एट्रियल फिब्रिलेशन से जुड़े आवश्यक तथ्य

By:Rahul Sharma, Onlymyhealth Editorial Team,Date:Oct 04, 2014

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एट्रियल फिब्रिलेशन अर्थात अलिंद विकम्पन को ए-फिब या एट्रियल फिब भी कहा जाता है, एट्रियल फिब्रिलेशन के कारण दिल का दौरा पड़ने का जोखिम कोई गुना बढ़ जाता है।
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    एट्रियल फिब्रिलेशन

    एट्रियल फिब्रिलेशन अर्थात अलिंद विकम्पन को ए-फिब या एट्रियल फिब भी कहा जाता है। एट्रियल फिब दरअसल हृदय की असामान्य गति होती है। विशेषज्ञों के अनुसार एट्रियल फिब्रिलेशन के कारण दिल का दौरा पड़ने का जोखिम कोई गुना बढ़ जाता है। इसलिए एट्रियल फिब्रिलेशन के बारे में सही जानकारी रखना बेहद जरूरी होता है। तो चलिये इस स्लाइ शो में जानें अलिंद विकम्‍पन से जुड़े कुछ आवश्यक तथ्य।
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    क्यों होता है एट्रियल फिब्रिलेशन

    सामान्यतः हृदय की गति हृदय में विद्युत संकेतों द्वारा नियंत्रित होती है। और साइनस नोड बाकी हृदय को विद्युत संकेत भेजता है। इन संकेतों से ही हृदय सिकुड़ता है और रक्त को पंप भी करता है। सामान्य रूप से, हृदय एक नियमित दर से सिकुड़ता और फैलता है। लेकिन एट्रियल फिब होने से, साइनस नोड विद्युत संकेत शुरू नहीं करता। जिस वजह से संकेत दाएं या बाएं एट्रियम में अन्य जगहों से आते हैं। इससे हृदय की धड़कन अनियमित और कभी-कभी बहुत तेज हो जाती है।
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    किसको है अधिक जोखिम

    एट्रियल फिब्रिलेशन का जोखिम आयु बढ़ने के साथ बढ़ जाता है। आमतौर पर यह 60 साल के बाद ही देखने को मिलता है, हालांकि इसके लगभग आधे मरीज 75 साल से कम आयु के ही होते हैं। महिलाओं की तुलना में पुरुषों को एट्रियल फिब्रिलेशन होने की आशंका अधिक होती है।
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    एट्रियल फिब्रिलेशन के प्रकार

    एट्रियल फिब्रिलेशन के दो प्रकार होते हैं। यदि एट्रियल फिब्रिलेशन आता और जाता रहता है, तो इसे परोक्सिमल (आवेगीय) एट्रियल फिब्रिलेशन कहते हैं। परोक्सिमल एट्रियल फिब्रिलेशन मिनटों से लेकर दिनों तक रह सकता है। लेकिन यदि एट्रियल फिब्रिलेशन एक हफ्ते से ज्यादा समय तक रहता है, तो इसे परसिस्टेंट या क्रोनिक एट्रियल फिब्रिलेशन कहते हैं। जो कि उपचार से ही जाता है।
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    एट्रियल फिब्रिलेशन के लक्षण

    एट्रियल फिब्रिलेशन के लक्षणों के तौर पर, हृदय की अनियमित धड़कन, छाती के भीतर तेजी से ठोंकने जैसे अहसास जिसे हृदय की धुकधुकी कहा जाता है, होना, सांस फूलना गतिविधि करने पर जल्द ही थक जाना, बेहोशी तथा चक्कर आना या सिर खाली जैसा महसूस होना आदि महसूस होते हैं।
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    एट्रियल फिब्रिलेशन का जोखिम

    जैसा की हम जानते ही हैं कि, दिल का अनियमित या तेजी से धकड़ना आट्रियल फिब्रिलेशन कहलाता है। हार्ट एंड स्ट्रोक फाउंडेशन के अनुसार इस समस्या से पीड़ित लोगों को दिल का दौरा पड़ने का जोखिम, एट्रियल फिब्रिलेशन से नहीं जूझ रहे लोगों की तुलना में 3 से 5 गुना अधिक होता है। यह स्ट्रोक और अल्जाइमर जैसी बीमारियों का कारण भी बन सकता है।
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    एट्रियल फिब्रिलेशन बनाम अन्य अनियमित दिल की धड़कन

    कभी-कभी तेजी से दिल धड़कना एट्रियल फिब्रिलेशन से ज्यादा आम होता है। ये भी दिल के ऊपरी भाग में होती हैं, लेकिन मामान्यतः इसके कोई लक्षण नहीं दिखते। ये जोखिम को कारण नहीं होती और जल्द ठीक भी हो जाती है। जबकि एट्रियल फिब्रिलेशन गंभीर होती है और इसे तत्काल चिकित्सा की जरूरत होती है।  
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    एट्रियल फिब्रिलेशन की जांच

    एट्रियल फिब्रिलेशन की जांच की जांच के लिए डॉक्टर हृदय की अनियमित धड़कन को जांचने के लिए स्टेथेस्कोप से इसे सुनता है व नाड़ी की जांच करता है। वह इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम अर्थात ईसीजी या ईकेजी (आपके हृदय की विद्युत गतिविधि का रिकार्ड), होल्टर मॉनिटरिंग (24 से 28 घंटे तक आपकी हृदय दर का रिकार्ड) तथा हृदय रोग का पता लगाने के लिए अन्य कोई जांच भी कर सकता है। Image courtesy: © Getty Images

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    एट्रियल फिब्रिलेशन का उपचार

    एट्रियल फिब्रिलेशन के उपचार के लिए आपकी हृदय गति और दर को नियमित करने की दवा दे सकता है। या फिर आपको रक्त के थक्के जमने और दौरा पड़ने का जोखिम कम करने के लिए रक्त को पतला करने वाली दवा अर्थात प्रतिस्कंदक (एंटीकोएग्युलेंट) भी दी जा सकती है। दवाओं से लाभ न होने पर कार्डियोवर्ज़न किया जाता है। यह त्वचा के जरिए हृदय को दिया गया कम ऊर्जा का विद्युत झटका होता है।
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