पहली बार मां बनने जा रही हैं तो इन 5 तरीकों से करें सही देखभाल

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
May 11, 2018
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Quick Bites

  • नवजात शिशु रोकर ही आपके साथ अपना संवाद स्थापित करता है।
  • शुरुआती छह महीने में बच्चे बहुत जल्दी नैपी गीली करते हैं।
  • जन्म के एक महीने बाद मालिश की शुरुआत करनी चाहिए।

पहली बार मां बनने वाली स्त्रियां घर में आने वाले नन्हे मेहमान की सही देखभाल को लेकर हमेशा सशंकित रहती हैं। घर में नए शिशु के आगमन का समाचार सुनकर जहां परिवार के सभी सदस्य बेहद खुश होते हैं, वहीं भावी मां के मन में खुशी के साथ कई सवाल भी होते हैं। उसे हमेशा यही आशंका रहती है कि शिशु की देखभाल में कहीं कोई चूक न हो जाए। अगर आप पहली बार मां बनने जा रही हैं तो आपको इन बातों का ध्यान ज़रूर रखना चाहिए।

मां की गोद सबसे सुरक्षित

बेबी केयर की शुरुआत उसी वक्त से हो जाती है, जब नर्स पहली बार नवजात शिशु को मां की गोद में सौंपती है। शिशु को गोद में लेने का पहला नियम यह है कि बिना किसी डर के उसे सहजता से उठाएं।
सही तरीका : शिशु की गर्दन के नीचे अपना एक हाथ लगाकर उसके सिर को सहारा देते हुए उसे धीरे से उठाएं और दूसरे हाथ से उसकी कमर को सहारा दें। शिशु के लिए सबसे आरामदेह स्थिति यही होती है कि उसका सिर आपके मुड़े हुए हाथ के बीच अच्छी तरह चिपका हो और गर्दन सीधी रहे।

समस्या बेवजह रोने की

नवजात शिशु रोकर ही आपके साथ अपना संवाद स्थापित करता है। उसमें इतनी समझ नहीं होती है कि वह अपनी ज़रूरतों की प्राथमिकता पहचान सके। इसलिए उसे जब भी कोई बात नापसंद होती है तो वह रो कर ही अपनी नाराज़गी का इज़हार करता है।
सही तरीका : शिशु का रोना नई मां के लिए सबसे बड़ी समस्या होती है। आमतौर पर भूख लगने, नैपी गीली होने, कोई नया चेहरा देखने या नई आवाज़ सुनने और बड़ों द्वारा गोद में उठाए जाने का तरीका नापसंद होने पर वह रोकर अपना विरोध प्रदर्शित करता है। कभी-कभी बच्चे थकान की वजह से भी रोते हैं। अगर आपका बच्चा गहरी नींद से चौंककर जागने के बाद रोने लगे तो सबसे पहले उसकी नैपी चेक करें कि कहीं वह गीलेपन की वजह से तो नहीं रो रहा। ये कुछ ऐसे सामान्य लक्षण हैं, जिन्हें आसानी से पहचानकर आप यह अंतर समझ सकती हैं कि आपका बच्चा किस कारण से रो रहा है।

छोटे बच्चों के रोने का एक दूसरा बहुत बड़ा कारण यह भी है कि दूध पीते समय उसके साथ उनके पेट में थोड़ी हवा भी चली जाती है। ऐसी स्थिति में गैस की वजह से उनके पेट में दर्द होता है। इस दर्द को कॉलिक पेन कहते हैं। पेट में दर्द होने पर शिशु लगातार रोता रहता है। दूध पीने के बाद भी अगर वह रो रहा हो तो यह समझना चाहिए कि उसके पेट में गैस की वजह से दर्द हो रहा है। इसके लिए आप अपने कंधे पर शिशु का सिर टिकाकर उसकी पीठ थपथपाते हुए उसे डकार दिलवाएं। शिशु को कॉलिक पेन से बचाने के लिए उसे फीड कराते समय इस बात का ध्यान रखें कि निप्पल और उसके मुंह के बीच गैप न हो। बीच की खुली जगह से ही शिशु के पेट में हवा चली जाती है, जिससे कॉलिक पेन की समस्या होती है।

इसे भी पढ़ें:- रात में अचानक क्‍यों रोने लगता है बच्‍चा, ये हैं 5 कारण

कैसे करें नैपी चेंज

शुरुआती छह महीने में बच्चे बहुत जल्दी नैपी गीली करते हैं। इसलिए इस उम्र में हर एक घंटे बाद नैपी चेक करना ज़रूरी है।

सही तरीका : नैपी बदलने से पहले साफ नैपी, कॉटन वूल और बैरियर क्रीम ये सारी ज़रूरी चीज़ें बच्चे के पास रख लें, फिर उसके बाद ही नैपी बदलें। इस दौरान इन बातों का ध्यान ज़रूर रखें :

  • नैपी बदलने से पहले गुनगुने पानी और साबुन से अपने हाथ अच्छी तरह धो लें।
  • उसके बाद गंदी नैपी हटाकर फेंक दें और गुनगुने पानी में कॉटन डुबोकर शिशु को अच्छी तरह सा$फ करें।
  • साफ सूती कपड़े के टुकड़े से डायपर एरिया को अच्छी तरह पोंछें। फिर थोड़ा-सा बैरियर क्रीम लगाएं और बेबी पाउडर छिड़कें। अगर आप शिशु के लिए घर में बना डायपर इस्तेमाल करती हैं तो उसे गर्म पानी और किसी अच्छे एंटीसेप्टिक से अच्छी तरह धोने के बाद ही इस्तेमाल करें। बेहतर तो यही होगा कि आप उसके लिए डिस्पोज़ेबल डायपर का इस्तेमाल करें।

