बच्‍चों में टांगों के दर्द को न करें नजरअंदाज

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Oct 21, 2014
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Quick Bites

  • बच्‍चों के वजन का रखें खयाल।
  • पौष्टिक आहार है बच्‍चों के लिए जरूरी।
  • अनुवांश‍िक नहीं होतीे अर्थराइटिस की ज्‍यादातर समस्‍यायें।
  • सही समय पर इलाज करवाने से होता है फायदा।

क्‍या आपका बच्‍चा टांगों में दर्द का शिकायत करता है। तो बढ़ती उम्र के इस दर्द की अनदेखी न करें। यह भविष्‍य में घुटने से जुड़ी समस्‍याओं का संकेत हो सकता है। स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञ इसे लेकर चेतावनी देते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि आजकल बच्‍चे भी जेनू वेल्‍गम और जेनू वेरम (नॉक नी/बो लेग्‍स) जैसी घुटने की समस्‍याओं से जूझ रहे हैं। इसके अलावा वे डिस्‍कोर्ड मेनिस्‍कस, जिसमें घुटने में असामान्‍य अर्द्धचंद्राकार गांठ सी पड़ जाती है, बंध आंसू, किशोर रुमेटी अर्थराइटिस और मोटापे संबंधित घुटने के दर्द आदि बच्‍चों में सामान्‍य हो गया है।

हालांकि, जानकारों का कहना है कि घुटने संबंधित बीमारियां और अर्थराइटिस आमतौर पर किशोरों में काफी प्रचलित नहीं हैं। जुवेनाइल रेहयूमेटॉयड अर्थराइटिस बच्‍चों को कम उम्र में भी प्रभावित कर सकता है। यह समस्‍या एक साथ कई जोड़ों को प्रभावित कर सकती है।

बच्‍चों में टांगों के दर्द को न करें नजरअंदाज

फड़कने का अहसास

कई बार बच्‍चों को अपनी टांगों में खुजली या फड़कने का अहसास होता है। यह अहसास तीन वर्ष या उससे बड़े बच्‍चों को हो सकता है। आमतौर पर बच्‍चों को रात के समय यह अहसास होता है। इसे ग्रोइंग अप पेन कहा जाता है। डॉक्‍टरों का कहना है कि इस दर्द को अनेदखा नहीं करना चाहिये क्‍योंकि यह बच्‍चों में आगे चलकर ऑस्टियोअर्थराइटिस होने के खतरे का इशारा करता है।     

जुवेनाइल अर्थराइटिस में कम उम्र में ही बच्‍चे रहेयूमेटॉयड अर्थराइटिस का शिकार हो जाते हैा। इसमें जोड़ों में जलन और सूजन होती है। हालांकि इस बीमारी के कारणों का भी अभी तक पता नहीं चल पाया है।

जीवनशैली का असर

शोधकर्ताओं का मानना है कि कुछ बच्‍चों में इस बीमारी के कुछ जीन्‍स मौजूद होते हैं। वहीं कुछ बच्‍चों को वातावरण में मौजूद किसी चीज के कारण भी अर्थराइटिस हो सकता है। हालांकि इस बात पर भी ध्‍यान देना जरूरी है कि जुवेनाइल अर्थराइटिस अनुवांशिक नहीं होता। इसके साथ ही इस बात का भी खयाल रखना जरूरी है कि बच्‍चों में अर्थराइटिस लाइफस्‍टाइल समस्‍या नहीं है। लेकिन, जो बच्‍चे शारीरिक रूप से निष्‍क्रिय जीवनशैली अपनाते हैं, वे बच्‍चे जो मोटे हैं, जो अस्‍वास्‍थ्‍यकर भोजन करते हैं, बड़ी उम्र में उन्‍हें जोड़ों की समस्‍या होने की आशंका अधिक होती है। जानकार छोटे बच्‍चों में बढ़ती इस समस्‍या को गंभीरता लेने की बात कर रहे हैं। वे मानते हैं कि परिस्थितियां काफी गंभीर हैं।

लड़कियों में अधिक होती है समस्‍या

बच्‍चों में घुटने की समस्‍या भी लड़कियों में अधिक देखने को मिलती है। नॉक नी, बो लैग्‍स और मोटापे से पीडि़त बच्‍चों को अर्थराइटिस होने की आशंका अधिक होती है। जोड़ों की अधिकतर समस्‍यायें अनुवांशिक नहीं होतीं। लेकिन एन्‍किलोसिंग स्‍पांडिलाइटिस (रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करने वाला अर्थराइटिस) कुछ अर्थराइटिस, अनुवांशिक भी हो सकते हैं।

जानकार मानते हैं कि जेआरए 8 से 18 वर्ष की आयु के बच्‍चों में अधिक सामान्‍य होता है। लेकिन स्‍पे‍क्‍टिक अर्थराइटिस पांच वर्ष से छोटी आयु के बच्‍चों को होता है।

बच्‍चों में टांगों के दर्द को न करें नजरअंदाज

कैसे रखें समस्‍या को दूर

जेआरए को दूर रखने के लिए आप कुछ खास नहीं कर सकते क्‍योंकि यह एक ऑटोइम्‍यून डिस्‍ऑर्डर है। हालांकि, बच्‍चों में मोटापे को दूर रखकर उनके घुटने पर पड़ने वाले दबाव को कम किया जा सकता है। इसके साथ ही बच्‍चों को खाने पीने की अच्‍छी आदतें डालनी चाहिये। उन्‍हें जंक फूड से भी दूर रहना चाहिये।

आहार हो सही

बच्‍चों को उच्‍च प्रोटीन युक्‍त आहार लेना चाहिये। इसके साथ ही ताजा फलख्‍ सब्जियां, साधारण कार्बोहाइड्रेट, खूब सारा तरल पदार्थ और एंटी ऑक्‍सीडेंट्स का सेवन करना चाहिये। इससे वे मोटापे से दूर रहेंगे। इसके साथ ही उन्‍हें एरोबिक्‍स व्‍यायाम और स्विमिंग आदि भी करनी चाहिये ताकि उनका वजन काबू में रहे और मांसपेशियां और जोड़ सुरक्षित रहें।

जल्‍दी इलाज करवाने से इस बीमारी के इलाज को आसान बना सकता है।

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