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क्या मोबाइल फोन बन सकता है पुरुषों में नपुंसकता का कारण?

By:Rahul Sharma, Onlymyhealth Editorial Team,Date:Jul 23, 2014
सेल फोन का इस्तेमाल पुरुषों में बांझपन पैदा कर सकता है या नहीं इस पर अभी तक कई शोध हो चुके हैं और अभी भी हो रहे हैं, हालांकि अधिकांश विशेषज्ञों का मानना है कि मोबाइल फोन के अधिक इस्तेमाल से पुरुषों के शुक्राणुओं पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
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    मोबाइल फोन और नपुंसकता

    यह बात की सेल फोन का इस्तेमाल पुरुषों में बांझपन पैदा कर सकता है, सीधे - सीधे स्थापित नहीं हुई है। हालांकि हाल में हुए कुछ शोधों के आधार पर पुरुष बांझपन और सेल फोन के बीच संबंध को लेकर कई रोचक बातें सामने आई हैं। तो चलिये जानें की क्या वाकई मोबाइल फोन बन सकता है पुरुषों में नपुंसकता का कारण.... ?
    Image courtesy: © Getty Images

    मोबाइल फोन और नपुंसकता
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    पुरुष बांझपन की समस्या

    इनफर्टिलिटी विशेषज्ञ डॉ. गौरी अग्रवाल के अनुसार बांझपन की समस्या के लिए मोबाइल फोन और लैपटॉप का ठीक प्रकार से इस्तेमाल न करना भी बड़ा कारण है। शर्ट की जेब में दिल के पास और पैंट की जेब में रखने पर मोबाइल से निकलने वाली रेज खतरनाक साबित होती हैं। यह पुरुषों के शुक्राणुओं पर बुरा प्रभाव डालती हैं और उनकी संख्या और क्षमता में बीस से तीस प्रतिशत तक की कमी कर देती हैं।
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    पुरुष बांझपन की समस्या
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    लेपटॉप और कंप्यूटर और तापमान परिवर्तन

    पुरुषों के बैठने की अवस्‍था और मशीनों के द्वारा निकलने वाली गर्मी पुरुष बांझपन का प्रमुख कारण है। इसलिए बेहतर होगा कि अपनी गोद में रखने की बजाय लैपटॉप का इस्‍तेमाल उसकी सही जगह, अर्थात मेज पर रखकर किया जाए। एक परीक्षण में पाया गया कि एक घंटे तक अपनी गोद में कंप्यूटर रखकर काम करने से अंडकोष का तापमान काफी बढ़ जाता है। इससे अनुर्वरता (बांझपन) का खतरा हो जाता है।
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    लेपटॉप और कंप्यूटर और तापमान परिवर्तन
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    मोबाइल फोन और पुरुष बांझपन पर शोध

    एक्सेटर विश्वविद्यालय की ओर से किए गए अध्ययन में पाया गया था कि जेब में मोबाइल फोन रखने से शुक्राणुओं की संख्या और उनकी गति प्रभावित होती है। एनवायरमेंट इंटरनेशनल जर्नल में प्रकाशित हुए इस अध्ययन में कहा गया कि विद्युतचुंबकीय (इलेक्ट्रोमैग्नेटिक) विकिरण को शुक्राणुओं की संख्या कम होने के लिए उत्तरदायी माना जाना चाहिए।
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     मोबाइल फोन और पुरुष बांझपन पर शोध
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    इस पर भी हैं दो राय

    शोधकर्ताओं का मामना है कि मोबाइल फोन से शुक्राणु की संख्या पर खतरे को जानने के लिए अभी और अध्ययन किये जाने की आवश्यकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके प्रमाण अब भी अपूर्ण हैं और उनका फोन अब भी उनकी जेब में ही रहता है। उन्होंने प्रमाण की गुणवत्ता के संबंध में अन्य वैज्ञानिकों की आलोचना को स्वीकार किया और "साफ तौर पर और अधिक शोध किए जाने" की बात कही है।
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    इस पर भी हैं दो राय
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    क्या है समाधान

    एक्सेटर यूनिवर्सिटी की ओर से किए गए तथ्यों के अध्ययन में प्रमुख रिसर्चर डॉ. फियोना मैथ्यूज इस संदर्भ में बताते हैं कि आम आदमी को इस संबंध में घबराने की ज़रूरत नहीं है। यदि आपको अपनी प्रजनन शक्ति को लेकर संभावित दिक्कत के बारे में जानकारी है तो आप इसे एक और ध्यान देने लायक मुद्दा मान सकते हैं। जैसे आप अपने आहार में बदलाव करते हैं उसी प्रकार फोन रखने की जगह बदलने के बारे में भी सोच सकते हैं।
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    क्या है समाधान
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    हंगरी में हुआ शोध

    हंगरी के सेज्ड विश्वविद्यालय के महिला चिकित्सा विभाग की डा. एमरी फेजेस और उनके साथी डॉक्टरों की टीम ने मानव शरीर पर मोबाइल के प्रभावों का पता लगाने के लिए एक शोध किया था। हंगरी के इन डॉक्टरों ने शोध में 13 महीने तक 221 मोबाइल का अधिक इस्तेमाल करने वाले पुरुषों का अध्ययन किया तथा उनके शुक्राणुओं की तुलना ऐसे लोगों से की जो मोबाइल का कम इस्तेमाल करते थे। अध्ययन में पाया गया कि लंबे समय तक मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने वाले पुरुषों की प्रजनन क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव हो सकता है। हालांकि डा. फेजेस का मानना था कि अध्ययन के इन परिणामों की पुष्टि की अभी जरूरत है।
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    हंगरी में हुआ शोध
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    फ्रांस में हुआ अध्ययन

    दिसंबर, 2012 में फ्रांस में बड़े ग्लोबल अध्ययन में पाया गया था कि उस समय पुरुष शुक्राणुओं की औसत संख्या में 32 फीसदी की गिरावट हुई। इस खबर से चिकित्सा जगत में हड़कंप मच गया था। भारत में भी कई वैज्ञानिक साक्ष्य इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि इनकार और चुप्पी की संस्कृति ने भारतीय पुरुषों के वीर्य के पतन को बढ़ावा दिया है।
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    फ्रांस में हुआ अध्ययन
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    मेल फर्टिलिटी पर भारत में हुए अध्ययन

    इस विषय में भारत में पहला अध्ययन 7,700 पुरुषों पर मणिपाल के कस्तूरबा अस्पताल में वर्ष 2008 में किया गया था, जिसमें पुरुषों का वीर्य खराब क्वालिटी का पाया गया। वहीं दिल्ली के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के एक शोध से पता चला कि तीन दशक के दौरान प्रति मिलीलीटर वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या छह करोड़ से घटकर दो करोड़ रह गई है। लखनऊ के सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट में मौजूद 19,734 स्वस्थ पुरुषों के वीर्य पर किए एक अध्ययन में पता चला कि वीर्य की संरचना और गतिविधि में “वास्तविक गिरावट” आई है।
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    मेल फर्टिलिटी पर भारत में हुए अध्ययन
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