इतना बुरा भी नहीं है रोना

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Jul 11, 2013
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रोती हुई लड़की

अक्‍सर लोग आंसू का संबंध दुख से लगाते है‍। लेकिन यह एक स्‍वाभाविक क्रिया है। जन्म के समय से ही बच्चे रोना शुरू कर देते हैं। उस समय न रोने पर उसे रुलाने की कोशिश की जाती है ताकि उसकी मांसपेशियों व फेफड़ों का संचालन ठीक प्रकार से होने लगे। लेकिन, ज्‍यों-ज्‍यों हमारी उम्र बढ़ने लगती है रोने को हमारी कमजोरी से जोड़ लिया जाता है। लेकिन, रोना इतना बुरा भी नहीं। दरअसल, कई बार यह सेहत के लिए फायदेमंद होता है।

 

रोने से मस्तिष्क में दबी भावनाओं का तनाव दूर हो जाता है, राहत मिलती है और बहुत शक्ति प्राप्त होती है। अत: पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में दिल का दौरा काफी कम पडता है। अपने मानसिक तनाव को आंसुओं के द्वारा शिथिल न कर पाने के कारण अक्सर पुरूष धमनियों से संबंधित व्याधियों से पीड़ित रहते हैं।

 

आधुनिक वैज्ञानिकों ने आंसुओं को स्वास्थ्यकर बताया है। अमेरिका के वैज्ञानिक विलियन एच फ्रेंक के मुताबिक आंसू के सहारे शरीर में जमा जहरीले रसायन बाहर निकल आते हैं। वे तनावग्रस्त लोगों को रोने की फिल्में देखकर आंसू बहाने की सलाह देते हैं। आंखों के उपचार के लिए आंसू से बेहतर कोई अन्य कीटाणुनाशक नहीं है। आंसू ही आंखों को नम रखते हैं। स्वच्छ रखते हैं तथा धूल आदि पड़ने पर उसे धो डालते हैं।

 

 

आंसू के विष के प्रभाव से ही हवा से उड़कर आंखों में पड़नेवाले कीट-पतंगे मर जाते हैं और वे हानि नहीं पहुंचा पाते। भावनात्मक आंसू हमें उदासी, अवसाद और गुस्से से मुक्ति दिलाते हैं। यही आंसू हद से बाहर जाने से भी रोकते हैं। रोने से मन का मैल धुल जाता है तथा एक प्रकार की शांति महसूस होती है। न रोने वाले मानसिक तनाव से ग्रसित होकर चिड़चिड़े स्वभाव के हो जाते हैं। ऐसे व्यक्ति शीघ्र निर्णय भी नहीं ले पाते हैं। रोने के बाद आवेश शांत तथा पुतलियां स्वच्छ हो जाती हैं।





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