क्या एबोला वायरस डिजीज के नाम से वाकिफ हैं आप?

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Aug 01, 2014
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Quick Bites

  • संक्रमित तरल पदार्थों के संपर्क से फैलता है एबोला वायरस।  
  • 1976 में पहली बार जायरे में एबोला वायरस का पता चला।
  • वायरस से संक्रमित 5 व्यक्तियों में से 4 की मौत हो जाती है।
  • इस बीमारी का कोई पक्का इलाज अभी तक नहीं मिला है।

एबोला वायरस एक संक्रमित और घातक बीमारी है। इसमें बुखार और अंदरूनी रक्तस्राव की समस्या हो जाती है। यह बीमारी शरीर के संक्रमित तरल पदार्थों के संपर्क के कारण होती है। दुर्भाग्यवश इस बीमारी में मृत्यु की आशंका 90 प्रतिशत तक होती है। आमतौर पर यह बीमारी अफ्रीका के सहारा क्षेत्र में अधिक देखने को मिलती है। दुखद है कि इस बीमारी का कोई पक्का इलाज अभी तक नहीं निकाल जा सका है।

 

Ebola in Hindi

 

30 जुलाई 2014 को ब्रिटेन में भी इस खतरनाक वायरस को फैलने से रोकने के लिए स्‍वास्‍थ्‍य आधिकारियों की आपात बैठक की गयी। पश्चि‍मी अमेरिका में यह बीमारी अब तक 670 लोगों की जान ले चुका है। और इसी खतरे को भांपते हुए ब्रिटिश अधिकारियों ने यह बैठक की है। हालांकि यह बीमारी अभी अफ्रीकी प्रायद्वीप के कुछ हिस्‍सों तक सीमित मानी जाती है, लेकिन इन देशों में नियमित यात्रा करने वाले लोगों को यह बीमारी हो सकती है। इसके साथ ही इन देशों से दूसरे देशों में जाने वाले लोगों को भी यह बीमारी परेशान कर सकती है। और क्‍योंकि यह एक संक्रामक रोग है इसलिए दुनिया भर के स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञों को इस बात की चिंता सता रही है कि कहीं यह बीमारी वैश्विक स्‍तर पर अपने पांव न पसार ले।

एबोला वायरस

1976 में पहली बार जायरे (वर्तमान कोंगो लोकतांत्रिक गणराज्य) में एबोला वायरस का पता चला था। मानव और बंदरों में इस वायरस से उग्र रक्त-शोध होता है। जिस कारण शरीर की रक्तवाहिकाएं बेकार होने लगती हैं। और शरीर में आतंरिक रक्तस्राव होने लगता है। इसमें काफी तेज बुखार होता है। इस रोग में मृत्यु दर 90 प्रतिशत तक हो सकती है। अर्थात एबोला वायरस से संक्रमित प्रति 5 व्यक्तियों में से 4 की मृत्यु हो जाती है। अभी तक एबोला वायरस की पांच प्रजातियों की पहचान हो चुकी है। इन पांच में से चार वायरस मनुष्यों में रोग का कारण बनते हैं:- 

पहले चार हैं जायरे एबोलावायरस,सूडान एबोलावायरस, कोट डी'इवोइरे एबोलावायरस तथा बुन्दीबुग्यो एबोलावायरस। पंचवां यानी रेस्टन एबोलावायरस आमतौर पर इनसानों को नहीं होता। यह सुअरों में पाया जाता है। हालांकि इसके कुछ मामले मनुष्यों में भी देखे गये हैं।

 

कैसे फैलता है एबोला वायरस

यह एक दुर्लभ किंतु संक्रामक रोग है। खासतौर पर रोगी के स्वास्थ्य की देखभाल कर रहे स्‍टाफ और परिवार के सदस्यों को यह बीमारी होने का खतरा काफी अधिक होता है। अन्य मनुष्यों में किसी संक्रमित व्यक्ति या पशु से इस रोग का संचरण, वायरस के रक्त या शरीर के तरल पदार्थ (जैसे, लार, और मूत्र) के साथ सीधे संपर्क के माध्यम से हो सकता है।

