क्‍या फाइब्रॉयड और इंफर्टिलिटी में संबंध है

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
May 22, 2014
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Quick Bites

  • लगभग 35 प्रतिशत महिलायें होती हैं फाइब्राइड का शिकार।
  • मांसपेशियों के अतिरिक्‍त विकास के कारण होता है यह रोग।
  • इसके कारण स्‍पर्म और ओवम का मिलान नहीं हो पाता।
  • सर्जरी के जरिये आसानी से हो सकता है इसका उपचार।

वर्तमान में अनियमित दिनचर्या और खाने में पौष्टिकता की कमी के कारण महिलाओं को कई प्रकार की स्‍वास्‍थ्‍य संबंधित समस्‍यायें होती हैं, उनमें ही एक है फाइब्रॉयड। एक अुनमान के मुताबिक पूरी दुनिया में लगभग 35 प्रतिशत महिलाओं में यह बहुत सामान्‍य समस्‍या है।

भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा किए गए सर्वेक्षण के अनुसार देश में लगभग 20-45 आयु वर्ग की 25 प्रतिशत महिलायें इस समस्या की शिकार होती हैं। इस लेख में विस्‍तार से जानिये कि क्‍या यह बांझपन से जुड़ा है।

Relationship Between Fibroids and Infertility

क्‍या है फाइब्रॉयड

दरअसल जब यूटरस की मांसपेशियों का असामान्य रूप से अतिरिक्त विकास होने लगता है तो उसे फाइब्रॉयड कहा जाता है। यह एक प्रकार का ट्यूमर होता है जो कैंसर के लिए जिम्‍मेदार नहीं है।

इस ट्यूमर का आकार मटर के दाने से लेकर क्रिकेट की बॉल से भी बड़ा हो सकता है। जब यह गर्भाशय की मांसपेशियों के बाहरी हिस्से में होता है तो इसे सबसीरस कहा जाता है और अगर यह यूटरस के भीतरी हिस्से में भी होता है तो ऐसे फाइब्रॉइड को सबम्यूकस कहा जाता है।

अगर फाइब्रॉयड का आकार छोटा हो और इसकी वजह से मरीज को कोई तकलीफ न हो या उसे गभर्धारण करने की जरूरत न हो तो उसके लिए उपचार की कोई आवश्यकता नहीं होती। आनुवंशिकता, मोटापा, शरीर में एस्ट्रोजेन हार्मोन की मात्रा का बढ़ना और लंबे समय तक संतान न होना इसके प्रमुख कारण हैं।

 

फाइब्रॉयड और बांझपन

फाइब्राइड की समस्‍या होने पर बांझपन की स्थिति हो सकती है। दरअसल फाइब्राइड में मासिक धर्म के दौरान सामान्‍य से अधिक रक्‍तस्राव, यौन संबंध बनाते वक्‍त बहुत दर्द होना, यौन संबंध के समय योनि से रक्‍तस्राव होना, मासिक धर्म के बाद भी रक्‍तस्राव होने जैसी समस्‍या होती है। इन समस्‍याओं के कारण अंडाणु और शुक्राणु आपस में मिल नहीं पाते हैं जिसका परिणाम बांझपन होता है। तो काफी हद तक फाइब्राइड बांझपन के लिए भी जिम्‍मेदार है।

Fibroids and Infertility

फाइब्राइड का उपचार

फाइब्रॉइड के संबंध में सबसे बात यह कि इसकी गांठें कैंसर रहित होती हैं। इसलिए इनका आसानी से उपचार संभव है। पहले ओपन सर्जरी द्वारा इसका उपचार होता था, जिससे मरीज को स्वस्थ होने में लगभग एक महीने का समय लगता था। लेकिन अब लेप्रोस्कोपी की नई तकनीक के जरिये इस बीमारी का कारगर उपचार संभव है।

इसमें बड़ा चीरा लगाने के बजाय सिर्फ आधे से एक सेंटीमीटर का सुराख बनाकर दूरबीन के जरिये मॉरसिलेटर नामक यंत्र का उपयोग कर फाइब्रॉयड के छोटे-छोटे बारीक टुकड़े करके उसे बाहर निकाल दिया जाता है। इस तरीके से इलाज के दौरान मरीज को ज्यादा तकलीफ नहीं होती, खून भी ज्यादा नहीं निकलता और सर्जरी के 24 घंटे बाद महिला आसानी से घर जा सकती है।

अगर फाइब्रॉयड का आकार बहुत बड़ा हो या अत्यंत छोटे आकर के कई फाइब्रॉइड्स हों, अगर मरीज को डायबिटीज या हृदय रोग हो तो ऐसी स्थिति में भी उसे प्रति सप्ताह जीएनआरएच एनालॉग का इंजेक्शन लगाया जाता है। इससे धीरे-धीरे बड़ा फाइब्रॉयड सूखकर छोटा हो जाता है और इससे मरीज की तकलीफ कम हो जाती है।

इसके अलावा पॉलीविनाइल एल्कोहॉल के क्रिस्टल के जरिये फाइब्रॉयड की ऑटरी को ब्लॉक कर दिया जाता है, इससे ट्यूमर के लिए रक्त का प्रवाह रुक जाता है और ट्यूमर गलकर छोटे-छोटे टुकड़ों के रूप में पीरियड्स के साथ शरीर से बाहर निकल जाता है, लेकिन इलाज की यह प्रक्रिया ज्यादा महंगी है। इसके लिए  मरीज को कुछ दिनों तक अस्पताल में भर्ती भी होना पड़ता है, क्योंकि जब ट्यूमर के लिए खून की सप्लाई रुक जाती है तो इससे पेट के निचले हिस्से में तेज दर्द या यूटरस में संक्रमण की भी आशंका रहती है।

घर में किसी को यह समस्‍या पहले रही हो तो प्रत्‍येक छह महीने के अंतराल पर एक बार पेल्विक अल्ट्रासाउंड जरूर कराएं, ताकि शुरुआती दौर में ही इसका पता चल जाए। इससे बचाव के लिए स्‍वस्थ आहार का सेवन करें और नियमित व्‍यायाम करें।

 

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