आठ उपायों से पायें अपनी खोई सकारात्‍मकता

By:Nachiketa Sharma, Onlymyhealth Editorial Team,Date:Dec 06, 2014

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जीवन की अपेक्षायें पूरा न हो पाने के कारण हमारा मन नकारात्‍मक भावनाओं से ग्रस्‍त हो जाता है, इसलिए अपनी खोई हुई सकारात्‍मक भावनाओं को दोबारा पाने की कोशिश करें।
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    सकरात्‍मक भावनायें

    अपेक्षायें और सपने पूरे नहीं हो पाने के कारण हमें जीवन में कई बार नकारात्‍मक भावनाओं का एहसास होता है। जब भी हमारे सपने पूरे नहीं होते तब हम सकारात्‍मकता की बजाय नकारात्‍मक सोच से घिर जाते हैं। इसका असर करियर के साथ पारि‍वारिक जीवन पर भी पड़ता है और इसके कारण तनाव और अनिद्रा जैसी समस्‍यायें होने लगती है। लेकिन अगर आप हर वक्‍त उस निराशा के अंधेरे में ही डूबे रहेंगे तो आशा की दूसरी किरणों को पहचान भी नहीं पाएंगे। सकारात्मता कोई वरदान नहीं है जो सिर्फ उन गुरुओं के पास होता है जो जीने का तरीका सिखाते हैं। यह ऐसा अनुभव है जिसे हर व्‍यक्ति महसूस कर सकता है। अगर आपकी सकारात्‍मकता खो गई है तो उसे पाने की कोशिश करें।

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    अपने व्‍यवहार हो बदलें

    सकारात्‍मक सोच को दोबारा पाने के लिए सबसे पहला कदम उठायें अपने व्‍यवहार में बदलाव करके। अपने रवैये पर नियंत्रण रखें। अपने व्‍यवहार में सकारात्‍मकता लायें, मन में यह विचार करें कि आप नकारात्‍मक सोच आने पर भी लोगों से अच्‍छे से पेश आयेंगे। लोग हमेशा दूसरों को अपनी जिंदगी चलाने का मौका देकर सबसे बड़ी गलती करते हैं। इसलिए हर हालत में ऐसा करने से बचना चाहिए और अपने जीवन से जुड़े सारे महत्वपूर्ण फैसले खुद लेने चाहिए। अपनी भावनाओं पर सिर्फ आपका वश चले न कि दूसरों का।

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    मेडीटेशन है जरूरी

    वैज्ञानिक भी ये मानते हैं कि मेडीटेशन यानी ध्यान करने से हमारे दिमाग में अच्‍छे विचार आते हैं। जब दिमाग किसी विशेष विचार की तरफ केन्द्रित रहता है तो उससे उर्जा बिखरती है। यही इंसान को अंदर से मजबूत बनाती है। इसके कारण ही वह सामान्‍य जीवन आने वाली विपरीत परिस्थितियों का मुकाबला करने में सक्षम होता है। इसलिए हर दिन ध्‍यान के लिए समय निकालें, सुबह के वक्‍त 10-15 मिनट ध्‍यान लगाने की कोशिश करें।

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    सकारात्‍मक लोगों से मिलें

    नकारात्‍मक भावना से घिरे होने के बाद अगर आप ऐसे लोगों से मिलेंगे जिनकी सोच भी नकारात्‍मक होगी तो आपके अंदर सकारात्‍मकता कभी नहीं आयेगी। इसलिए सकारात्मक सोच वाले व्यक्तियों से संपर्क कीजिए। इस संसार में हर एक इंसान के पास किसी भी विषय को लेकर अपनी एक अलग विचारधारा होती है। सकारात्मक विचारधारा वाले व्यक्तियों से मिलने से आपकी सोच और लक्ष्‍य भी सकारात्मक तरीके से आगे बढ़ेंगी। ऐसे लोग आपकी नकारात्‍मक भावना को दूर करने में आपकी मदद करेंगे। इस तरह के लोगों से मिलने से आपकी खोई ऊर्जा भी वापिस आ जायेगी और फिर से आप अपने लक्ष्‍य को पाने के लिए पूरी मेहनत के साथ कोशिश करेंगे।

