दुनियाभर के लोग कड़ाके की ठंड से ऐसे करते हैं बचाव

By:Meera Roy, Onlymyhealth Editorial Team,Date:Dec 07, 2015

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विश्व में ज्यादा ठण्ड से बचने के अलग अलग उपाय आजमाए जाते हैं जो कड़ाके की ठण्ड में कमज़ोर से लगने लगते हैं। हम यहां समूचे विश्व के कुछ ऐसे ही उपायों का जिक्र करेंगे जो कड़ाके की ठण्ड में आजमाए जाते हैं।
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    ठण्ड से बचने के अलग-अलग तरीके


    हालांकि दिसम्बर का महीना चल रहा है फिर भी ठण्ड ने अपना असली रंग नहीं दिखाया। बावजूद इसके हम सब इस बात से वाकिफ हैं कि जब भी ठण्ड पड़ेगी, कड़ाके की पड़ेगी। यही नहीं इस ठण्ड से बचने के लिए तमाम उपाय नाकाम से नजर आने लगेंगे। बात सिर्फ हमारे देश की नहीं है, समूचे विश्व में ठण्ड से बचने के अलग अलग उपाय आजमाए जाते हैं जो कड़ाके की ठण्ड में कमज़ोर से लगने लगते हैं। हम यहां समूचे विश्व के कुछ ऐसे ही उपायों का जिक्र करेंगे जो कड़ाके की ठण्ड में आजमाए जाते हैं।
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    कनाडा और शिकागो


    कनाडा में जैसे जैसे ठण्ड बढ़ती जाती है, वैसे वैसे वहां के उपायों में तब्दीलियां नजर आने लगती है। मतलब यह कि वहां सिर्फ फैशन में ही बदलाव नजर नहीं आता वरन ठण्ड बढ़ने के साथ साथ कनाडाई अपने नाश्ते में बदलाव करने लगते हैं। उनका नाश्ता तुलनात्मक रूप से भारी हो जाता है, जिससे कि खुद को ठण्ड से बचाते हैं। असल में भारी नाश्ते के चलते मेटाबोलिज्म बढ़ जाता है। नतीजतन शरीर गर्माहट महसूस करता है। वहीं शिकागो में कड़ाके की ठण्ड से लड़ने के लिए लोग अपने हाथ की सुरक्षा करते हैं। दरअसल जितनी ठण्ड वहां बढ़ती है, उसी तरह वे अपने हाथों को सुरक्षा बढ़ा देते हैं। ताज्जुब की बात यह है कि वे हाथ के बचाव के लिए ज्यादा से ज्यादा खर्च करने से भी पीछे नहीं हटते।
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    रूस और स्वीडन


    रूसी कड़ाके की ठण्ड से निजात पाने के लिए ज्यादा से ज्यादा वक्त वाष्प स्नान यानी बैन्या लेने में गुजारते हैं। बैन्या स्नान रूस में प्राचीन काल से ही लिया जा रहा है। यही कारण है कि बैन्या स्नान रूस में राष्ट्र के चिन्ह के तौरपर चिन्हित किया जाता है। आपको यह बताते चलें कि बैन्या स्नान, सॉना स्नान से भिन्न है। जबकि स्वीडनवासी कड़ाके की ठण्ड से बचाव करने के लिए अपने शानदार आविष्कार पर निर्भर रहते हैं। दरअसल स्वीडन में ठण्ड से लड़ने के लिए कान का बचाव महत्वपूर्ण माना जाता है। यही कारण है कि वे लोग ईयर बग का इस्तेमाल करते हैं। ईयर बग को कान के ऊपर लगाया जाता है जिससे कान के जरिये शरीर तक ठण्ड नहीं पहुंच पाती।
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    डच और भारत


    डच के लोगों के पास अन्य देशों से भिन्न तरीका मौजूद है। डचवासी एक पारंपरिक फूट स्टोव का इस्तेमाल करते हैं। यह स्टोव एक तरह का बाक्स या कहें डिब्बा होता है जो कि एक तरफ से खुला होता है। बाक्स की ऊपरी तरफ छोटे छोटे छेद होते हैं। बाक्स के खुले दरवाजे से गर्म चारकोल अंदर रखी जाती है। इसकी गर्म छेद से होते हुए ऊपर की ओर उठती है। उस छेद के ऊपर डचवासी अपने पांव रखते हैं। मतलब यह कि कड़ाके की सर्दी में बचाव का आसान और बेहतरीन तरीका है। वहीं कश्मीरी सर्दी से बचने के लिए पारंपरिक काहवा का इस्तेमाल करते हैं। यह काहवा असल में ग्रीन टी होती है जो कि असाधारण मसालों से बनती है। इन मसालो में इलायची, बादाम, दालचीनी, लौंग आदि मौजूद होते हैं। ये सभी पदार्थ शरीर को गर्म रखने में सहायक है।
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    जापान और चीन


    जापान की ठण्ड न सिर्फ कड़ाके की होती है वरन बहुत ज्यादा खतरनाक भी होती है। असल में जापान में तापमान -30 डिग्री सेल्सियस तक गिर सकता है। यही कारण है कि जापानी कड़कड़ाती ठण्ड से बचने के लिए कोतात्सु का उपयोग करते हैं। कोतात्सु वास्तव में एक छोटा टेबल है जिसके चैतरफा हीटर जुड़ा होता है। साथ ही मोटे गद्दे भी लगे होते हैं। जब ठण्ड अपनी चरम सीमा पर हो तब भी जापानी सोते वक्त कोतात्सु का उपयोग करते हैं। जबकि चीनी बेड स्टोव का इस्तेमाल करते हैं। कहा जाता है कि चीन के उत्तरपूर्वी हिस्से में बिना कैंग बेड के जीवित ही नहीं रहा जा सकता है। दरअसल कैंग के नीचे मौजूद छेदों से बिस्तर को गर्म रखा जात है। कैंग बेड के जरिये चीनी अपनी पूरी रात आराम से गर्माहट में गुजार सकते हैं।
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    ग्रीनलैंड

    ग्रीनलैंड के लोग ठण्ड से बचने के लिए इग्लू में रहते हैं। हालांकि यह जानकर बड़ी हैरानी हो सकती है कि बर्फ से बने इग्लू भला हमें गर्म कैसे रख सकते हैं। लेकिन इग्लू के बनने के पीछे मौजूद सिद्धांत बेहद आसान है। असल में इग्लू बर्फ के जिस ब्लाॅक से बनाए जाते हैं, वे इंसुलेटर का काम करते हैं। परिणामस्वरूप इग्लू के भीतर रह रहे लोगों को गर्माहट महसूस होती है।
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