आट्रियल फिब्रिलेशन के साथ हो सकती हैं कई समस्‍यायें

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Dec 20, 2014
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Quick Bites

  • इस समस्‍या को नियंत्रित किया जाना संभव है।
  • उम्र और चिकित्‍सीय इतिहास पर भी निर्भर करता है खतरा।
  • लक्षण नजर आते ही करें अपने डॉक्‍टर से संपर्क।
  • दिल रोग के इतिहास के मरीज गंभीरता से लें इस समस्‍या को।

आट्रियल फिब्रिलेशन अनियिमत हृदय गति की एक सामान्‍य समस्‍या है। इसमें हृदय की धमनियों के तंतुओं में संकुचन हो जाता है जिसके कारण रक्‍त प्रवाह पर नकारात्‍मक प्रभाव पड़ता है। जब हृदय गति में नियमित रूप से उतार-चढ़ाव होने लगता है तो उस परिस्थिति को अरहथमिया (arrhythmia) कहते हैं। आट्रियल फिब्रिलेशन अरहथमिया का सबसे सामान्‍य रूप है। यह समस्या शरीर में रक्‍त प्रवाह के सुचारू रूप से न होने के कारण होती है। इस समस्‍या के दौरान हृदय का ऊपरी और निचला चैम्‍बर अनियमित रूप से धड़कते हैं। इसके साथ ही उनमें तारतम्‍यता का भी अभाव हो जाता है जिसके कारण शरीर में रक्‍त सुचारू रूप से प्रवाहित नहीं हो पाता।

 

अलिंद विकम्‍पन यानी अट्रियल फिब्रिलेशन के कारण होने वाली समस्‍यायें


आट्रियल फिब्रिलेशन के दौरान हृदय के निचले चैम्‍बर में सही प्रकार से रक्‍त प्रवाहित नहीं हो पाता है। इससे ऊपरी चैम्‍बर और लोअर चैम्‍बर के बीच सही प्रकार से तालमेल नहीं बैठ पाता। हालांकि कई बार इस समस्‍या के लक्षण नजर नहीं आते, लेकिन फिर भी ये स्‍ट्रोक के खतरे में इजाफा करता है। कई दुर्लभ मामलों में यह सीने में दर्द और हार्ट फैल्‍योर का कारण भी बन सकता है। आट्रियल फिब्रिलेशन के कारण होने वाली अनियमितता आए दिन की समस्‍या बन जाती है। कई मामलों में यह परेशानी कई वर्षों तक बनी रहती है।


heart problems in hindi

 

आट्रियल फिब्रिलेशन के प्रकार

इस समस्‍या को मुख्‍य रूप से तीन प्रकारों में बांटा जा सकता है। पहली परिस्थ‍िति को कभी-कभार होने वाली परेशानी के तौर पर देखा जाता है। इसे पेरोक्‍समल आट्रियल फिब्रिलेशन कहा जाता है। इसमें व्‍यक्ति की धड़कनें तेजी से अनियमित होती हैं। यह समस्‍या कुछ मिनटों से लेकर कुछ घंटों तक रह सकती हैं। दूसरे प्रकार की समस्‍या में हृदय गति अपनी सामान्‍य गति पर नहीं लौटकर जाती। इसमें हृदय गति को सामान्‍य करने के लिए दवाओं अथवा इलाज की जरूरत पड़ती है। वहीं तीसरे प्रकार के फिब्रिलेशन में हृदय गति की अतालता को नियमित नहीं किया जा सकता। इसमें व्‍यक्ति को लगातार दवायें देनी पड़ती हैं। कई बार उसे रक्‍त को पतला करने वाली दवाओं का सेवन भी करने की सलाह दी जाती है। इन्‍हीं के जरिये दिल की धड़कन सामान्‍य होती है और साथ ही रक्‍त के थक्‍के भी नहीं जमते।


लक्षण

अर्टिअल फिब्रिलेशन का सबसे सामान्‍य ल्‍खण है पेलपिटेशन, अनियमित हृदयगति, सीने में दर्द, कमजोरी, शारीरिक काम करने में परेशानी, थकान, चक्‍कर आना, और सांस लेने में परेशानी आदि।

संभावित कारण

फिब्रिलेशन का सबसे संभावित कारणों में हृदय में आए परिवर्तन उत्‍तरदायी होते हैं। ये परिवर्तन मुख्‍य रूप से रक्‍तचाप, हृदयाघात, कोरोनेरी अर्टरी डिजीज, हृदय वॉल्‍व में असामान्‍यता, जन्‍म से हृदय में दोष, ओवरएक्टिव थायराइड, फेफड़ों की बीमारी, हृदय की सर्जरी, उत्‍तेजकों के संपर्क में आना, साइनस सिंड्रोम, वायरल संक्रमण, तनाव और नींद में कमी आदि के कारण होते हैं।

heart attack symptoms in hindi


क्‍या होती हैं परेशानियां

अर्टिअल फिब्रिलेशन का सबसे सामान्‍य खतरा स्‍ट्रोक होता है। जब रक्‍त हृदय के ऊपरी हिस्‍से में जमा होने लगता है तो इससे रक्‍त के थक्‍के जमने का खतरा बढ़ जाता है। इसके साथ ही अगर रक्‍त की मात्रा अधिक हो जाए तो यह हृदय से मस्तिष्‍क तक जा सकता है। इससे रक्‍त का प्रवाह रुक सकता है जिसके कारण अचानक स्‍ट्रोक पड़ने का खतरा हो सकता है। इसके साथ ही हार्ट फैल्‍योर का खतरा भी होता है। अर्टिअल फिब्रिलेशन का इलाज अगर न करवाया जाए या फिर लंबे समय तक इसकी अनदेखी की जाए, तो इससे आपका दिल कमजोर हो सकता है, जिससे दिल की बीमारियां और हार्ट फेल होने का अंदेशा भी बढ़ जाता है। अर्टिअल फिब्रिलेशन से आपका दिल पूरी क्षमता से रक्‍त प्रवाहित नहीं कर पाता जिससे हार्ट फेल होने के खतरे में इजाफा होता है।

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