कैसे बनें एक बेहतर श्रोता?

By:Rahul Sharma, Onlymyhealth Editorial Team,Date:Jan 17, 2015

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हममें से बहुत से लोग दूसरों को सुनना ही नहीं चाहते। हमारी कोशिश दूसरे को अपनी बात सुनाने की ज्यादा होती है, बजाय कि उनकी बात सुनने के। हम किसी भी सूरत में बस अपनी बात पूरी करना चाहते हैं।
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    सुनना सिर्फ सुनना नहीं है

    सुनना (Listening) सिर्फ सुनना (hearing) भर नहीं है। और न ही यह इतना आसान और कुदरती है जितना कि लोग सोचते हैं। हममें से बहुत से लोग दूसरों को सुनना ही नहीं चाहते। हमारी कोशिश दूसरे को अपनी बात सुनाने की ज्यादा होती है, बजाय कि उनकी बात सुनने के। हम किसी भी सूरत में बस अपनी बात पूरी करना चाहते हैं। हम नहीं चाहते कि हमारी कोई बात अनकही या अनसुनी रह जाए। लेकिन, दूसरों की बात को ध्यान से सुनने का संयम हमारे भीतर नहीं होता।
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    पहले से तय होता है एजेंडा

    आमतौर पर आप बात करने से पहले ही अपना एजेडा तय करके आते हैं। किसी भी सूरत में उससे हटना आपको पसंद नहीं होता। किसी को लगता है कि आप उसकी बात बड़े ध्यान से सुन रहे हैं, लेकिन असल में ऐसा नहीं होता। असल में आप उस सही मौके का इंतजार कर रहे होते हैं, जब आप अपनी बात शुरू कर सकें। आप बातों को खुले दिमाग से नहीं सुन रहे होते। सुनने के पीछे हमारा उद्देश्य केवल हमारी सोच को सही साबित करने की होती है। ध्यान से सुनना एक कला है, जिस पर आपको लगातार काम करना पड़ता है। इसके लिए आपको लगातार मेहनत करने की जरूरत होती है।
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    मन साफ करके जायें

    अपने भीतर चल रहे विचारों के द्वंद्व को परखिये। अपनी भावनाओं को जानने का प्रयास करें। बात करने से पहले अपनी मनोदशा का भी खयाल रखें। अपने आप से सवाल पूछें कि क्या आप वाकई ध्यान से सुनने को तैयार हैं। आप बातचीत को किस दिशा में जाता हुआ देखते हैं। हो सकता है कि आपको लगे कि आप परेशान हैं या फिर बातचीत के दौरान हो सकते हैं, तो फिर बेहतर रहेगा कि आप उस समय चर्चा न ही करें। यदि फिर भी बात करनी जरूरी हो, तो आपको चाहिये कि ओपन माइंड से ही बात करें। हो सकता है कि उस व्यक्ति से बात करते हुए आप पहले परेशान हो चुके हों, लेकिन इस बार हालात अलग हो सकते हैं। अपने पूर्वाग्रहों को एक और रख दें और नयी व अलग जानकारी के लिए लोगों को ध्यान से सुनें।
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    सवाल पूछें जरा ध्यान से

    सवाल पूछने का तरीका भी सामने वाले के जवाब पर अंतर डालता है। मान लीजिये आप किसी से यह पूछने के बजाय, कि जो मेंने समझाया था क्या तुमने वह कर दिया? के स्थान पर आप इसी सवाल को बेहतर तरीके से पूछ सकते हैं। आप पूछ सकते हैं कि, तो आखिर तुमने क्या फैसला किया? क्या तुम उदास हो?  की जगह, आज तुम कैसा महसूस कर रहे हो? ज्यादा अच्छा रहेगा। यानी आपके सवाल ओपन एंडेड होने चाहिये ताकि वहां से बात आगे बढ़ाई जा सके।
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    इशारे भी आ सकते हैं काम

    कई बातें बिना बोले ही कही जा सकती हैं। सुनने के लिए हर बार कानों की ही जरूरत नहीं होती। आप पूरे शरीर से सुन और समझ सकते हैं। आंखें मिलाकर बात कीजिये। आगे झुककर बात करें, बात करते समय फोन को साइलेंट पर रखें और टीवी को बंद कर दें। इससे बातचीत के दौरान होने वाले व्यवधानों को कम किया जा सकता है। शारीरिक भाषा का इस्तेमाल करें और बातचीत के दौरान सकारात्मक शैली में हिलाते रहें।
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    बतायें कि आप समझ गये हैं

    किसी की बात को ध्यान से सुनें, और उसे दोहरायें। इससे सामने वाले व्यक्ति को यह संकेत जाता है कि आपने उसकी बात को ध्यान से सुना है। और इससे बातचीत को आगे बढ़ाने का रास्ता खुला रहता है।
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    दूसरे व्यक्ति की राय जानें

    अपनी बात कहने के बाद दूसरे व्यक्ति से जरूर पूछें कि उसने क्या कहा। उससे पूछें कि आखिर उसके कहने का अर्थ क्या है। उसकी बात का अभिप्राय क्या है। कई बार व्यक्ति को खुद भी अहसास नहीं होता कि उसने क्या कहा और जब आप इस क्रिया को दोहराते हैं, तो सामने वाले व्यक्ति को भी अपने शब्दों को सही असर मालूम चलता है।
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    पढ़े शब्दों को

    अगर बातचीत का मुद्दा भावनात्मक है, तो उन बातों को लिखकर रख लें जिन पर आप बात करना चाहते हैं। जब दूसरा व्यक्ति अपनी बात कह रहा हो, तो उस समय ही अपने नोट्स बनाकर रख लें। इससे आपको बात करने में आसानी होगी और साथ ही आप सामने वाले व्यक्ति की बातों का सटीकता से जवाब दे पायेंगे।
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    थोड़ा आराम करें

    जब कोई तरकीब काम न आये तो थोड़ा ब्रेक लें। बातचीत से ब्रेक लेना कई बार मददगार हो सकता है। बाहर जायें, थोड़ा घूमें और फिर ताजा होकर फिर बात करें।
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