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ये परिस्थितियां बताती हैं कि दिल नहीं दिमाग की सुनना है जरूरी

By:Rahul Sharma, Onlymyhealth Editorial Team,Date:Jan 28, 2016
दिमाग के हिसाब से बात करने के कई बड़े फायदे हैं। अगर आप इस बात से सहमत नहीं हैं तो चलिये इन नियमों से जानें कि क्यों दिल नहीं, दिमाग की सुनना जरूरी है।
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    दिल की नहीं दिमाग़ की सुनें

    दिल सही कहता है, या दिमाग़, दिमाग़ के अनुसार बातें करें या दिल के हिसाब से... ये एक बड़ी बहस का मुद्दा हो सकता है। क्योंकि परिस्थियां परिवर्तनशील होती हैं, और हर परिस्थिति के लिये ने गुर और फैंसलों की जरूरत होती है। खैर, जो भी हो, दिमाग के हिसाब से बात करने के कई बड़े फायदे हैं। अगर आप इस बात से सहमत नहीं हैं तो चलिये इन नियमों से जानें कि क्यों दिल नहीं, दिमाग की सुनना जरूरी है -
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    दिल की नहीं दिमाग़ की सुनें
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    शुरुआत में कहना ही भला

    अगर आपकी/आपका रूममेट रोज़ खाना खा कर बर्तनों को यूं ही गंदा छोड़ देता है, तो बजाए चिढ़ते हुए रोज़ाना इन बर्तनों को खुद साफ करने के अगर आप उसे विनम्रता के साथ पहले या दूसरे ही दिन इसके लिये टोक दें, तो ये कफी बेहतर होगा। दिल के खुद से बर्तन साफ करते रहने, और बुरा ना बनने के फैंसले से दिमाग का सही समय पर टोक देने वाला फैंसला कहीं बेहतर है। क्योंकि दिल के फैंसले से भी धीरे-धीरे मन में पैदा होने वाली कुंठा आगे चलकर कभी गंभीर लड़ाई का करण बन सकती है।
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    शुरुआत में कहना ही भला
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    साफ कहना सुखी रहना


    किसी सार्वजनिक स्थान या रेस्तरां आदि में, यदि आप पास बैठे व्यक्ति की सिगरेट से परेशान हो रहे हैं, तो अपने दिमाग के कहे अनुसार खड़े होकर उस इंसान को प्यार से बता दें कि उनका स्मोकिंग करना आप दोनों के लिये ही हानिकारक है।
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    साफ कहना सुखी रहना
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    तनाव और गुस्सा निकालने पर


    अगर आपका साथी अपने काम के तनाव का गुस्सा और झुंझलाहट किसी ना किसी बहाने से आपके ऊपर निकल रहा है, तो दिमाग की सुनते हुए शांत तरीके से यह कह देना कि आप ऐसा और नहीं चाहते हैं, सबसे बेहतर उपाय होता है।
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    तनाव और गुस्सा निकालने पर
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    कुछ मौकों पर सच बोलें


    अगर आपकी गर्लफ्रैंड किसी ड्रेस में मोटी लग रही है और वो आपसे पूछती है कि आपको वो कैसी लग रही है, तो सच बता दें, लेकिन थोड़ी सहजता और विनम्रता के साथ। क्योंकि एक न एक दिन आपके मुंह से सच निकल ही जाएगा। तो बेहतर है कि आप दिल की बात सुनें और उसके हिसाब से काम करें। लेकिन आप अपनी बात को किस तरह से कहते हैं, ये बेहद महत्वपूर्ण होता है, इसका विशेष ध्यान रखें।   
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    कुछ मौकों पर सच बोलें
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