आमतौर पर एबोला याकिसी भी वायरल रक्तस्रावी बुखार (VHF) होने की आशंका तब तक नहीं होती, जब तक व्‍यक्ति उस प्रभावित क्षेत्र की यात्रा न करे। या फिर वह संक्रमित व्यक्तियों या पशुओं के शरीर के तरल पदार्थ के साथ सीधा संपर्क न आये।

एबोला संक्रमण के लक्षण

एबोला रक्तस्रावी बुखार की ऊष्मायन अवधि 2 से 21 दिनों तक हो सकती है। रोग के प्रारंभिक लक्षणों में अचानक बुखार, ठंड लगना तथा और मांसपेशियों में दर्द शामिल होते हैं। लक्षणों की शुरुआत के बाद लगभग पांचवें दिन के आसपास त्वचा पर लाल चकत्ते हो सकते हैं। इसमें मतली, उल्टी, सीने में दर्द, गले में खराश, पेट दर्द और दस्त भी हो सकते हैं। इसके लक्षण तेजी से गंभीर हो सकते हैं और पीलिया, तेजी  से वजन घटना, मानसिक भ्रम, सदमा, तथा मल्टी ऑर्गन फेल्योर के कारण भी बन सकते हैं। डॉक्टरों के अनुसार एबोला वायरस पीड़ित को तेज बुखार आता है और उसे हड्डियों में दर्द, डायरिया,उल्टी होने लगती हैं और प्रभावित मरीज की कुछ दिनों में ही मौत हो जाती है।


एबोला वायरस के संक्रमण की रोकथाम लिए संक्रमित व्यक्ति के खून के अथवा शरीर के तरल पदार्थों के संपर्क से बचना चाहिए। खासतौर पर सीरिंज के इस्‍तेमाल में विशेष सावधानी बरतनी चाहिये।

एबोला वायरस डिजीज का निदान

एबोला वायरस डिजीज के लक्षण कई अन्य बीमारियों की तरह होते हैं। इस लिए डॉक्टर निदान से पहले मलेरिया, टाइफाइड बुखार, शिगेल्लोसिस, रिकेट्सिओसिस, हैजा, लेप्टोस्पायरोसिस, प्लेग, बुखार, दिमागी बुखार, हेपेटाइटिस और अन्य वायरल रक्तस्रावी बुखार के होने की पड़ताल करता है। जिनके लक्षण एबोला वायरस डिजीज की ही तरह होते हैं।

 

Ebola in Hindi

 

ऐबोला वायरस के संक्रमण के निदान में निम्न परीक्षण मदद करते हैं-

 

  • एंटीबॉडी-कैप्चर एंजाइम-लिंक्ड इम्मुनोसॉरबेंट ऐसे (ELISA)
  • एंटी डिटेक्शन टैस्ट
  • सीरम न्यूट्रलाइजेशन टेस्ट
  • रिवर्स ट्रांस्क्रिप्टस पोल्य्मर्से चैन रिएक्शन (RT-PCR) ऐसे
  • इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोपी
  • वायरस आइसोलेशन बी सेल कल्चर

 

बंदरों पर छाया था एबोला वायरस का प्रकोप

वर्ष 2010 में आई संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) और इंटरपोल की ओर से संयुक्त रूप से तैयार अफ्रिकी देशों के संदर्भ में आई एक रिपोर्ट में कहा गया था कि गोरिल्ला के विलुप्त होने के खतरों के पीछे प्रमुख कारण वानर मांस की व्यापक मांग और लोकतांत्रिक कांगो गणतंत्र के पूर्वी हिस्सों में मिलिशियाओं की ओर से की जाने वाली इसकी तस्करी है। रिपोर्ट में गोरिल्लों की मौजूदा दुर्दशा के लिए एबोला बीमारी को भी जिम्मेदार माना गया है। उस समय एबोला के चलते हजारों की संख्या में गोरिल्ला समेत अनेक वानर मर चुके हैं।

 

यूं तो भारत में एबोला वायरस के मामले

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