आटिज्म ऐसा विकार है जो कि बच्चे के बात करने और समझने की कला को प्रभावित करता है । चिकित्सक आटिज्म को एक ऐसे व्यापक विकासात्मक विकार के रूप में वर्गीकृत करते हैं जिसका अर्थ है कि बच्चा सामान्य बच्चों की तरह जीवन के पहलुओं को नहीं समझ सकता । ऐसे बच्चों की मुख्य समस्या होती है संचार की । आटिस्टिक बच्चे ना सिर्फ अपनी भावनाएं दूसरों पर व्यक्त करने में असमर्थ होते हैं बल्कि वो दूसरों की बातें समझने में भी असमर्थ होते हैं । इन्हीं कारणों से वो पढा़ई में दूसरे बच्चों से पीछे रह जाते हैं ।
आटिस्टिक बच्चों में कुछ विशिष्ट लक्षण होते हैं जैसे कि लगातार एक ही प्रकार का काम करना या प्रतिदिन के कार्य में किसी प्रकार के बदलाव को अस्वीकार करना । उन्हें मौखिक और गैर मौखिक संचार दोनों में ही समस्या आती है ।
ऐसे बच्चे बिलकुल नहीं बोलते हैं और सिर्फ तेज़ आवाज़ पर ही प्रतिक्रिया करते हैं । कुछ आटिस्टिक बच्चे संकेतों को भी नहीं समझ पाते ।
बहुत से आटिस्टिक बच्चे थोड़ा बहुत बोल लेते हैं लेकिन वो सामान्य बच्चों की तरह नहीं पढ़ सकते । जैसे कि वो कुछ विशेष क्षेत्रों में बोल पाते हैं, लेकिन सभी में नहीं । कुछ आटिस्टिक बच्चों की याद्दाश्त बहुत अच्छी होती है अगर उन्होंने कोई जानकारी सुनी है या कोई घटना देखी है, तो वो उन्हें लम्बे समय तक याद रहती है । कुछ में बहुत ही महान संगीत प्रतिभा होती है और कुछ गणितीय गणना करने में बहुत तेज़ होते हैं । आंकड़ों से ऐसा पता चला है कि आटिज़्म से प्रभावित लगभग 10 प्रतिशत बच्चों में संगीत और गणित को समझने की अधिक क्षमता होती है ।
अधिकतर चिकित्सक जो कि आटिस्टिक बच्चों की देखरेख करते हैं वो ऐसी सलाह देते हैं कि आटिस्टिक बच्चों की जितनी जल्दी हो सके स्पीच थेरेपी की जानी चाहिए । इससे बच्चे दूसरे लोगों को समझने में और बातें करने में धीरे-धीरे समर्थ होने लगते हैं ।
आजकल, स्पीच लैंग्वेज पैथालाजिस्ट या भाषण चिकित्सक जो कि भाषा से सम्बन्धी समस्याओं के विशेषज्ञ हैं वो आटिज़्म की चिकित्सा करते हैं । चिकित्सा के सभी चरण में स्पीच लैंग्वेज चिकित्सा सामान्यत: परिवार, स्कूल और शिक्षक का सहयोग भी लेता है । बहुत से उपकरण जैसे कि इलेक्ट्रानिक टाकर, चित्र बोर्ड और शब्दों के इस्तेमाल से ऐसे बच्चों को समझने में आसानी होती है ।
भाषण चिकित्सा से ना केवल बच्चे की भाषा का कौशल विकसित होता है बल्कि इससे बच्चे आसपास में रहने वालों से सम्वन्ध भी स्थापित कर पाते हैं, जैसा कि आटिस्टिक बच्चों को करने में समस्या आती है । अधिकतर चिकित्सक ऐसी सलाह देते हैं कि आटिस्टिक बच्चों में जितनी जल्दी हो सके स्पीच थेरेपी शुरू कर देनी चाहिए । सामान्यत: आटिज़्म का पता 3 साल की उम्र से पहले लगता है । अधिकतर आटिस्टिक बच्चे बोलने में अक्षम होते है, लेकिन थेरेपी के शुरूवाती दिनों से ही वो सामने वाले के सवालों पर कुछ प्रतिक्रिया करते हैं । शोधों से ऐसा पता चला है कि वो आटिस्टिक लोग जिनमें कि सुधार पाया गया है वो अधिक समय से स्पीच थेरेपी ले रहे होते हैं ।

