बचपन के खेलों ने हमें सिखाया जीवन से जुड़े ये महत्‍वपूर्ण पाठ

By:Pooja Sinha, Onlymyhealth Editorial Team,Date:Feb 03, 2016

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वक्‍त के साथ बहुत कुछ बदल गया है, यहां तक कि बचपन और बचपन के खेल भी। आइए याद करते हैं ऐसे ही कुछ खेल और उसे मिलने वाली सीख को जब बचपन का मतलब कुछ अलग हुआ करता था।
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    बचपन के खेलों से मिली सीख

    वक्‍त के साथ बहुत कुछ बदल गया है, यहां तक कि बचपन और बचपन के खेल भी। दिन-भर की धमाचौकडी, तरह तरह के खेल और छोटी-मोटी तकरारें अब बच्चों के बीच कहां देखने को मिलती हैं। आजकल के बच्‍चे अब तरह-तरह के एप्प के साथ खेलते नजर आते हैं। सही मायने में अब बचपन की पूरी तस्वीर ही बदल गई है। एक समय था जब “अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बो, अस्सी नब्बे पुरे सौ, सौ में लगा धागा, चोर निकल के भागा”, “पौशम्म पा भाई पौशम्म पा”, ”टिपि टिपि टैप विच कलर यूं वॉट” और “धप्‍पा“ जैसे शब्दों के बिना हमारे सारे खेल अधूरे हुआ करते थे। यह सिर्फ खेल ही नहीं थे बल्कि इनसे हमें जिंदगी के कई सबक भी सीखने को मिलते हैं। आइए याद करते हैं ऐसे ही कुछ खेलों को जब बचपन का मतलब कुछ अलग हुआ करता था और उनसे मिलने वाले जिंदगी के सबक के बारे में।

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    प्रभावी टीमवर्क : पिट्ठू

    याद है वो खेल, जहां घरों से मार्बल के टूटे टुकड़े चुरा कर मस्‍ती हुआ करती थी। 8-10 मार्बल के छोटे-छोटे टुकड़ों को एक के ऊपर एक रखा जाता था और दो टीम बन जाती थी। टीम द्वारा बॉल से उस ढेर को निशाना बनाकर तोडना होता था! एक टीम बॉल पकड़ने भागती और दूसरी टीम का काम होता बॉल पकड़ में आने से पहले फिर से ढेरी को तैयार करना! कुछ याद आया? यह खेल से हमारा  
    कंसंट्रेशन और फोकस बढ़ता है और टीमवर्क की समझ बनती है।
    Image Source : staticflickr.com

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    संतुलनकारी कार्य : कंचे

    रंग-बिरंगे कंचों को अंधेरे में देखने का तो मजा ही कुछ और था! कंचा खेल में बच्चे कंचे से दूसरे के कंचे को अंगुली से निशाना लगाकर दूर फेंकते तथा अपने कंचे को बने छेद तक पहुंचाते। इस खेल से एकाग्रता बढ़ती थी।
    Image Source : blogspot.com

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    मुश्किलों से जूझना : लंगड़ी टांगी

    इसे खेल को भला कौन भुला सकता है? किसी भी पार्क में या खाली प्लॉट में इस खेल को खेल लिया जाता थ! एक टांग पर कूदते हुए दूसरी टीम के लोगों को आउट करना हालांकि सुनने में आसान लगता है लेकिन मुश्किल था यार! कितनी बार गिराते हैं याद नहीं, लेकिन उस चोट में भी मज़ा था! लंगड़ी टांग से हमने एक पैर से कूदना सीखा, जैसे अब जिन्दगी सिखाती है मुश्किलों से जूझना।
    Image Source : mh-31.com

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    सही लक्ष्य : स्टापू और रस्‍सी कूदना

    रस्सी कूदना खेल लड़कियां खेला करती थीं, जिसमें रस्सी को गोलाकार बनाकर उछाला जाता है। इस खेल को छोटी सी जगह में ही खेला जा सकता था। इससे शरीर में स्टेमना की बढ़ोतरी होती है। जबकि आज इस खेल का प्रयोग खिलाड़ी ही करते देखे जा सकते हैं। स्टापु भी लड़कियों का प्रिय खेल था, खेल तो यह लड़कियों का था लेकिन लड़के भी इसमें मजा लेते थे! इसमें आंगन या साफ जगह पर लड़कियां चार से छह आयाताकार खाने बनाकर छोटे से पत्थर एवं स्लेट के टुकड़े से खेलती थीं। इस छोटे से टुकड़े को खानों में फेंककर एक टांग से उछलकर सभी खानों में घूमकर बाहर निकला जाता है। यह खेल शरीर को स्वस्थ रखने के साथ मजबूती भी देता था। साथ ही यह एकाग्रता और सटीकता का पाठ पढ़ाता था।  
    Image Source : sportskeeda.com

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    जिंदगी की सीख : पोषम-पा

    "पोषम-पा भाई पोषम-पा साथियो ने क्या किया, सौ रुपये की घड़ी चुराई।" इस पंक्ति से कुछ यादें ताजा हुई अपने बचपन की! इस खेल में दो बच्चे एक दूसरे से हाथ मिलाकर खेल खेलते थे और एक बच्चा उनके बीच से निकलता था। पोषम-पा से सीखा हमने कभी ना करना भूल, क्योंकि जिन्दगी में सिर्फ फूल नहीं बल्कि कांटे भी हैं।
    Image Source : hindustanmerijaan.in

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