भारत को टीबी-मुक्त बनाने में ये हैं चुनौतियां

By:Shabnam Khan , Onlymyhealth Editorial Team,Date:May 02, 2015

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भारत सालों से टीबी जैसी गंभीर बीमारी से लड़ रहा है। तरह-तरह के कैंपेन चलाए जा रहे हैं लेकिन फिर भी हर साल इस बीमारी के हजारों नए मामले सामने आ जाते हैं। आइये जानते हैं कि भारत को टीबी मुक्त बनाने के लिए क्या चुनौतियां सामने आ रही हैं।
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    भारत में टीबी के बढ़ते मामले

    भारत में रोजाना लगभग 4 हजार लोग टीबी की चपेट में आते हैं और 1000 मरीजों की इस बीमारी की चपेट में आने से मौत हो जाती है। यानी हमारे देश में हर दो मिनटों में तीन लोग टीबी (तपेदिक) से मरते हैं। यह आंकड़ा सालाना 3 लाख के पार जाता है और मरने वालों में पुरुष, महिलाएं और बच्चे सभी होते हैं। विश्व भर में लगभग बच्चों की टीबी के सालाना 10 लाख प्रकरण सामने आते हैं, जो कि कुल टीबी के प्रकरणों का 10 से 15 फीसदी है। इस बीमारी का पांचवा हिस्सा भारत से आता है।

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    क्या है टीबी

    टीबी यानी क्षय रोग एक संक्रामक बीमारी है जो माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस नामक जीवाणु की वजह से होती है। यह बीमारी पीड़ित व्यक्ति द्वारा हवा के माध्यम से फैलती है जिससे एक व्यक्ति एक वर्ष में 10 या उससे अधिक लोगों को संक्रमित कर सकते हैं। इस रोग ने एक महामारी का रूप ले लिया है जिसके कारण हर वर्ष 1.5 मिलियन लोग इसके काल का ग्रास बनते हैं।

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    टीबी के लक्षण

    रोग के बैक्टीरिया सांस के साथ फेफड़े में पहुंच जाते हैं और वहीं अपनी संख्या बढ़ाने लगते हैं। इनके संक्रमण के कारण फेफड़े में छोटे-छोटे जख्म बन जाते हैं जिसका पता एक्स-रे द्वारा लग जाता है। ज्यादातर रोगियों में रोग के लक्षण नहीं उत्पन्न होते लेकिन शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर रोग के लक्षण जल्दी दिखाई देने लगते हैं और वह पूरी तरह रोगग्रस्त हो जाता है। फिर भी इन लक्षणों से आप टीबी की पहचान कर सकते हैं। हल्का बुखार तथा हरारत रहना। भूख न लगाना या कम लगना तथा अचानक वजन कम हो जाना। सीने में दर्द रहना, थकावट तथा रात में पसीने आना, कमर की हड्डी में सूजन, घुटने में दर्द, घुटने मोड़ने में कठिनाई तथा गहरी सांस लेने में सीने में दर्द होना।

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    टीबी मुक्त-बनाने में परेशानियां

    भारत में होने वाली दूसरी सबसे बड़ी बीमारी टीबी है। इसलिए इसे रोकने के लिए और इससे बचाव के लिए सरकारी अमला वर्षों से कार्यरत है। लेकिन भारत में तब भी सालाना लाखों लोगों को टीबी होता है। दरअसल, भारत की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और अन्य परिस्थितियां ऐसी हैं कि टीबी की बीमारी को बढ़ावा ही मिलता है। यह रोग कई कारणों से होता है लेकिन निर्धनता, अपर्याप्त व अपौष्टिक भोजन, कम जगह में अधिक लोगों का रहना, गंदगी, गाय का कच्चा दूध पीना आदि इस रोग से ग्रसित होने के कुछ कारण हैं। भारत में ये सभी परिस्थितियां बहुतायत में है। ऐसी परिस्थितियों में ये रोग और फैलता है।

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    मिलों और छोटे उद्योंगों की खराब हालत

    कपड़ा मिल में काम करने वाले श्रमिक, रेशे-रोएं के संपर्क में रहने वाले लोग, बुनकर, धूल के संपर्क में रहने वाले लोग तथा अंधेरी कोठरियों या चालों में रहने वाले लोग भी इस रोग का शिकार हो जाते हैं। भारत में बड़े और छोटे, दोनों तरह के शहरों में रहने वाले बहुत से लोग ऐसे काम करते हैं। परिस्थियों के चलते वो जल्दी इस रोग की गिरफ्त में आ जाते हैं।

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    जागरूकता की कमी और उदासीनता

    भारत को टीबी मुक्त बनाने में एक समस्या जागरुकता की कमी भी है। भले ही विज्ञापनों में जागरुकता फैलाने और दवाओं के बारे में कितनी भी जानकारी क्यों न दी जाती हो, लोगों को अभी भी ठीक से इस बीमारी के बारे में नहीं मालूम। वो इस विषय को लेकर काफी उदासीन हैं। वहीं, इसे छूत का रोग समझने के कारण थोड़े बहुत लक्षण दिखने पर लोग इस बीमारी को छिपा लेते हैं। ऐसे में बीमारी बढ़ने का खतरा होता है।

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    गंदगी की समस्‍या

    टीबी एक संक्रामक रोग है जो गंदगी में बहुत जल्दी फैलता है। शहरी भारत का एक बड़ा हिस्सा झुग्गी बस्तियों में रहता है। भोपाल की भी लगभग 53 प्रतिशत जनसंख्या झुग्गियों में रहती है। शोध से पता चला है कि गांवों की अपेक्षा शहरी क्षेत्रों में टीबी का जोखिम 69 प्रतिशत अधिक है। यह हालात तब और भी चेताने वाले हो जाते हैं, जब हमें यह पता चलता है कि सन् 2030 तक दुनिया की दो तिहाई आबादी शहरों में रहेगी। इसलिए टीबी की रोकथाम के लिए सफाई के क्षेत्र में कदम उठाने बहुत जरूरी है।

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    टीबी का उपचार

    सीने के एक्सरे तथा थूक व बलगम की जांच से टीबी का पता लग जाता है। रोग का निदान हो जाने पर एंटीबायोटिक्स व एंटीबैक्टीयल दवाओं द्वारा उपचार किया जाता है। रोगी को लगातार 6 से 9 महीने तक उपचार लेना पड़ता है। दवाओं के सेवन में अनियमितता बरतने पर इस रोग के बैक्टीरिया में रोग के प्रति प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो जाती है जिसके कारण उन पर दवा का असर नहीं पड़ता। यह स्थिति रोगी के लिये खतरनाक होती है। उपचार के दौरान रोगी को पौष्टिक आहार लेना चाहिये तथा शराब व धूम्रपान आदि से बचना चाहिये।

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