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    अपने लक्ष्‍य को न बदलें

    नकारात्‍मक सोच तभी आती है जब हम अपने लक्ष्‍य को पाने में सफल नहीं होते, हम अपने लक्ष्‍य को तभी नहीं पाते जब पूरी लगन और मेहनत के साथ उस काम को नहीं करते और रास्‍ता भटक जाते हैं। ऐसे में नकारात्‍मक सोच का आना स्‍वाभाविक है। ऐसा कोई काम नहीं है जिसे आसानी से पाया जा सकता है। अपने लक्ष्‍य को पाने के लिए आपको कई ठोकरें खानी पड़ेंगी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप अपने लक्ष्‍य को बदलते रहें। जीवन में जो लक्ष्‍य बनाया है उसपर टिके रहें, इससे आपका आत्‍मविश्‍वास नहीं डगमगायेगा।

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    बदलें अपनी मानसिकता

    अपनी मानसिक भावना में भी बदलाव लायें। किसी भी परिस्थिति में आपकी प्रतिक्रिया कैसी होती है यह आपकी सोचने की शक्ति में अंतर पैदा कर सकता है। किसी कठिन परिस्थिति में सकारात्मक प्रतिक्रिया देना उस परिस्थिति को और भी आसान बना देता है और आप आसानी से नकारात्‍मक भावना से उबर पाते हैं। इसलिए समाज को देखने का नजरिया बदलें और अपने आसपास फैली सकारात्‍मकता के अनुसार ही अपनी मानसिकता को रखें। इससे आपकी जिंदगी खुशहाल होगी।

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    स्‍वभाव पर उठायें सवाल

    जब भी हमारे आसपास किसी भी प्रकार का बदलाव होता है तब हम उसका प्रतिरोध करते हैं, यह इंसान की फितरत है। लेकिन इसके लिए आपका प्रतिरोध करना सही है, इस बात पर सावल उठायें। जब आप यह सोचेंगे कि आखिर इस प्रतिरोध का मकसद क्या है, तब आपको अपने आप मुश्किल इतनी बड़ी नहीं दिखेगी जितना आपने सोच रखा था। इससे आपको अपने मकसद पर सवाल उठाने वाले आपके रक्षात्मक स्वभाव को कम करेगा और आपके अंदर सकारात्‍मकता की भावना को बढ़ाने में मदद करेगा। इस बात का हमेशा ध्‍यान रखें कि सकारात्मक सोच ही दिमाग में सकारात्मकता लाती है जबकि प्रतिकूल सोच रखने वाले नकारात्मकता को पास बुलाते हैं।

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    अवसाद से बचें

    अवसादग्रस्त लोग अपने अंदर सकारात्मक भावनाओं को बनाकर नहीं रख सकते। यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कोंसिन मेडिसन द्वारा किये गये शोध में यह बात सामने आयी है कि, अवसाद के कारण लोगों के सकारात्मक भावनाओं को बनाए रखने की क्षमता बहुत कमजोर पड़ जाती है। अवसादग्रस्त लोग अपने अंदर खुशी की भावनाओं को देर तक बनाए नहीं रख सकते। इसलिए तनाव और अवसाद से बचने की कोशिश करें।

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    पैसे के पीछे न भागें

    सकारात्‍मक सोच को दोबारा पाने के लिए जरूरी है कि आप पैसे के पीछे न भागें। अगर आपको लगता है कि आपके पास जितना ज्यादा पैसा होगा, खुशियां भी उतनी ही ज्यादा होंगी तो आप पूरी तरह से गलत हैं। पैसे से हम अपने जीवन में खुशियां और सकारात्‍मकता नहीं खरीद सकते हैं। पैसे के पीछे भागने से आप छोटी-छोटी खुशियों को नजरअंदाज कर देते हैं और तनावग्रस्‍त हो जाते हैं। इससे मन में नकारात्‍मक विचार आते हैं। इसलिए पैसे के पीछे भागने से बेहतर है सकारात्‍मक सोच के साथ जियें।

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