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जानें क्‍या है वॉकिंग कॉर्प्‍स सिंड्रोम

By:Aditi Singh , Onlymyhealth Editorial Team,Date:Nov 20, 2015
चलती फिरती लाश यानि जिंदा होते हुए भी इस बात जिंदगी का अहसास खत्म हो जाना। जीं हां वॉकिंग कॉपर्स सिंड्रोम में कुछ ऐसा ही होता है। इसके बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए ये स्लाइडशो पढ़े।
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    चलती फिरती लाश

    क्या कभी कोई जिंदा होते हुए भी खुद को मरा हुआ मान सकता है? वो भी पल भर के लिए बल्कि जिंदगी भर वो इस सिंड्रोम से पीड़ित रह सकता है। इस सिंड्रोम को वॉकिंग कॉपर्स सिंड्रोम कहा जाता है। डेली मेल के मुताबिक 17 साल की हेली स्मिथ पिछले तीन सालों से खुद को मर चुका मानती थीं। उन्हें कभी ऐसा लगता ही नहीं था वो जिंदा है। वो जी तो रही थी, पर हमेशा एक ऐसा अहसास होता है जैसे उनके कोई भी अंग काम नहीं कर रहें हैं। इस बारें में विस्तार से जानने के लिए आगे पढें।
    Image Source-amarujala.com

    चलती फिरती लाश
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    क्या होता है वॉकिंग कॉपर्स सिंड्रोम

    वॉकिंग कॉपर्स सिंड्रोम से ग्रसित आदमी को लगता है कि वह मर चुका है, लेकिन धरती पर लगातार चल रहा है। वो हर समय जबरदस्त तनाव, अनिद्रा और आत्मविश्वास खोया हुआ होता है। इसे कोटार्ड सिंड्रोम के नाम से भी जाना जाता है। ये अति दुर्लभ बीमारी है।

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    क्या होता है वॉकिंग कॉपर्स सिंड्रोम
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    कैसे करता है प्रभावित

    कोटार्ड सिंड्रोम से पीड़ित लोग खुद को चोट पहुंचा-पहुंचाकर मार डालते हैं। इस बीमारी की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई बार इसके रोगी धन-दौलत, खाने-पीने का समान होते हुए भुखमरी के कारण मर जाते हैं।
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    कैसे करता है प्रभावित
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    जानें इसका इतिहास

    इस बीमारी का पहली बार पता 1788 में चला था, लेकिन फ्रांस के न्‍यूरोलॉजिस्‍ट जूल्‍स कोटार्ड ने 1880 में औपचारिक रूप से इसकी पहचान की थी। इस डिसऑर्डर की पहचान दिमाग के एक हिस्‍से और व्यक्ति की भावनाओं का विश्‍लेषण करने वाली बादाम के आकार की न्‍यूरॉन्‍स के सेट के प्रभावित होने से होती है।
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    जानें इसका इतिहास
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    लाइलाज है

    वॉकिंग कॉर्प्‍स सिंड्रोम का कोई इलाज नहीं होता है। इस डिस आर्डर में एंटी डिपरेशन, एंटीसाइकॉटिक और मूड को ठीक रखने वाली दवाईयां मदद करती है। ईलेक्ट्रो कॉनक्लूसिव थेरेपी भी इस तरह की मरीजों पर असर करती है
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    लाइलाज है
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