कैसी हो मालिश

कुछ लोग पहले दिन से ही शिशु की मालिश शुरू कर देते हैं, लेकिन ऐसा करना उसकी सेहत के लिए ठीक नहीं है। कम से कम जन्म के एक महीने बाद मालिश की शुरुआत करनी चाहिए।

सही तरीका: शिशु की मालिश किसी ऐसे ऑयल से करें, जिसमें बहुत तेज़ गंध न हो और वह उसकी त्वचा में अच्छी तरह समा जाए। इसके लिए जैतून या बादाम का तेल ठीक रहता है। मालिश के वक्त कमरे का फैन या एसी बंद कर दें। वैसे तो आजकल मसाज टेबल भी आता है, पर शिशु के लिए सबसे आरामदेह स्थिति यही होती है कि आप अपने पैरों को सीधा फैलाकर बैठें। फिर शिशु को दोनों पैरों के बीच लिटाकर उसके सिर के नीचे छोटा तकिया लगाएं और हल्के हाथों से उसकी मालिश करें। शुरुआत हमेशा उसके पैरों से करें। इस दौरान शिशु के हाथ-पैरों को हलके से मोड़़ते हुए उसकी एक्सरसाइज़ भी करानी चाहिए। फिर उसके पेट और छाती की मालिश करें। इसके बाद उसे पेट के बल उलटा लिटाकर पीठ और कमर की मालिश करें और अंत में सिर की मालिश करें।

कैसा हो बेबी बाथ

मालिश के बाद शिशु को प्रतिदिन नहलाना चाहिए। इससे उसे बहुत आराम महसूस होता है और अच्छी नींद भी आती है।
सही तरीका : शिशु को नहलाने से पहले उसके नहाने से संबंधित सारा ज़रूरी सामान जैसे बेबी सोप, शैंपू, तौलिया, बच्चे के कपड़े और बाथ टब को एक जगह व्यवस्थित करके फिर उसे नहलाना शुरू करना चाहिए। चाहे कोई भी मौसम हो शिशु को नहलाने के लिए हलके गुनगुने पानी का इस्तेमाल करना चाहिए। उसे नहलाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि उसकी आंख, नाक या कान में पानी न जाने पाए। इसके लिए शिशु को अपने बाएं हाथ पर उलटा लिटाकर नहलाना चाहिए। नहलाते समय शिशु के अंडर आर्म्स, गर्दन और प्राइवेट पाट्र्स की सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए क्योंकि ऐसी जगहों में पसीना ज्य़ादा जमा होने की वजह से रैशेज़ पड़ सकते हैं। उसके कान और नाक की सफाई करते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। मुलायम सूती कपड़े के कोने से उसके कान का बाहरी हिस्सा सा$फ करना चाहिए। सप्ताह में एक बार अच्छे बेबी शैंपू से शिशु का सिर अवश्य धोएं। ध्यान रखें कि इस दौरान उसकी आंखों में पानी न जाने पाए। नहलाने के तुरंत बाद उसका सिर सूखे तौलिये से पोंछें वरना उसे जुकाम हो सकता है।

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जब शिशु हो प्रीमेच्योर

निर्धारित समय से पूर्व पैदा होने वाले बच्चे प्राय: जन्मजात रूप से कमज़ोर होते हैं और उन्हें विशेष देखभाल की ज़रूरत होती है। ऐसी स्थिति में इन बातों का खासतौर पर ध्यान रखना चाहिए।

  • प्री-मेच्योर शिशु में जॉन्डिस की आशंका बढ़ जाती है। अगर शिशु में आंशिक रूप से जॉन्डिस की समस्या हो तो इस स्थिति को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन गंभीर स्थिति में फोटो थेरेपी दी जाती है। इसमें बच्चे की आंखों पर सॉफ्ट मास्क लगाकर उसके शरीर को तेज लाइट में रखा जाता है। लाइट थेरेपी देने से पहले बच्चे का ब्लड टेस्ट किया जाता है।
  • कुछ बच्चों को लिवर इन्फेक्शन के कारण भी जॉन्डिस होता है, जिसमें अलग ट्रीटमेंट दिया जाता है। इससे जॉन्डिस का संक्रमण कम हो जाता है।
  • कुछ प्री-मेच्योर शिशु इतने कमज़ोर होते हैं कि वे स्वाभाविक रूप से ब्रेस्ट फीड लेने में असमर्थ होते हैं। इसलिए शुरू में उन्हें फीडिंग ट्यूब से दूध पिलाया जाता है।
  • ऐसे शिशुओं को हॉस्पिटल से डिस्चार्ज तभी किया जाता है, जब वे ब्रेस्ट फीडिंग के योग्य हों या बॉटल से दूध पी सकें।
  • घर में सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए। शिशु के कमरे में जाने से पहले हाथों को अच्छी तरह सा$फ करें और जूते-चप्पल बाहर उतार कर जाएं। अगर घर में किसी को सर्दी-ज़ुकाम हो तो उसे शिशु से दूर रखें। जब तक बहुत ज़रूरी न हो ,उसके कमरे में बाहरी लोगों का प्रवेश न हो क्योंकि बाहर की गंदगी से उसे संक्रमण हो सकता है।

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