बीफ खाने से पर्यावरण होता है प्रभावित

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Oct 23, 2015
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Quick Bites

  • बीफ का उत्पादन पर्यावरण में कार्बन उत्सर्जन का कारण।
  • एक ग्राम बीफ पकाने में होती है तीन किलो कार्बन उत्सर्जित।
  • ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में मवेशी क्षेत्र का हिस्सा 18 फ़ीसदी।
  • गेहूं और चावल से 10 गुना अधिक पानी की जरूरत मवेशी पालन में।

बीफ को लेकर मची तनातनी ने इसे राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया है, जिसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि गाय हिंदुओं के लिए पूज्यनीय है। जबकि बीफ ना खाने के पीछे अन्य पर्यावर्णीय वजहें भी हैं जो लोगों को जाननी जरूरी हैं। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र के पर्वायवरण कार्यक्रम में बीफ़ को 'जलवायु के लिए नुक़सानदेह गोश्त' बताया गया है। बीफ पकाने में क ई गवुना कार्बन का उत्सर्जन होता है जो पर्यावरण में कार्बन के स्तर को बढ़ाने के सबसे बड़े कारकों में से एक है।
Beef

जलवायु परिवर्तन की एक वजह बीफ भी

इसमें चौंकने वाली बात नहीं है कि जलवायु परिवर्तन की एक वजन गौमांस को पकाना भी है। क्योंकि हर एक ग्राम गौमांस पकाने में वातावरण में तीन किलो कार्बन का उत्सर्जन होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर दुनिया में हर कोई बीफ़ छोड़ दे तो दुनिया का कार्बन उत्सर्जन कारों के इस्तेमाल के मुक़ाबले कई गुना कम हो जाएगा। एफ़एओ के अनुसार वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में मवेशी क्षेत्र का हिस्सा 18 फ़ीसदी है जबकि परिवहन क्षेत्र का 15 फ़ीसदी है। ऐसे में इन आंकड़ों से पता लगाया जा सकता है कि मवेशी को खाना ग्लोबल वॉर्मिंग का सबसे बड़ा कारण है।

 

बीफ खाने वालों को सोचने की जरूरत

हाल ही में आए अध्ययन 'लाइवस्टॉक्स लॉंग शैडोः एनवायरोन्मेंटल इश्यू एंड ऑप्शन' में एफ़एओ का निष्कर्ष है कि "मवेशी क्षेत्र एक मुख्य कारक है और जलवायु परिवर्तन में इसका हिस्सा परिवहन क्षेत्र से ज़्यादा हिस्सा है।" ऐसे में बीफ खाने वालों को एक बार सोचने की जरूरत है।

 

जलसंरक्षण के लिए भी नुकसानदायक

बीफ का उत्पादन पर्यावरण के साथ जल संरक्षण को भी नुकसान पहुंचाता है। गेहूं और चावल जैसी मुख्य फ़सलों के मुकाबले बीफ़ के लिए पशुपालन में करीब 10 गुना पानी की जरूरत पड़ती है। जबकि पोर्क के उत्पादन में इसका एक तिहाई ही पानी लगता है।

 

अन्य नुकसान

  • पशुओं की डकार और पाद में ज्वलनशील मीथेन गैस निकलती है जो जलवायु को काफी प्रभावित करती है। यह 'मार्श गैस' के नाम से भी जानी जाती है जो पशुओं की आंत में तब बनती है जब एक जीवाणु भोजन को पशु पचा रहा होता है। यह मीथेन कार्बन डाइऑक्साइड के मुकाबले 21 गुना ज़्यादा ज़िम्मेदार है।
  • स्वीडिश अध्ययन के आंकड़ों के आधार पर यूएनईपी ने कहा है, "ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के संदर्भ में एक घर में एक किलो बीफ खाए जाने का अर्थ है 160 किलोमीटर तक गाड़ी चलाना।"
  • अमरीका के येल विश्वविद्यालय के 2014 के एक शोध के अनुसार, बीफ़ के उत्पादन के लिए अन्य मवेशियों के मुकाबले 28 गुना ज़्यादा जगह चाहिए होती है जिससे यह ग्लोबल वॉर्मिंग को 11 गुना ज़्यादा प्रभावित करता है।




Image source @ Getty
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