किशोर क्‍या सोचते हैं

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Jan 09, 2013
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Quick Bites

  • किशोरावस्था में अक्सर बच्चे माता-पिता की बातों से सहमत नहीं होते।
  • किशोरों को अपनी आजादी और आत्मनिर्भरता बेहद पसंद होती है। 
  • किसी मसले पर इस हद तक बहस न करें कि एक-दूसरे से नाराज हो जाएं।
  • फैसले लेने में अपने किशोर बच्चों की मदद करें, न कि अन पर फैंसले थोपें।

किशोरावस्था में कई बार बच्चे माता-पिता की बातों से सहमत नहीं होते हैं। इसकी बड़ी वजह है कि इस उम्र और अलग माहौल के कारण उनकी सोच का माता-पिता से अलग होना है। इस उम्र में उनकी सोच का विकास हो रहा होता है। किशोरों को अच्छी बुरी चीजों में फर्क बताने के लिए विशेष सावधानी बरतनी चाहिए नहीं तो वे अभिभावक से दूर होने लगते हैं। इस लेख में हम आपको बता रहे हैं कि क्या सोचते हैं किशोर।

kishore kya sochte hai


सोच का संज्ञानात्मक विकास 

किशोर वर्ग के सोचने और किसी चीज पर विचार करने का तरीका बचपन के मुकाबले काफी परिपक्व हो जाता है और वे किसी भी बात को तर्क की कसौटी पर जांचने में सक्षम हो जाते हैं। इस अवस्था में उनकी सूझ बूझ काफी बढ़ जाती है और वे बड़ो एवं समझदार व्यक्ति की तरह सोचने लगते हैं तथा किसी भी समस्या का समाधान ढूंढने में लग जाते हैं।

अब उन्हें सोचने समझने के लिए और ज्यादा अनुभव की जरूरत नहीं होती । एक किशोर वर्ग की लड़की या लड़का किसी भी समस्या में या काम में तार्किक कारण ढूंढ सकता /सकती है , वे ऐसे हालत पैदा कर सकते हैं जो सही और विश्वसनीय लगे तथा कई काल्पनिक बातें कर सकते हैं जो वाकई सच हो सकते है । ऐसे हीं काल्पनिक सोच के बल पर तो लोग वैज्ञानिक वगैरह बनते हैं।

वे अब किसी भी समस्या को जुबानी तौर पर भी सुलझा सकते है मसलन अगर आप उनसे पूछे की 'क' से बड़ा 'ख' है और 'ख' से बड़ा 'ग' है तो तीनो में सबसे बड़ा कौन हुआ । इस प्रश्न का वे दिमाग में सोचकर तुरंत सही जवाब दे सकते हैं लेकिन इसका सही जवाब देने में एक 10 साल के बच्चे को 'क', 'ख' और 'ग' को वस्तु के रूप में उनके सामने रखना होगा।

 

 

किशोरों की सोच से कैसे डील करें


उन्हें पसंद होती है आजादी और आत्मनिर्भरता

बच्चों को लगता है कि कोई बात या तो गलत है या सही। लेकिन किशोरावस्था में वे समझते हैं कि जिंदगी की हर बात सही-गलत तक सीमित नहीं होती, बल्कि इनमें पेचीदगी भी होती है। इससे यह साफ होता है कि उनकी जांच-परख करने की काबलियत बढ़ रही होती है। इससे किसी किशोर को सही फैसले लेने में मदद मिलती है। एक किशोर जांच-परख करने की अपनी क्षमता बढ़ाता है तो वह समस्याओं को सुलझाना सीखता है और अपनी राय कायम करने लगता है। इस वजह से उसकी सोच अकसर उसके माता-पिता की सोच से मेल नहीं खाती।

 

आप क्या कर सकते हैं

जब कभी मौका मिले, अपने किशोर बच्चों से बात कीजिए। हर मौके का फायदा उठाइए, क्योंकि इस उम्र में अपने बच्चों के साथ वक्‍त गुजारना और उनसे बात करना बेहद जरूरी होता है। कुछ मां-बाप ने पाया है कि साथ में कोई काम करते समय वे अपने किशोर खुलकर अपनी बात कह पाते हैं, जबकि आमने-सामने बैठकर बात करने पर बच्चों को झिझक महसूस होती है।

बातचीत को छोटा रखें

हर मसले पर इस हद तक बहस मत कीजिए कि आप एक-दूसरे से नाराज हो जाएं। बेहतर होगा कि आप अपनी बात ठीक तरीके से कहें और फिर चुप हो जाइए। हो सकता हा कि आपको लगे कि आपका बच्चा आपकी बात पर ध्यान नहीं दे रहा, मगर ऐसा नहीं है। बाद में जब वह अकेला होगा तो वह आपकी बात पर विचार कर उसे समझेगा भी। अपनी बात रखने के बाद उसे थोड़ा वक्‍त दीजिए ताकि वह इस बारे में सोच सके।

 

उसकी बात भी सुनिए सुनिए

कोई भी बात यदि एक तरफा हो तो वह ज्ञान और विचार से उठकर आदेश बन जाती है। इसलिए बिना टोके, ध्यान से अपने बच्चे की बात सुनिए ताकि आप समस्या को अच्छी तरह समझ सकें। उसकी भावनाओं का सम्मान करते हुए जवाब दें। अगर आप अपने बनाए नियमों पर अड़े रहेंगे, तो आपका किशोर उन्हें तोड़ने के प्रयास करेगा, और कोई न कोई बच निकलने का रास्ता ढूंढ़ ही लेगा।

 

फैसले लेने में किशोर की मदद करें

फैसले लेने में अपने बच्चे की मदद करें, न कि यह बताइए कि उसे क्या करना है क्या नहीं। जिस प्रकार मांस-पेशियों को मबूत बनाने के लिए किसी इंसान को खुद कसरत करनी पड़ती है, उसी तरह आपके किशोर को जांच-परख करने की अपनी काबिलीयत बढ़ाने के लिए खुद मेहनत करनी होती है। इसलिए जब वह किसी पसोपेश में हो, तो उसके लिए फैसले न लें, बल्की उसको सही फैंसले लेने में मदद करें।

 

किशोर वर्ग के सोचने और किसी चीज पर विचार करने का तरीका बचपन के मुकाबले काफी परिपक्व हो जाता है और वे किसी भी बात को तर्क की  कसौटी पर जांचने में सक्षम हो जाते हैं। इसलिए उनसे उम्र के इस दौर में ठीक से डील करने के लिए उपरोक्त बातों का खयाल रखना चाहिए।

 

 

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