आयुर्वेद से करें ब्रांकाइटिस का इलाज

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Jul 20, 2016
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Quick Bites

  • ब्रौनकियल नलियाँ, श्वास नली को फेफड़ों के साथ जोड़ती हैं।
  • ब्रौनकियल नलियाँ के संक्रमित होने पर ब्रांकाइटिस होता है।
  • इससे फेफड़ों में ऑक्सीजन की प्रवाह कम हो जाती है।
  • ब्रांकाइटिस दो प्रकार के होते हैं, तीव्र और दीर्घकालीन।

ब्रौनकियल नलियाँ, या ब्रौन्काई, श्वास की नली को फेफड़ों के साथ जोड़ती हैं । ब्रौनकियल नलियाँ जब ज्वलनशील या संक्रमित हो जाती हैं, तो उस अवस्था को ब्रौनकाईटिस कहते हैं। ब्रां‍काइटिस फेफड़ों में बहती हुई हवा और ऑक्सीजन के प्रवाह को कम कर देती है, जिससे वायु मार्ग में प्रचंड रूप से कफ़ और बलगम का निर्माण होता है।

कितने प्रकार की होती है ब्रांकाइटिस

ब्रांकाइटिस दो प्रकार के होते हैं, तीव्र और दीर्घकालीन। तीव्र ब्रांकाइटिस की बीमारी अल्पकालीन होती है जो कि विषाणु जनित रोग फ्लू या सर्दी-ज़ुकाम के होने के बाद विकसित होती है। इसके लक्षण बलगम के साथ सीने में बेचैनी या वेदना, बुखार और कभी कभी श्वाश में तकलीफ का होना होता है। तीव्र ब्रौनकाईटिस कुछ दिनों या कुछ हफ़्तों तक जारी रहती है । दीर्घकालीन ब्रां‍काइटिस की विशेषताएं होती हैं, महीने के अधिक से अधिक दिनों, वर्ष में तीन महीनों,  और लगातार दो वर्षों तक और किसी दूसरे कारण के अभाव  में, बलगम वाली अनवरत खाँसी का जारी रहना। दीर्घकालीन ब्रांकाइटिस के रोगी सांस की विभिन्न तकलीफें महसूस करते हैं, और यह अवस्था वर्ष के अलग भागों में बेहतर या बदतर हो सकती है ।

आयुर्वेद

ब्रांकाइटिस के कारण क्या हैं?

तीव्र ब्रांनकाइटिस उसी विषाणु के कारण होती है जिसके कारण सर्दी-ज़ुकाम और फ्लू होते हैं और दीर्घकालीन ब्रांकाइटिस ज़्यादातर धूम्रपान से होती है। यद्यपि, दीर्घकालीन ब्रां‍काइटिस तीव्र ब्रां‍काइटिस के अनवरत हमले के कारण भी होती है। इसके अलावा प्रदूषण, धूल, विषैले गैस, और अन्य औद्योगिक विषैले तत्व भी इस अवस्था के ज़िम्मेदार होते हैं। ब्रौन्काई में सूजन या जलन,  खाँसी,  श्वेत, पीले, हरे या भूरे रंग के बलगम का निर्माण, हाँफना, साँस की घरघराहट,  थकावट,  बुखार और सर्दी ज़ुकाम, सीने में पीड़ा या बेचैनी, बंद या बहती नाक आदि ब्रोंकाइटिस के लक्षण होते है। धूम्रपान करने,कमजोर प्रतिकारक क्षमता, वरिष्ठ और शिशु आदि को इसकी समस्या होने का खतरा ज्यादा रहता है।

ब्रांकाइटिस के आयुर्वेदिक उपचार

  • ब्रांकाइटिस की बीमारी आजकल तेज़ गति से बढ़ रही है, और खासकर के बच्चे इस बीमारी के शिकार जल्दी होते हैं। दूध में शक्कर की बजाय 1 या 2  चम्मच शहद मिलाकर पिलाने से ब्रांकाइटिस से काफी हद तक राहत मिलती है। अगर नियमित रूप से दूध में शहद मिलाकर पिलाया जाये तो खांसी तुरंत भाग जायेगी और वापस नहीं आएगी।
  • एक गिलास दूध में चुटकी भर हल्दी डाल कर उबाल लें फिर इसे खाली पेट एक चम्मच देशी घी के साथ दिन में दो या तीन बार लें। इस उपाय को हर रोज अपनाने से ब्रोंकाइटिस की समस्या धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी।
  • सौंठ और दालचीनी को सामान मात्रा में पीसकर उसका चूरा बना लें, और इस चूरे का एक चम्मच आधे ग्लास पानी में मिलाकर उसे  उबाल लें, और एक ही सांस में गरमागरम पी लें। इससे भी ब्रांकाइटिस से तुरंत राहत मिलती है।
  • सौंठ और हरड का चूरा बनाकर अच्छी तरह मिला दें, और इस चूरे का आधा चम्मच 2 चम्मच शहद के साथ मिलाकर सेवन करें, इससे ब्रांकाइटिस के उपचार में सहायता मिलती है।15 ग्राम गुड़ के साथ 5 ग्राम सौंठ मिलाकर एक महीने तक नियमित रूप से सेवन करने से भी ब्रांकाइटिस में राहत मिलती है।
  • अदरक के रस के 2 चम्मच शहद के दो चम्मच शहद के साथ सेवन करने से भी ब्रांकाइटिस से राहत मिलती है। नियमित रूप से एक सेब का सेवन या 1 या 2 चम्मच आंवले के जाम का सेवन भी ब्रांकाइटिस की राहत में काफी सहायक सिद्ध होता है।
  • लहसुन की दो तीन कलियों को काट कर दूध में डाल कर उबाल लें और रात को सोने से पहले पी लें।यह एक अच्‍छा एंटीबायोटिक है। इसमें एंटी वाइरल तत्‍व पाए जाते हैं। जितना हो सके उतना पानी पियें। वहीं कैफीन और एल्कोहल का सेवन न करें क्योंकि इनसे यूरीन अधिक होती है और शरीर का जल स्‍तर कम हो जाता है।



ब्रोंकाइटिस के रोगियों को धूम्रपान बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। उन लोगों से थोड़ा दूर रहें जो सर्दी-ज़ुकाम से ग्रस्त हैं। हर वर्ष फ्लू का टीका लगवाएं।निमोनिया का टीका भी लगवाना चाहिए, खासकर 60 वर्ष से ऊपर की उम्र वालों को। नियमित रूप से हाथों को अच्छी तरह से धोएं, खासकर कुछ खाने से पहले। नम, सर्द और प्रदूषण वाली जगहों से दूर रहें।

 

Image Source-Getty

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