लू लगने पर दिखाई देते हैं ये लक्षण

By:Rahul Sharma, Onlymyhealth Editorial Team,Date:Apr 16, 2015

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जब गर्मी की वजह से हाइपोथैलेमस असामान्य ढंग से काम करने लगता है, तो शरीर का तापमान बढ़ने लगता है, जिसे चिकित्सकीय भाषा में सन स्ट्रोक अर्थात लू लगना कहते हैं, इनके लक्षणों को आप आसानी से पहचान सकते हैं।
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    क्या है सन स्ट्रोक या लू

    गर्मी के मौसम में धूप बहुत तेज हो जाती है, इसके साथ गर्म हवाएं चलती हैं, इसके कारण लू लगने की संभावना बढ़ जाती है। दरअसल वातावरण में होने वाले गर्म बदलाव के कारण शरीर में गर्मी प्रवेश कर जाती है, जिसे लू कहा जाता है। तो चलिये विस्तार से जानें कि लू क्या होता है और ये क्यों और कैसे लगती है।
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    क्यों लगती है लू

    दिमाग में हाइपोथैलेमस नामक एक भाग होता है, जो शरीर के तापमान को 95 से 98.6 फारनहाइट के बीच नियंत्रित करता है। लेकिन जब गर्मी की वजह से हाइपोथैलेमस असामान्य ढ़ंग काम करने लगता है, तो शरीर का तापमान बढ़ने लगता है, जिसे चिकित्सकीय भाषा में सन स्ट्रोक (लू लगना) कहा जाता हैं। क्योंकि शरीर का तापमान बढ़ने के कारण गर्मी होती है। डॉक्टर का मानना है कि जब तापमान बढ़ता है, तो शरीर से इसे बाहर निकालना जरूरी हो जाता है। आमतौर पर तो यह गर्मी पसीने के माध्यम से बाहर निकल जाती है। लेकिन जब सन स्ट्रोक होता है, तो यह भीतर ही रुक जाता है, जिसकी वजह से हाइग्रेड फीवर हो जाता है।
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    शरीर पर पड़ता है बुरा प्रभाव

    कई बार सन स्ट्रोक के कारण शरीर के अंगों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। डॉक्टरों के अनुसार, गर्मी की वजह से कुछ लोगों में ब्लड का आरबीसी टूटने लगता है, जिसे हाइपरथर्मिया भी कहा जाता है। कुछ लोगों के रक्त में पोटैशियम की मात्रा बढ़ जाती है, जिसे हाइपरक्लेमिया कहा जाता है। इसकी वजह से हृदय की रिदम बिगड़ जाती है।
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    लू लगने के लक्षण

    लू लगने पर खुश्की, सिरदर्द, कमजोरी, शरीर टूटना, बार-बार मुंह सूखना, उल्टी आना, चक्कर, तेज बुखार, सांस लेने में दिक्कत, दस्त और कई बार तो निढाल या बेहोशी जैसे लक्षण भी होते हैं। लू लगने पर पसीना नहीं आता। इसमें हाथ-पैर और आंखों में जलन होती है, शरीर में पानी की मात्रा कम हो जाती है। गर्मी के कारण ब्लडप्रेशर लो हो जाता है। इसके लक्षणों को हम तीन अवस्था में बांट सकते हैं।
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    लू लगने के बाद की तीन अवस्थाएं

    लू लगने पर पहली अवस्था में पसीने के कारण त्वचा बहुत ज्यादा ठंडी हो जाती है। रोगी को बेहोशी, थकावट और कमजोरी होती है और नाड़ी की गति तेज हो जाती है। इस अवस्था में रोगी की मृत्यु नहीं होती है और उचित उपचार से उसे आराम मिल जाता है। दूसरी अवस्था में सिर में भयंकर दर्द, त्वचा में रुखापन और सांस की गति धीमी हो जाती है और रोगी बेहोशी का भी शिकार हो सकता है। वहीं तीसरी अवस्था में बुखार के साथ सांस की गति बहुत तेज हो जाती है और रोगी के शरीर का रंग नीला पड़ने लगता है। वह बेहोश हो जाता है और ये बेहद घातक अवस्था होती है।
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    नज़रअंदाज न करें ये संकेत

    लू लगने के बाद शरीर में गर्मी, खुश्की और थकावट हो जाती है, शरीर टूटने लगता है और शरीर का तापमान एकदम से बढ़ जाता है। अक्सर बुखार बहुत ज्यादा मसलन 105 या 106 डिग्री फैहरनहाइट तक पहुंच जाता है। यह इमरजेंसी की अवस्था होती है, जिसमें ब्लडप्रेशर लो हो जाता है और लिवर-किडनी में सोडियम पोटैशियम का संतुलन बिगड़ जाता है। ऐसे में बेहोशी आती है व लो बीपी, ब्रेन या हार्ट स्ट्रोक की स्थिति भी बन सकती है। ठीक समय पर  इलाज न मिल पाए तो मौत भी हो सकती है।
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    सन स्ट्रोक का फर्स्ट एड

    डिहाइड्रेशन की हालत में रोगी को नीबू पानी, ओआरएस या ग्लूकोज आदि थोड़े-थोड़े समय पर पिलाते रहना चाहिये। बार-बार उल्टी व दस्त की वजह से शरीर में हुई पानी और नमक की कमी को यह घोल पूरा करता रहता है। यह घोल शरीर के लिए जरूरी केमिकल सोडियम और पोटैशियम की कमी को को भी तुरंत पूरा करता है। तत्काल सहायता न मिलने पर किडनी और ब्रेन पर बुरा असर हो सकता है।
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    ये भी करें

    यदि लू लगने पर बुखार 104 डिग्री से अधिक है तो रेक्टल (गुदा से) टेंपरेचर लें। इसके लिए अलग प्रकार के थर्मोमीटर आते हैं। इससे शरीर के अंदरूनी तापमान की सही जानकारी मिल पाती है। लू लगने पर अक्सर बाहर के तापमान से ज्यादा होता है अंदरूनी तापमान। लगातार तरल और ठंडी चीजें जैसे  नीबू पानी, नारियल पानी, सत्तू का घोल, बेल का शर्बत, आम पना, राई का पानी आदि देते रहें। शरीर में पानी की कमी न होने दें और ठंडी चीजें खिलाकर अंदरूनी तापमान को कम करने का प्रयास करें।
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