाइफ
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    शिफ्टिंग जाब

    बीपीओ संस्कृति ने जहां एक ओर युवाओं में रोजगार की सुविधा दी है, वहीं दूसरी ओर बड़े ही आराम से तनाव भी परोसा है। दरअसल जिन लोगों की शिफ्टिंग जाब होती है, वे अकसर सोशल लाइफ यानी सामाजिक जिंदगी से दूर रहते हैं। दिन के समय सोते हैं और रात के समय पूरी ऊर्जा के साथ काम करते हैं। कुछ कुछ अंतराल में यह साइकिल उल्टा हो जाता है। नतीजतन न घर को समय दे पाते हैं, न दोस्तों को, न सोसाइटी और न खुद को। ऐसे में तनाव का बढ़ना कोई हैरानी की बात नहीं है।

    शिफ्टिंग जाब
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    खेल कूद की कमी

    कुछ दशकों पहले तक घर के इर्द-गिर्द मौजूद सभी पार्कों में, खासकर छुट्टियों के दिन, युवाओं का ताता लगा रहता था। कहीं कोई फुटबाल खेलता था तो कहीं कोई बालीबाल खेलता था। किसी के हाथ में बल्ला होता था तो किसी पैरों में स्केट्स के पहिये नजर आते थे। कहने की जरूरत नहीं है कि खेल कूद से न सिर्फ हम तंदरुस्त रहते हैं वरन मानसिक तनाव से भी दूर रहते हैं। आज जब खेल-कूद से हमारा रिश्ता न के बराबर हो गया है, ऐसे में तनाव का बढ़ना लाजिमी है।

    खेल कूद की कमी
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    सोशल नेटवर्किंग साइटें

    बेशक सोशल नेटवर्किंग साइटों ने हमारे सामने दोस्तों का भण्डार ला खड़ा किया है। हमें क्या पसंद है, क्या नहीं। सब कुछ बड़ी ही सहजता से सोशल नेटवर्किंग साइटों में शेयर किया जा सकता है। बावजूद इसके आप जानते हैं कि युवाओं में तनाव क्यों बढ़ रहा है? क्योंकि सोशल नेटवर्किंग साइटें एक आभासी दुनिया है। यहां असली कुछ नहीं होता। हर चीज नकली है। सोशल नेटवर्किंग साइटों में बैठते ही हम एक मुखौटा ओढ़ लेते हैं। यही मुखौटा हमें चिड़चिड़ेपन और तनाव से भर देता है। तमाम अध्ययन भी इस बात की तस्दीक करते हैं कि सोशल नेटवर्किंग साइटों के कारण तनाव बढ़ा है।

    सोशल नेटवर्किंग साइटें
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    शौक की कमी

    काम से फुरसत हो तो थोड़ा आराम कर लें। अब जीवन का यही फंडा रह गया है। जबकि शौक या कहें किसी भी वस्तु विशेष में खास रुचि करना हमेशा से हमें सकारात्मक ऊर्जा से भरे रखता है। लेकिन अब ऐसा नहीं होता; क्योंकि अब हमें जितना वक्त मिलता है, उसमें कमाने की कोशिश करते हैं और बचेकुचे समय में आराम की। ऐसे में शौक की जगह हमारे जीवन से नदारद हो चुकी है। ऐसे में भला तनाव न हो तो और क्या हो।

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    शौक की कमी
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