कंधे की चार आम समस्याएं और उनका उपचार

By:Shabnam Khan , Onlymyhealth Editorial Team,Date:Dec 05, 2014

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दिन भर ऑफिस में कंप्यूटर पर काम करना, शारीरिक मेहनत में कमी, उठने-बैठने का गलत तरीका, एक मुद्रा में देर तक काम करना या गलत ढंग से व्यायाम करना कुछ ऐसे कारण हैं, जिनसे कंधे के दर्द की समस्याएं पैदा हो जाती हैं। कंधे के दर्द का सही इलाज तभी संभव है अगर हम इसके सही कारणों को समझ सकें। इसके इलाज के लिए एक्सरसाइज से लेकर सर्जरी तक की जरूरत पड़ सकती है।
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    बढ़ रही है लोगों में कंधे के दर्द की समस्या

    आजकल की व्यस्त जीवनशैली में कंधे का दर्द एक आम समस्या बनता जा रहा है। युवाओं से लेकर बुजुर्ग तक इस समस्या से पीड़ित नजर आते हैं। इस संबंध में अमेरिकी जनगणना ब्यूरो के इंटरनेशनल डाटा बेस के 2004 के डाटा संग्रह के अनुसार भारत में कंधे के दर्द की घटनाएं लगभग 68 प्रतिशत लोगों में देखी जाती हैं। कंधे के दर्द के बहुत से कारण हो सकते हैं। गलत मुद्रा में बैठने से लेकर हड्डियों की कमजोरी तक, किसी भी वजह से आपको कंधे का दर्द हो सकता है। इसके अलावा मांसपेशियों का कंधे की हड्डियों के बीच में फंसना भी कंधे की एक अन्य समस्या है। ये दर्द हल्के से लेकर असहनीय तक हो सकता है। कंधे के दर्द का सही इलाज तभी संभव है अगर हम इसके सही कारणों को समझ सकें। तो आइये जानते हैं कंधे की चार आम समस्याओं और उनके उपचार के बारे में।

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    परिआर्थिराइटिस शोल्डर

    कंधा एक बॉल और सॉकेट जॉइंट होता है, जिसमें संबंधित स्थिरता के साथ उत्कृष्ट गतिशीलता भी होती है। कंधे के जोड़ पर एक कवर की तरह होता है जिसे कैप्सूल कहते हैं। इस कैप्सूल में कंधे की बॉल के हिलने व गति करने के लिए काफी जगह होती है। जिसकी वजह से वो बॉल सॉकेट के आसपास क्रियाशील रहती है। कंधे के परिआर्थिराइटिस की स्थिति में ये कवर सिकुड़ने लगता है। इसकी वजह से बॉल हिलने में दिक्कत महसूस करती है और प्रभावित व्यक्ति को कंधा हिलाने-डुलाने में दर्द होता है। ये समस्या डायबिटीज के मरीजों में अधिक होती है। उनका शुगर का स्तर बढ़ते कंधे के कवरिंग कैप्सूल में जकड़न शुरू हो जाती है।

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    परिआर्थिराइटिस शोल्डर का उपचार

    अगर आप डायबिटीज के मरीज हैं, और आपको कंधों के आसपास जकड़न के साथ दर्द भी महसूस हो रहा है तो देर न करें। जल्द से जल्द स्पेशलिस्ट की सलाह लें। इस समस्या से पूरी तरह रिकवर होने में एक साल तक का समय लग जाता है। इसका शुरुआती उपचार नियमित रूप से एक्सरसाइज होता है। सिर्फ कुछ खास मामलों में सर्जरी की जरूरत पड़ती है। हाल के कुछ वर्षों में चिकित्सा पद्धति इतनी उन्नत हुई है कि एक छोटा सा छेद करके कंधे की ये सर्जरी मुमकिन है।

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    रोटेटर कफ टियर

    हमारा कंधा तीन हड्डियों से बना है। ऊपरी बांह की हड्डी, कंधे की हड्डी और हंसली। ऊपरी बांह की हड्डी का शीर्ष कंधे के ब्लेड के एक गोल सॉकेट में फिट रहता है। यह सॉकेट ग्लेनोइड कहलाता है। मांसपेशियों और टेंडन्स का संयोजन बांह की हड्डी को कंधे के सॉकेट में केंद्रित रखता है। ये ऊतक रोटेटर कफ कहलाते हैं। वैसे तो कंधा खेल गतिविधियों और शारीरिक श्रम के दौरान आसानी से घायल हो जाता है, लेकिन ज्यादातर कंधे की समस्याओं का प्राथमिक स्त्रोत रोटेटर कफ में पाये जाने वाले आसपास के कोमल ऊतक का उम्र के कारण प्राकृतिक रूप से बिगड़ना है। रोटेटर कफ में तकलीफ की स्थिति 60 वर्ष से अधिक उम्र वालों में ज्यादा देखी जाती है। कंधे के अत्यधिक प्रयोग से उम्र की वजह से होने वाली गिरावट में तेजी आ सकती है।

