जानें हम क्यों करते हैं नींद में बातें

By:Aditi Singh , Onlymyhealth Editorial Team,Date:Mar 09, 2015

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नींद में अक्सर लोग बातें करने लगते हैं, जिससे ना सिर्फ उनकी नींद अधूरी रह जाती है, कई बार दूसरों को भी परेशानी होती है। नींद में बड़बड़ाना खुद में भले ही कोई बीमारी ना हो लेकिन ये आपके खराब स्वास्थ्य की तरफ इशारा करती है।
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    नींद में करते हैं बातें

    आपको भी नींद में बात करने की बीमारी है? क्या आपका बच्चा नींद में जोर-जोर से चिल्लाने लगता है? कई बार आप किसी से नींद में सवाल-जवाब करते रहते हैं और सुबह उठकर आपको वो सारी बातें याद भी नहीं रहती हैं। कई बार हम नींद में बात करने वालों का मजाक उड़ाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह किसी बीमारी की तरफ इशारा भी करती है। आइए इस स्लाइडशो के जरिए हम आपको इसके कारण और लक्षणों की जानकारी देते हैं।

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    क्‍यों करते हैं नींद में बातें?

    नींद में बोलना, सोते समय किसी बात से बाते करने को कहते है। ये एक प्रकार का पैरासोमनिया कहलाता है जिसका मतलब होता है, सोते समय  अस्वाभाविक व्यवहार का करना। ऐसा होना सामान्य माना जाता है, इसे बीमारी नहीं कहा जाता है। रात में बड़बड़ना किसी तरह का नुकसान नहीं करता है।कई बार वो खुद से ही बात करते है तो कई बार वो सवाल- जवाब करते है।  हां सुनने वाले को ये अजीब या भद्दा लग सकता है। नींद में बात करने वाले एक समय में 30 सेकेंड से ज्यादा नहीं बोलते है। ऐसा हो सकता है कि वो नींद में कई बार बातें करते रहे।
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    कौन करते है नींद में बाते?

    कई तरह के लोग नींद में बाते करते है। 3 से 10 साल के तकरीबन आधे से ज्यादा बच्चें अपनी बातों के नींद में पूरा करते है। वहीं 5 फीसदी बड़े में नींद में बात करते है। कई बार जो बात करते करते वो सो जाते है, उसे ही पूरा करते है। ऐसा कभी-कभी होता है या हर रात भी हो सकता है। 2004 के पोल में पता चला कि हर 10 में से 1 बच्चा सप्ताह में कई बार नींद में बात करता है। ये समस्या लड़कियों और लड़कों में समान होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा अनुवाशिंक भी हो सकता है।
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    नींद में बात करने के लक्षण

    नींद बात कर नींद के किसी भी चरण के दौरान हो सकता है। पहले चरण सोने का शुरूआती चरण होता है। इसमें नींद आने की लगभग वाली स्थिति होती है। इस स्थिति में कोई भी व्‍यक्ति 5 से 10 मिनट तक रहता है और इसके बाद वह नींद के अगले चरण में चला जाता है। दूसरेंचरण में व्‍यक्ति कम से कम 20 मिनट तक रहता है। इस चरण में ब्रेन, काफी सक्रिय होता है। ब्रेन के द्वारा की जाने क्रियाओं को स्लिप स्पिंडल कहा जाता है। तीसरे चरण में व्‍यक्ति गहरी नींद में चला जाता है। इस दौरान ब्रेन ज्‍यादा कार्य नहीं करता है और आराम की स्थिति में शरीर रहता है। इस चरण में आसपास होने वाले शोर आदि का प्रभाव भी सोने वाले व्‍यक्ति पर नहीं पड़ता है। चौथा चरण आरईएम के समान ही होता है। इसमें ब्रेन सक्रिय रहता है। इसमें डेल्‍टा स्‍लीप आती है।

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    नींद में बात करने के कारण

    नींद में बात करने का एक कारण बुरे सपने भी होत है। कई बार हम जिस बारें में सोच रहे होते है वहीं चीजे हमारे सपनों में आने लगती है। हालांकि डॉक्टर्स इस बात की पुष्टि नहीं करते है। नींद में बात करना किसी तरह से हानि नहीं करता है लेकिन ये नींद विकार या स्वास्थ्य की बीमारी के ओर संकेत करते है।  
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    आरईएम स्लीप डिसआर्डर

    सोते हुए चीखने-चिल्लाने या हाथ-पैर चलाने की आदतडिमेंशिया (निद्रारोग) अथवा पार्किंसन जैसी बीमारियों के लक्षण होते हैं। इस बीमारी को ‘आरईएम स्लीप बिहैवियर डिसआर्डर’ कहा जाता है। आरईएम नींद वो नींद है जिस दौरान इंसान सपने देखता है। इस बात के कई अहम सबूत हैं कि आरईएम नींद की ताज़ा यादों को प्रोसेस करने में भूमिका होती है। ऐसे लोग नींद में चीखने-चिल्लाने अथवा हाथ-पैर चलाने की जो हरकत करते हैं वह दरअसल उनकी नींद की गतिविधियां होती हैं।आरईएम के अलावा, दवाओं का रिएक्शन, तनाव,मानसिक स्वास्थ्य समस्या से भी लोग नींद में बात करने लग जाते है।

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    क्या है इसका इलाज

    सामान्य तौर पर, कोई इलाज जरूरी है। अगर आपको आरईएम या नींद में बहुत ज्यादा बात करने की समस्या हो तो आप किसी साइकोथैरेपिस्ट से मिल सकते है। नींद में बात करने का कारण नींद विकार, दुर्बल चिंता या तनाव हो सकता है। कुछ उपायों से नींद में बात करने की संभावना को कम कर लिया जा सकता है। अगर आप किसी के साथ अपना कमरा शेयर करते है तो उसे बोलें कि वो आपकें बड़बड़ाने पर आपको जगा दें, इससे आप ठीक ढंग से सो सकेंगे।   
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    कैसे कम कर सकते है नींद में बड़बड़ना ?

    इस समस्या से निपटने का वैसे तो कोई खास इलाज नहीं होता है। पंरतु तनाव की कमी औऱ योग के द्वारा आप अपना मन शांत कर सकते है। इससे आपको नींद में बोलने की समस्या कम हो जाएगी। इसके अलावा आप स्लीप डायरी बनाए। आप दो सप्ताह का पूरा डिटेल उसमें लिखें, जैसे कितने बजे आप सोने गए, कब सोए, कब उठे, कब बड़बड़ाए, आप कौन सी दवा का सेवन करते है आदि नोट करें। इससे आपको डॉक्टर को समझाने में भी मदद होगी। इसमें आप आपने दोस्त या घर वालों की मदद लें सकते है। साथ सोने जाते समय चाय, कॉफी आदि के सेवन से बचें।
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