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मनोवैज्ञानिकों की मानें तो व्‍यर्थ है मिडलाइफ क्राइसिस की चिंता

By:Aditi Singh , Onlymyhealth Editorial Team,Date:Jul 24, 2015
क्या आपको भी लगता है कि युवावस्था आपके हाथ से फिसली जा रही है।जीवन मे कुछ नया नहीं है। अगर आप ऐसी समस्यायों से गुजर रहे है तो ये स्लाइडशो पढें। हम आपको मिडलाइफ क्राइसेस से डील करने के कुछ तरीके बता रहे है।
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    मिडलाइफ क्राइसिस शब्द की उत्पत्ति

    मिडलाइफ क्राइसिस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम इलियट जैक्स ने 1965 में किया। वास्तव में चालीस की उम्र को जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ माना गया है। यहां पहुंचकर व्यक्ति को झटका सा लगता है। ऐसा होने का एक कारण इस समय में अचानक माता-पिता की मृत्यु होना या दुख का कोई अन्य कारण जैसे बेरोजगारी या रोजगार में संतोष की कमी भी हो सकती है।
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    मिडलाइफ क्राइसिस शब्द  की उत्पत्ति
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    कब होती है ऐसी अवस्था

    आम तौर पर पुरुष में इसकी शुरूआत 42-43 वर्ष में होती है जबकि महिलाओं में यह 44-45 के बाद आती है। औरतों में यह बहुत जल्दी खत्म भी हो जाती है लेकिन पुरूषों में देर तक बनी रहती है। पुरूषों के भीतर अचानक वही भाव जाग जाता है जो किशोरावस्था में हुआ करता है।  इसकी एक वजह तो हार्मोनल बदलाव है।
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    कब होती है ऐसी अवस्था
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    मिड लाइफ क्राइसिस

    40 की उम्र के आसपास का दौर उम्र का वह पड़ाव है, जब कई बार इंसान को जीवन में खालीपन का अहसास होता है। इसे मिड लाइफ क्राइसिस कहा जाता है। लेकिन आपका जीवन कब परेशानियों से भरा नहीं था? आपका बचपन, किशोरावस्था, रोजगार ढूंढने का दौर – सब कुछ परेशानी ही तो था और अब आपका मिड लाइफ भी। यहां तक कि मीनोपॉज, बुढ़ापा और मृत्यु भी मुसीबत ही होंगे। ऐसे में जरा सोचिए, कब आपके जीवन में परेशानी नहीं है?
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    मिड लाइफ क्राइसिस
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    क्यो महसूस होती है मिडलाइफ क्राइसेस

    अधेड़ अवस्था में, यानी उम्र के इस पड़ाव पर जो भी परेशानी आपको महसूस हो रही है, क्योंकि युवावस्था की ऊर्जा अब जा रही है।लेकिन अब आपकी ऊर्जा कम होने लगी है, इसीलिए आपको लगता है कि यह परेशानी का दौर है। शोध और मनोवैज्ञानिको की माने तो मिडलाइफ क्राइसेस जैसा कुछ होता ही नहीं है। मनोवैज्ञानिको के अनुसार लोगों को लगता है कि मिड लाइफ तो बहुत संतुलित होनी चाहिए थी। युवावस्था की मुसीबतें बीत चुकी हैं और बुढ़ापे की मुसीबतें अभी आनी बाकी हैं। जिंदगी के फलफसे यहां खत्म नहीं शुरू होते है।
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    क्यो महसूस होती है मिडलाइफ क्राइसेस
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    इसके लक्षण

    मिड लाइफ क्राइसिस के कई लक्षण बताए गए हैं। जैसे फेसबुक पर पुराने लोगों को ढूंढना, अपने से 20 साल छोटी लड़कियों से फ्लर्ट करना,चिंता होना कि कहीं जवान लोग उनकी नौकरी छीन ना लें। बचपन को तरसते हुए याद करना, दोस्तों की तरक्की से खुश न होना, अचानक संगीत से जुड़ी चीजों की चाहत, झड़ते हुए बालों की चिंता 8. लोगों से उम्र छुपाना। यह साबित करने की कोशिश में रहना कि वे किसी से कम नहीं हैं।
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    इसके लक्षण
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    मुसीबत नहीं बदलाव

    जीवन में सिर्फ परिस्थितियां होती हैं। जीवन में बदलाव होता ही रहेगा। आप चालीस साल के हैं और अब भी आप उसी तरह जीना चाहते हैं, जैसे आप अठारह साल की उम्र में जीते थे। तब तो आपको चालीस की उम्र समस्या लगेगी ही। समस्या जैसी कोई चीज नहीं है। मिड लाइफ क्राइसिस का मतलब केवल यह है कि मेरा जीवन रूक गया है। सब कुछ वैसा का वैसा ही है। ‘सब कुछ वैसा ही है’ यह सोच आपके दिमाग की उपज है। जबकि गौर करें तो हर दिन, हर पल जीवन में बदलाव हो रहे हैं। आपके शरीर, दिमाग व हर चीज में बदलाव हो रहे हैं।
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    मुसीबत नहीं बदलाव
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    बदलावों को समझे

    अगर आप अपने आस-पास की हर चीज को देखें, अपने इर्द गिर्द की घटनाओं पर नजर दौड़ाएं, तो आप समझ जाएंगे कि जीवन बदलाव की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। यहां कुछ भी स्थायी नहीं है। बाहर और अंदर हर चीज बदलाव की निरंतर प्रक्रिया से गुजर रही है। अगर आप ये बात नहीं समझते, तो आप अपने लिए एक के बाद एक मुसीबत पैदा करते जाएंगे। अगर आपने यह समझ लिया कि ये मुसीबत आप खुद ही गढ़ रहे हैं, तो आपको इन्हें रोकने की जरूरत नहीं पड़ेगी, ये अपने आप ही गायब हो जाएंगी।
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    बदलावों को समझे
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    बदलाव को स्वीकार करें

    जिसे आप मुसीबत कहते हैं, वह एक तरह का बदलाव है। आपको इस बदलाव को स्वीकार करना और उसके साथ रहना नहीं आता। इसीलिए आप उसे मुसीबत कह रहे हैं। इस पल आप सांस लेते हैं, तो दूसरे ही पल उसे छोड़ते हैं। यह परिवर्तन ही तो है। जब आप बदलाव का विरोध करते हैं, तो दरअसल आप जीवन की मौलिक प्रक्रिया का विरोध कर रहे होते हैं। ऐसा करने से आप तमाम तरह की परेशानियों को न्योता देते हैं।
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    बदलाव को स्वीकार करें
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