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    रोटेटर कफ टियर का उपचार

    चास साल की उम्र के करीब  50 प्रतिशत लोगों के कंधे के एमआरआई स्कैन पर रोटेटर कफ के डिजनरेशन के प्रमाण देखे गए हैं। उम्र बढ़ने के साथ तकलीफ बढ़ती जाती है। इसका उपचार रोग की स्थिति पर निर्भर करता है। यदि इस रोग की शुरुआत है तो कंधे को आराम देने, हीट और कोल्ड थेरेपी, फिजियोथेरेपी, स्टेरॉयड के इंजेक्शन आदि से इलाज किया जाता है। यदि रोग बढ़ जाता है तो रोटेटर कफ को ठीक करने के लिए ऑर्थोस्कोपिक आदि की आवश्यकता पड़ती है। यह समस्या लम्बे समय तक रहती है तो अर्थराइटिस यानी गठिया का रूप भी ले सकती है।

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    कंधे का बार-बार अस्थिर होना

    ये समस्या युवा मरीजों के साथ अधिक होती है। उन्हें ऐसा महसूस होता है कि उनका कंधा बाहर की तरफ निकल कर आ रहा है। ये समस्या बहुत अधिक कष्टदायी होती है। इस समस्या को रीकरेंट इनस्टेब्लिटी ऑफ शोल्डर कहा जाता है। यानी, कंधे का बार-बार अस्थिर होना। कंधे के जोड़ में, सॉकेट लेबरम जैसे ऊतक बंपर की उपस्थिति के कारण बढ़ जाता है। किसी ऐसी चोट से जिसमें मरीज की कंधे वाली बॉल सॉकेट से बाहर आ जाती है, लेबरम क्षतिग्रस्त हो जाता है। इस ऊतक का यदि उपचार न किया जाए तो कंधे में बार-बार कुछ अटकने जैसी स्थिति महसूस होती रहती है।

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    कंधे की अस्थिरता का उपचार

    इस समस्या से जूझ रहे मरीज खेल और अन्य शारीरिक गतिविधियों से डरने लगते हैं। उन्हें महसूस होता है कि ऐसा करने से कंधा बाहर आ सकता है। कंधे की हड्डी खिसक जाने से तकरीबन 90 प्रतिशत युवा मरीजों को इस समस्या का खतरा होता है। हालिया अध्ययनों से ये बात सामने आई है कि कीहोल सर्जरी से इस समस्या का समाधान हो सकता है। इसके जरिये पहली बार कंधा खिसकने पर लेबरम ऊतक की मरम्मत कर दी जाची है, जिससे कि आगे की समस्या से छुटकारा मिल जाता है। कीहोल सर्जरी में ओपन सर्जरी की तरह निशान व जकड़न की समस्या नहीं होती। और, कीलहोल सर्जरी में जल्दी रिकवरी हो जाती है।

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    स्कैपुला थोरेसिस बर्सिटिस

    कुछ लोगों को रीढ़ और पीठ की हड्डी के जोड़ पर दर्द महसूस होने लगता है। ये दर्द शुरुआत में हल्का होता है लेकिन वक्त के साथ साथ बढ़ता रहता है। इसका कारण होता है कि इस जोड़ यानी जॉइन्ट के ऊतकों में सूजन आ जाती है। इस स्थिति को स्कैपुला थोरेसिस बर्सिटिस (Scapula thoracic bursitis) कहा जाता है। ये समस्या एक खास तरह की मुद्रा में रहने से विकसित होती है। आमतौर पर आईटी प्रोफेशन के लोगों में ये समस्या ज्यादा होती है।

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    स्कैपुला थोरेसिस बर्सिटिस का उपचार

    इस समस्या के उपचार में सबसे पहले मरीज की काम करने के दौरान की मुद्रा को सुधारा जाता है। पीठ की मांसपेशियों को बेहतर तरह से नियंत्रित करने के लिए फिजियोथेरेपी की सलाह दी जाती है। लेकिन अगर इन उपायों से राहत न मिले, और समस्या काफी बढ़ चुकी हो तो कीहोल या फिर ओपन सर्जरी करके बर्सल ऊतकों को निकाल दिया जाता है। इससे रोगी स्थायी राहत महसूस करते हैं। इसके समेत कंधे की अन्य समस्याओं को अगर जल्दी पहचान लिया जाए तो उनका उपचार भी जल्दी ही पूरा हो सकता है।

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