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युवाओं और सोशल मीडिया से जुड़े मिथ

By:Anubha Tripathi, Onlymyhealth Editorial Team,Date:Aug 08, 2014
युवाओं के सोशल मीडिया पर सक्रिय होने से कई प्रकार के मिथ पैदा होते हैं। इन मिथ के कारण अभिभावकों के मन में भी उनकी सुरक्षा को लेकर काफी शंकाएं रहती है। आइए जानें युवाओं और सोशल मीडिया से जुड़े मिथ के बारे में।
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    किशोर और सोशल मीडिया

    किशोरों के सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना उनके अभिभावकों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। उन्हें लगता है कि उनका बच्चा कम उम्र में भी सोशल मीडिया का आदी होता जा रहा है जिससे वो सामाज से अलग होता जा रहा है। इसके अलावा उसकी सुरक्षा के भी सवाल उनके मन में उठते रहते हैं। लेकिन यह सवाल कितने सही है। आइए जानते हैं सोशल मीडिया और युवाओं से जुड़े मिथ के बारे में।

    किशोर और सोशल मीडिया
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    यह मुश्किल है

    अकसर बड़े लोगों को यह समझ नहीं आता कि बच्‍चे सोशल मीडिया पर इतना वक्‍त कैसे बिता लेते हैं। उन्‍हें यह समझ नहीं आता कि आखिर वे पूरा-पूरा दिन उस पर क्‍या करते रहते हैं। डेना बॉयड की नयी किताब में इसे 'काम्‍प्‍लीके‍टेड' यानी दुविधापूर्ण बताया गया है। सोशल लाइव्‍स ऑफ टीन नाम की इस किताब में किशोरों और तकनीक के साथ उनके संबंधों से जुड़े कई मिथों को ध्‍वस्‍त किया गया है। ये मिथ काफी प्रचलित हैं। मीडिया और बड़े लोग भी इन पर अकसर चर्चा करते हैं।

    यह मुश्किल है
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    मिथ- सामाजिक अलगाव पैदा करता है तकनीक

    ज्यादातर अभिभावकों की यह शिकायत होती है कि उनका बच्चा बाहर जाकर लोगों से मिलने-जुलने की बजाय दिन भर लैपटॉप और मोबाइल के जरिए सोशल मीडिया पर सक्रिय रहता है। उनका मानना है कि यह उनके बच्चों को समाज से अलग कर रहा है। लेकिन यह मात्र एक मिथ है। किशोर सोशल मीडिया के जरिए अपने सामाजिक दायरे को बढ़ाते हैं। इस तरह वो उनसे तो बात करते ही हैं जिनको वो जानते हैं लेकिन जो अनजान है उनसे भी उनकी दोस्ती हो जाती है।

    मिथ- सामाजिक अलगाव पैदा करता है तकनीक
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    मिथ- तकनीक और सोशल मीडिया के आदी

    हमारी आदत है कि जब हम लोगों को किसी खास काम का मजा लेते या उस काम में व्यस्त देखते हैं तो उसे उस काम का आदी कह देते हैं। अभिभावक बच्चों को दिन भर तकनीक से जुड़े रहने को एक लत से कम नहीं मानते हैं। वो अपने किशोर बच्चों को बाहर जाकर खेलने या अन्य शारीरिक गतिविधि में भाग लेने को कहते हैं। युवाओं के लिए यह सिर्फ तकनीक नहीं है। उनके लिए यह एक मौका है जिसके जरिए वो अपने दोस्तों से उनकी दुनिया के बारे में जानते हैं। कंप्यूटर मोबाइल की ही एक तरह यंत्र है।

    मिथ- तकनीक और सोशल मीडिया के आदी
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    मिथ- निजता का खयाल

    व्‍यस्‍कों को लगता है किशोर अकसर उन जानकारियों को भी सोशल मीडिया पर डाल देते हैं, जिन्‍हें निजी रखा जाना चाहिये। लेकिन, नौजवानों की नजर में वे सोशल मीडिया का इस्‍तेमाल अपनी निजता को बरकरार रखने के लिए ही करते हैं। अभिभावकों को जहां अनजान लोगों की सवाल पूछती आंखों की फिक्र होती है वहीं किशोर भी इन बातों को माता-पिता की उत्‍सुक आंखों से दूर रखना चा‍हते हैं। 2012 में बॉयड ने अपनी किताब लिखने के दौरान किशोरों से पूछा कि आखिर उन्‍होंने फेसबुक के मुकाबले, टि्वटर, टम्‍बल्‍र और इंस्‍टागाम को क्‍यों तरजीह देते हैं, तो उनका जवाब था क्‍योंकि मेरे माता-पिता को इनके बारे में ज्‍यादा जानकारी नहीं है।

    मिथ- निजता का खयाल
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    मिथ-सोशल मीडिया से यौन उत्‍पीड़न का खतरा

    बॉयड और उनके साथियों ने एक देशव्‍यापी सर्वे किया जिसमें सोशल मीडिया के बारे में माता-पिता का डर निकलकर सामने आया। 93 फीसदी अभिभावकों को इस बात का डर था कि उनके बच्‍चे सोशल मीडिया पर किसी ऐसे अनजान व्‍यक्ति से मिल सकते हैं, जो बाद में उन्‍हें नुकसान पहुंचा सकता है। इन अभिभावकों को अपने बच्‍चों के यौन उत्‍पीड़न का भी खतरा था। उन्‍हें डर था कि ऐसा काम करने वाले लोग उनके बच्‍चों को फंसा सकते हैं। लेकिन वास्‍तविकता यह है कि बच्‍चों का यौन शोषण करने वाले लोग आमतौर पर परिचित ही होते हैं। रिश्‍तेदार, परिवार के सदस्‍य, दोस्‍त, टीचर आदि लोग यौन शोषण में अधिक संलिप्‍त पाया जाता है।

    मिथ-सोशल मीडिया से यौन उत्‍पीड़न का खतरा
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    मिथ-तकनीक पर कोई डरा न दे

    हमें साइबर बुलिंग के कुछ मामले देखने को मिलते हैं। लेकिन, इनकी संख्‍या इतनी ज्‍यादा नहीं जितनी कि इसे लेकर अभिभावकों में डर होता है। ऑनलाइन सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर छेड़छा़ड़, भद्दी भाषा, और नौटंकी आदि तो चलती रहती है, लेकिन बुलिंग यानी दादागिरी तो बहुत ही कम देखने को मिलती है। आमतौर पर किशोरों को स्‍कूल में दादागिरी का सामना ज्‍यादा करना पड़ता है बजाय के ऑनलाइन सोशल नेट‍वर्किंग साइट्स पर।

    मिथ-तकनीक पर कोई डरा न दे
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    मिथ- भरोसे की कमी

    जब कभी माता-पिता अपने बच्‍चों पर किसी तरह की पाबंदी लगाते हैं, तो वे इसे 'बच्‍चों की भलाई' के तौर पर देखते हैं। जब भी वे उनके सामाजिक दायरे को कसने का काम करते हैं, तो इसके पीछे वे 'हमें तुम पर भरोसा नहीं' की बात कहते हैं। किशोर परिपक्‍व नहीं होते, वे गलतियां करते हैं। लेकिन याद रखिये इनसान गलतियों से ही सीखता है। और बच्‍चे गलतियां नहीं करेंगे तो वे सीखेंगे कैसे।

    मिथ- भरोसे की कमी
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